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श्रीकृष्ण के भाई बलराम के विवाह की रोचक कथा। विष्णुपुराण के अनुसार


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नमस्कार दोस्तों 
             मैं राहुल एक बार फिर से आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूं। दोस्तों आप सब लोग भगवान श्री कृष्ण की पत्नियों के बारे में भली-भांति जानते होंगे लेकिन क्या आप बलराम जी की पत्नी के बारे में जानते हैं क्यों बलराम जी से कैसे मिले, कैसे उनका विवाह हुआ, इसके पीछे एक बहुत ही रोचक कथा है । इस कथा का वर्णन विष्णुपुराण के ४ अंश के १ अध्याय में किया गया है । जो शायद ही आपने सुनी हो । आइए मैं आपको बताता हूं इस कथा के बारे में थोड़ा विस्तार से ...REED MORE STORIES 


         दोस्तों वेैैवस्त मनु के वंश में अनर्तके  रैवत नामक महात्मा हुए। जिन्होंने कुशस्थली नामक पुरी में रहकर आनर्तक देश का राज्यभोग किया । रैवत का भी रैवत कुकुम्भी नामक पुत्र हुआ जो अपने 100भाइयों में सबसे बड़ा था. 
रैवत कुकुम्भी बड़ा होकर राज्य का राजा बना. रैवत कुकुम्भी की एक पुत्री हुई जिसका नाम पड़ा रेवती जब वह कन्या विवाह योग्य हुई । तो महाराज रैवत उसे लेकर ब्रह्मा जी के पास गए यह पूछने के लिए कि यह कन्या किस वर के योग्य है। 

     
       उस समय ब्रह्मा जी के समीप हा हा और हु हु नामक गंधर्व  अतितान नामक दिव्य गान कर रहे थे । वहां के त्रिमार्ग में परिवर्तन के साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए । रैवत और उनकी पुत्री को अनेकों युग बीत गए ।लेकिन रैवत जी को केवल एक मुहूर्त ही बीता मालूम हुआ । गाना समाप्त हो जाने पर रैवत ने ब्रह्मा जी को प्रणाम करके अपनी कन्या के लिए योग्य वर पूछा, तब ब्रह्मा जी ने कहा कि" हे रैवत आपको कैसा वर चाहिए आप बताने का कष्ट करें । 
    
      तब रैवत ने ब्रम्हाजी को पुनः प्रणाम करके समस्त प्रकार के गुणों का वर्णन किया तथा कुछ नाम बताएं, और पूछा कि आपको कौन सा वर पसंद है । जिसे मैं अपनी कन्या दें सकूँ. इस पर ब्रह्मा जी सिर झुका कर मुस्कुराते हुए बोले कि आपने जिन जिन वरों का चुनाव किया है उनमें से किसी के पुत्र पौत्र और उनकी संतान भी पृथ्वी पर जीवित नहीं है क्योंकि आप  आपको यहां गंधर्व का गान सुनते हुए कई युग बीत चुके हैं इस समय पृथ्वी पर 28वें मनु का चतुर्युग समाप्त हो चुका है तथा कलयुग का प्रारंभ होने वाला है 

   
         अब तुम अपने सामान अकेले ही पृथ्वी पर रह गए हो अतः यह कन्यारत्न किसी और योग्य वर को दो. इतने समय में तुम्हारे पुत्र मित्र शत्रु सेना का आभाव हो चुका है अब राजा को काटो तो खून नहीं भयभीत होकर 
ब्रम्हा जी से बोले अगर ऐसी बात है तो अब मैं अपनी कन्या किसे दूँ??? 

   
        तब सर्वलोक गुरु भगवान कमलयोनि परमपिता ब्रम्हा बोले "हे राजन पूर्वकाल में तुम्हारी अमरावती नामक जो कुशस्थली थीं  वर्तमान में द्वारिकापूरी हो चुकी है वहीँ पर विराजमान हैं बलदेव जी जो विष्णुजी के ही अंशावतार हैं. अतः हे नृपेंद्र तुम यह कन्या उन महामानव बलदेव जी को पत्नी स्वरूप दें दो. क्योंकि संपूर्ण संसार में प्रसंसनीय हैं और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियों में रत्नस्वरूपा है अतः इनका विवाह योग सर्वथा उपयुक्त है।

      
         यह सुनकर राजा ने ब्रम्हा को प्रणाम किया और तुरंत पृथ्वीलोक आये. पृथ्वीलोक पर आकर देखा की मानव अतिकुरूप अल्प तेजमय अल्पआयु अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं । तब महाराज रैवत अपनी कुशस्थली पहुँचे तो देखा वह पूरी तरह बदल थीं द्वारिकापुरी में । अतः बिना समय नष्ट किये वे बलदेव जी के पास गये.
         
        और अपने और ब्रम्हाजी के बीच हुई वार्तालाप का सारा वृतांत सुनाया और बलदेव जी से आग्रह किया की उनकी पुत्री को पत्नी के रूप में स्वीकार करें। तब बलदेव जी ने उस विशालकाय कन्या को अपने हल के अग्रभाग दबाकर अन्य स्त्रियों के सामान छोटा कर दिया और पुरे विधि विधान से उस कन्या से विवाह किया। विवाह संपन्न हो जाने के बाद महाराज रैवत तपस्या करने वन को चले गये।

    
           तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं और अपने विचार और मेरा मार्गदर्शन भी कमेंट के माध्यम से करना न भूलें।
                                          ✓धन्यवाद ✓

          

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