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भगवान विष्णु को युद्ध में हराया था इस योगी ने

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नमस्कार दोस्तों

           आज जो कथा लेकर आया हूँ इसका वर्णन लिंग पुराण के हिन्दी pdf में पृष्ठ स. १५४ से लेकर पृष्ठ स. १५८ में उल्लेखित हैं. जिसमे बताया गया हैं की कैसे ऋषि दधीचि और भगवान विष्णु में युद्ध शुरू हुआ और कैसे उस युद्ध का अंत हुआ। आइये जानते हैं इस कथा के बारे में विस्तार से.......


      दोस्तों ब्रम्हा जी का महातेजस्वी क्षुप नाम का पुत्र राजा हुआ जोकि महर्षि दधीचि का परममित्र भी था। एक बार दोनों में विवाद हो गया की क्षत्रिय श्रेष्ठ हैं या ब्राम्हण  तो राजा क्षुप ने कहा की "अग्नि, इंद्र, वरुण, यम, निरित, सोम, वायु, कुबेर, का तेज एक राजा धारण करता हैं। अतः हे चमन की संतान दधीचि राजा ईश्वर होता हैं। मेरा अपमान आपको नहीं करना चाहिए अपितु आपको मेरी पूजा करनी चाहिए।

          ऐसे वचन सुनकर महर्षि दधीचि को बहुत क्रोध आया जिससे महर्षि ने राजा क्षुप पर अपने बाये हाथ से एक जोरदार घूँसा मारा। और पलटकर राजा क्षुप ने भी दधीचि पर प्रहार कर दिया। राजा क्षुप के प्रहार से दधीचि जमीन पर गिर पड़े और दुखी दधीचि ने उस समय शुक्राचार्य को याद किया।  अतः शुक्राचार्य ने योगबल से दधीचि के ह्रदय में प्रवेश करके कहने लगे की "हे दधीचि तुम उमापति शिव का पूजन करो क्योंकि मृतसञ्जीवनी विद्यालय भी शिव की ही हैं वह मैं तुम्हे देता हूँ शिव की कृपा से तुम अवध्य होगे।

           महामृत्युंजय का जाप कर इनके द्वारा हवन कर तथा इसके द्वारा अभिमंत्रित जल पीकर शिवलिंग का ध्यान कर इससे मृत्यु का भय ख़त्म हो जाता हैं। ऐसा सुनकर दधीचि ने भगवान शिव की घोर के द्वारा आराधना की जिससे दधीचि मुनि ने बज्र की हड्डी तथा अवध्यता प्राप्त की। तब वे राजा क्षुप के पास दोबारा गये और इस बार उन्होंने क्षुप पर अपने पैरो से प्रहार किया। तथा क्षुप ने भी दधीचि की छाती पर प्रहार किया लेकिन  दधीचि को कुछ भी नहीं हुआ।

           तब क्षुप ने दधीचि पर कई अस्त्र सश्त्र प्रयोग किये लेकिन दधीचि का कुछ न बिगड़ पाए। क्योंकि शिव जी कृपा से दधीचि बज्र के से शरीर वाले हो गये थे। यह देखकर दधीचि को बड़ा आश्चर्य हुआ। तब क्षुप ने भगवान श्री हरि विष्णु को याद किया अतः भगवान विष्णु राजा क्षुप की पूजा से प्रसन्न होकर चक्र, गदा, पद्म, शंख, धारण कर प्रगट हुए। तब क्षुप श्री हरि विष्णु को प्रणाम करके बोले की "हे नारायण दधीचि नामक ब्राम्हण मेरा मित्र था जोकि भगवान शिव का भक्त हैं । उसने मुझे अपने बाये पैर से अपमान सहित मारा हैं. और बड़े घमंड से कहता हैं कि मैं किसी से नहीं डरता, अब आपको जो उचित लगे आप वो करें, बस मैं उसे जितना चाहता हूँ,
     
           यह सुनकर श्री हरि विष्णु बोले " कि हे राजन जो रूद्र के भक्त हैं उन्हें अभय प्राप्त हैं चाहे वह कितना ही नीच क्यों न हो,  तो ऋषि दधीचि कि बात ही क्या हैं. हे राजन तेरी विजय नहीं हो सकती हे राजवेंद्र देवताओं के साथ दक्ष के यज्ञ में मेरा भी विनाश होगा, और देवताओं के साथ पुनः उत्थान भी होगा,  तो हे राजन मैं दधीचि से विजय का प्रयत्न करूँगा,  ऐसा कहकर भगवान विष्णु वहाँ से अंतर्ध्यान होकर मुनि दधीचि कि कुटिया के पास पहुँचे और बोले कि "हे महर्षि दधीचि आप तो भगवान शिव के भक्त हो अतः मैं आपसे वरदान माँगना चाहता हूँ, क्या आप देने के योग्य हैं।

            तब ऋषि दधीचि ने कहाँ कि मैं आपकी इच्छा जनता हूँ फिर भी मैं तनिक भी भयभीत नहीं हूँ, आप ब्राम्हण के भेष में श्री हरि विष्णु हो,  रूद्र कि कृपा से मैं भूत भविष्य और वर्तमान सब जनता हूँ,  आपको राजा क्षुप ने पुकारा हैं और मैं आपकी भक्त वत्सलता से भलीभांति परिचित हूँ, अतः आप ब्राम्हण का भेष त्याग दीजिये. रही बात मेरे भयभीत होने कि तो मैं शिव कृपा से तनिक भी भयभीत नहीं हूँ यदि तनिक भी भयभीत हूँ तो आप ही बताइये.  ऐसा सुनकर श्री हरी विष्णु ब्राम्हण का रूप त्यागकर हसने लगे और बोले "हे दधीचि आपको तनिक भी भय नहीं हैं। तुम रूद्र की अर्चना में तत्पर इसलिए तुम सर्वज्ञ हो लेकिन एक बार मेरी आज्ञा मानकर कह दो की मैं डरता हूँ।



              भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर दधीचि ने कहा की "वह रूद्र के आलावा किसी से नहीं डरते " महर्षि के ऐसे वचन सुनकर श्री हरी विष्णु को क्रोध आ गया तथा मुनि दधीचि पर चक्र से प्रहार कर कर दिया,  लेकिन वह चक्र ही कुंठित हो गया.  तब महर्षि हसकर बोले की "हे भगवन ये सुदर्शन चक्र आपने तपस्या से प्राप्त किया हैं वह भगवान शिव का ही हैं अतः यह मुझे नहीं मार सकता।  आप मुझे मारने के लिए ब्रम्हास्त्र आदि का प्रयोग करें.  उनकी बात सुनकर श्री हरी ne उनपर हर प्रकार के अस्त्र शस्त्र चलाये तथा सभी देवता भी भगवान विष्णु की सहायता करने लगे।

 लेकिन शिवभक्त दधीचि सब देवों और विष्णु जी पर कुशाओं की मुष्टि शिव जी का अस्मरण करके फेंक देते जिस कारण उनके सारे अस्त्र सस्त्र निष्फल हो जाते. था भगवान विष्णु ने अपने शरीर से लाखो करोडो गण उत्पन्न किये परन्तु ऋषि दधीचि ने उन्हें भी नष्ट कर दिया। तब श्री हरी ने करोड़ों देवता और रूद्र उत्पन्न किये।जिन्हे देखकर दधीचि आश्चर्यचकित हो गये।  और बोले की " हे प्रभु आप इस माया को छोड़ दें मैं अपने शरीर में भी आपको समस्त ब्रम्हांड दिखा सकता हूँ अतः यह माया छोड़कर प्रयत्नपूर्ण मुझसे युद्ध करें,

             ऐसे वचन और माहात्म्य को देखकर सभी देवता भगवान खड़े हुए,  उधर नारायण की इसप्रकार निष्फल देखकर परमपिता ब्रम्हा वहाँ प्रकट हुए और विष्णु और दधीचि को युद्ध रोकने की सलाह दी। इसपर भगवान विष्णु ने ब्रम्हाजी को प्रणाम किया किया और वहाँ से चले गये। राजा क्षुप को बहुत दुःख हुआ और दधीचि के पास आये और बोले कि "हे महर्षि मैंने जो अज्ञानता वश आपका तिरस्कार या अपमान किया हैं उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। आप तो ज्ञान के सागर हैं अतः मुझे क्षमा प्रदान करें। लेकिन दधीचि कहाँ सुनने वाले उन्होंने राजा क्षुप भगवान विष्णु तथा समस्त देवताओं को श्राप दें दिया कि आप सभी राजा दक्ष के यज्ञ में रूद्र के क्रोध से भस्म हो जाओगे।  ऐसा कहकर दधीचि अपनी कुटिया में चले  गये और उदास मन से राजा अपने राजधानी लौट आया।

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी मुझे कमेंट के माध्यम से अवश्य बताएं,                                                                                             ✓   धन्यवाद  ✓

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