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दूध दही के समुद्र दिए शिवजी ने इस बालक को.

   भगवान और उपमन्यु की कथा
नमस्कार दोस्तों

             यह कथा उपमन्यु का चरित्र के नाम से लिंग पुराण के हिन्दी PDF के पृष्ट स. 312 से लेकर 316 के माध्यम उल्लेखित हैं। जिसमे बताया गया हैं कैसे एक बालक की तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उसे दूध दही के समुद्र और अपने गाणपत्य में स्थान प्रदान किया। आइये जानते हैं इस कथा के बारे में विस्तार से....?


        दोस्तों उपमन्यु नाम का एक बालक हुआ जो बहुत ही तेजस्वी था। एक बार वह अपने मामा के घर गया हुआ था। तो उसे थोड़ा सब दूध पिने को मिला । लेकिन जैसे ही उसने थोड़ा सब दूध पिया वैसे ही उपमन्यु के मामा के लड़के ने वह दूध छीन लिया और खुद पी गया। तब उपमन्यु अपनी माता के पास गया और "मुझे दूध दो, मुझे दूध चाहिए यह कह कर रोने लगा।

           तब माता दुखी होकर चावल के कुछ दाने को पीस कर और घोलकर अपने पुत्र को दिया, लेकिन उस बनावटी दूध को पीकर बालक ने अपनी माता से कहा की"हे माता यह तो दूध नहीं हैं। यह सुनकर माता ने उसके अश्रुओ को पोंछ कर और चुम्बन लेकर बोली की "हे पुत्र रत्नपूर्ण नदी स्वर्ग से लेकर पाताललोक तक बह रही हैं । परन्तु भाग्यहीन और शिव की भक्ति से हीन व्यक्ति उसे नहीं देखा पाते। राज्य, स्वर्ग, मोक्ष, दूध से बने भोजन और भी उत्तम वस्तुएं उन्हें नहीं मिलती जिनसे शिव प्रसन्न नहीं हैं। पूर्वजन्म में हमने न तो शिव,  और न ही शिव का पूजन किया। तो हमें दूध कहा से मिलेगा।

        यह सुनकर बालक उपमन्यु यह समझ गया की बिना शिव की भक्ति के उसे कुछ प्राप्त नहीं होगा । अतः उपमन्यु ने माता को प्रणाम करके जंगल में तपस्या करने निकल पड़ा। वह हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगा और वायु पीकर जीवित रहने लगा।  उसकी कठोर तपस्या के कारण सारा जगत जलाने लगा। यह देखकर सभी देवता घबराकर भगवान विष्णु के पास गये। और भगवान विष्णु समस्त देवताओं को लेकर भगवान शिव के पास आये ।

     और शिवजी को प्रणाम करके बोले की "हे भोलेनाथ यह बालक उपमन्यु दूध के तप कर रहा हैं। और उसके घोर तप के कारण सारा जगत जल रहा हैं। अतः आप इसे रोकिये। ऐसा सुनकर भगवान शिव इन्द्र का रूप धारण करके उपमन्यु के आश्रम में गये। और उपमन्यु को देखकर इंद्र रुपी शिव बोले की" हे उपमन्यु मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हूँ अतः तुझे जो वरदान चाहिए मुझसे निसंदेह मांग मैं तेरी हर इच्छा पूरी करूँगा। अतः तू वर मांग।



       तब बालक उपमन्यु बोला की "हे देवराज मैं केवल शिव जी से ही वरदान मांगूंगा अतः आप प्रस्थान करें  अपना समय नष्ट न करें।  यह सुनकर क्रोधित इंद्र रुपी शिव ने कहा "हे मुनि तीनो लोकों द्वारा नमस्कृत सभी देवों का स्वामी इंद्र हूँ मैं , तू मुझको जान मेरी भक्ति कर तेरा हर प्रकार से कल्याण करूँगा । उस निर्गुण शिव का ख्याल त्याग दे।

       कानों को विदीर्ण करने वाले इंद्र के वचन सुनकर उपमन्यु बोला कि "तू अवश्य ही कोई दैत्य हैं जो मेरा धर्म नष्ट करने आया हैं। जो शिव कि निंदा कर रहा हैं मेरा अनुमान हैं कि अवश्य ही मैंने पूर्वजन्म कोई पापा किया था । जिसके फ़ल स्वरुप आज शिव कि निंदा सुन रहा हूँ। मेरी माता ने ठीक ही कहा था कि पूर्व जन्म में हमने शिव कि पूजा नहीं कि थीं।

          ऐसा कहकर अथर्वाश्त्र से इंद्र रूपी शिव को मरने कि इच्छा कि और भस्म को मुट्ठी में लेकर इन्द्र पर फेंका। और अपने शरीर को नष्ट करने के लिए आग्नेय मंत्र का ध्यान किया। तब भगवान शिव ने चन्द्रका अस्त्र से उस अस्त्र का निवारण किया तथा बालेंदु रूप अपना स्वरुप उपमन्यु को दिखाया । हजारों दूध कि धाराएं, दूध के समुद्र, दही आदि के समुद्र, बालक के हेतु खाने योग्य भोज्य पदार्थो का समुद्र दिखाते हुए।

        शिवजी उपमन्यु से बोले कि "हे उपमन्यु अपने प्रियजनों के साथ तू इन सबका उपभोग कर,  और पार्वती कि तरफ देखकर हसकर कहा कि "हे देवी मैंने उपमन्यु को पुत्र रूप में स्वीकर कर लिया हैं " और बोले कि " हे उपमन्यु अब तेरा पिता स्वयं मैं और तेरी माता स्वयं जगतमाता पार्वती हैं मैं तुझे अमर बना,  गणपत्य पद प्रदान करता हूँ।  यदि और भी कुछ आपको चाहिए तो आप बताये।

      ऐसा कहकर बालक उपमन्यु को गोद में उठा लिया और माथे पर चुम्बन करके माता पार्वती को दें दिया.  तथा माता ने प्रसन्न होकर उपमन्यु को योग, ब्रम्ह, ऐश्वर्य, विद्या, तथा सदा कुमरत्व का वरदान दिया.  तब बालक उपमन्यु दोनों हटव जोड़कर भगवान शिव और माता पार्वती कि स्तुति करने लगा.

  तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताये.                                                                                            ✓ धन्यवाद ✓

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