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पेड़ से पैदा हुई थीं यह कन्या

    पेड़ से पैदा हुई थीं यह कन्या             

पेड़ से जन्म हुआ था इस लड़की का
नमस्कार दोस्तों

              आज मैं जो कथा लेकर आया हूँ उसका वर्णन विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के 15वें अध्याय में किया गये हैं। जो कुछ इस प्रकार हैं।


       पूर्व काल में विद्वानों में श्रेष्ठ वेद वेदताओं में श्रेष्ठ महान कण्डु थे। जोकि गोमतो नदी के तट पर निवासी करते थे। एक बार ऋषि कण्डु ने घोर तप शुरू किया जिससे इंद्र घबरा गये। उन्हें यह डर सताने लगा कि कहीं यह मुनि मेरा सिंघासन न छीन ले तब इंद्र ने ऋषि कण्डु कि तपस्या भंग करने के लिए।

      प्रम्लोचा नामक अप्सरा को नियुक्ति किया। प्रम्लोचा ज़ब ऋषि कण्डु के सामने प्रकट हुई तो ऋषि कण्डु उसपर मोहित हो गये। और उसे लेकर मंदरांचल कि गुफाओ में चले गये। और सौ से अधिक वर्षों तक उसके साथ भोग विलास किया. एक दिन अप्सरा प्रम्लोचा ने कहा कि " हे ब्राम्हण मुनि अब मैं स्वर्गलोक जाना चाहती हूँ इसलिए आप मुझे प्रसन्नता पूर्वक विदा करें".ऐसा सुनकर मुनि कण्डु ने कहा कि "हे भद्रे अभी थोड़े दिन और रुको ".

      ऐसा सुनकर प्रम्लोचा ने फिर अगले सौ वर्षों तक भोग विलास किया। और पुनः बोली कि "हे मुनि अब तो आप मुझे स्वर्गलोक जाने कि आज्ञा प्रदान करें" मुनि कण्डु वही जबाब दिया कि "अभी कुछ दिन और रुको " इसी तरह करते हुए कई सौ वर्ष बीत गये। अप्सरा ज़ब भी ऋषि कण्डु से जाने को कहती तो उसे रोक देते। और अप्सरा भी श्राप के डर से कुछ न कहा पाती।

     उधर महर्षि के काम वासना में लिप्त होने से अप्सरा के प्रति नित्य प्रेम बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन ऋषि कण्डु बड़ी शीघ्रता से अपनी कुटिया से निकल ही रहे थे। तभी अप्सरा ने पूछा" कि हे मुनि आप कहा जा रहे हैं"। इस प्रकार जिज्ञासावश पूछने के कारण मुनि ने कहा "कि हे शुभे दिन अस्त हो चूका हैं अतः मैं सन्ध्योपासना करूँगा नहीं तो नित्य क्रिया नष्ट हो जाएगी"।

    तब अप्सरा ने हसकर कहा कि" हे सर्वधर्मज्ञ क्या आज ही आपका सूर्यास्त हुआ हैं."  इस प्रकार के वचन सुनकर ऋषि कण्डु बोले "कि हे भद्रे नदी के इस सुन्दर तट पर आज सवेरे ही तो तुम आयी हो। मुझे भली प्रकार से स्मरण हैं।मैंने आज ही तुमको अपने आश्रम में प्रवेश करते देखा था । अतः अब दिन के समाप्त होने पर सांध्यकाल हुआ हैं । परन्तु तुम ऐसा उपहास क्यों कर रही हो"।
   
तब प्रम्लोचा बोली कि " हे ब्राम्हण श्रेष्ठ आपका यह कथन कि मैं सवेरे आयी हूँ सत्य हैं लेकिन आज सवेरे नहीं उस समय को तो सैकड़ों वर्ष बीत चुके हैं"। तब महर्षि घबराकर बोले कि " मुझे ठीक ठीक बता मुझे तेरे साथ रमण करते कितना समय बीत चूका हैं"।  तब प्रम्लोचा ने बताया कि "आपको मेरे साथ रमण करते हुए 907 वर्ष 6 महीने 3 दिन बीत चुके है

       यह सुनकर ऋषि कण्डु बोले "कि हे प्रिये क्या तुम सत्य कहा रही हो या फिर सिर्फ हंसी के लिए ऐसा कहा मुझे तो प्रतीत होता हैं कि मैं इस स्थान पर तुम्हारे साथ एक दिन ही रहा हूँ"। तब प्रम्लोचा बोली कि "हे ब्राम्हण मैं आपसे झूठ कैसे बोले सकती हूँ वो भी उस समय ज़ब आप अपने धर्म मार्ग का अनुसार करने के लिए तत्पर होकर मुझसे पूछ रहे हो।

         प्रम्लोचा के ऐसे वाक्य सुनकर ऋषि कण्डु चिंतित होकर बोले कि "मुझे धिक्कार हैं मेरा धर्म नष्ट हो गया स्त्री को तो मोह काम उपजाने के लिए ही रचा गया हैं।  जिसने मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया उस काम रूपी महाग्रह को धिक्कार हैं। नर्क ग्राम के मार्गरूपी इस स्त्री के संग से मेरा समस्त तप नष्ट हो गया। इसलिए "हे पापिन स्त्री अब तू जहाँ चाहे जा सकती हैं क्योंकि तुझे इंद्र ने जिस कार्य के लिए भेजा था। वह कार्य संपन्न हो गया। तूने मेरा तप नष्ट कर दिया हैं।

        महर्षि को इस तरह क्रोधित देखा प्रम्लोचा भय से काँपने लगी जिस वजह से उसका पूरा शरीर पसीने से तर  बतर हो गया था मतलब भीग गया था  बार बार फटकारे जाने पर प्रम्लोचा आश्रम से निकली तथा आकाश मार्ग में जाते समय उसने अपना सारा पसीना पेड़ के पत्तों में पोंछा वह सुंदरी वृक्ष के पत्तों में पसीना पोंछते हुए एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर चलती गई ।

        उस समय ऋषि ने जो गर्भ प्रम्लोचा में स्थापित किया था वह भी रोम छिद्रों से निकल कर पसीने के रूप में उसके शरीर से बाहर आ गया। तब उस गर्भ और वायु ने इकठ्ठा किया तथा वृक्षों ने उसे ग्रहण किया और सूर्य अपनी किरणों से पोषित करने लगा। जिससे वह धीरे धीरे बढ़ने लगा तथा समय पूर्ण होने पर उस व्रिक्षागृ से मिरिषा नामक कन्या उत्पन्न हुई। जो ऋषि कण्डु, सूर्यदेव, तथा वायु कि भी पुत्री कहलाई।
             
             तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं ।     ✓धन्यवाद ✓

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