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देवताओं को सगी संताने क्यों नहीं हैँ,

                  देवताओं को सगी संताने क्यों नहीं हैँ,          

                  
     किसी भी देवता की सगी संतान क्यों नहीं है , एक श्राप
 नमस्कार दोस्तों

       आपने कभी सोचा कि किसी भी देवता का कोई पुत्र क्यों नहीं हैँ ।इसका रहस्य छिपा हैँ बाल्मीकि रामायण में, जिसके अनुसार एक श्राप कि वजह से किसी भी देवता का अपना सगा पुत्र या पुत्री नहीं हैँ। इस कथा का वर्णन बाल्मीकि रामायण बालकाण्ड के 36वें सर्ग में किया गया हैँ। कथानुसार..?


   ज़ब भगवान भोलेनाथ जी का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ। तब विवाह के पश्चात् ज़ब भगवान शिवजी ने देवी पार्वती को देखा तो उनकी कामवासना जाग उठी। और कामवश सम्भोग कि कामना से महादेव जी पार्वती के साथ विहार करने लगे। तथा महादेव नीलकंठ जी और देवी पार्वती जी को विहार करते हुए देवताओं के मान से सौ वर्ष बीत गये. लेकिन इतने वर्ष विहार करने बाद भी ज़ब भगवान शिव और देवी पार्वती को कोई संतान नहीं हुई ।

     तब सभी देवता व्याकुल हो गये। तथा सभी घबराये हुए देवता ब्रम्हा जी के पास पहुँचे। और ब्रम्हाजी को प्रणाम करके बोले कि " हे भगवन महादेव और पार्वती जी के सम्भोग से जो जीव उत्पन्न होगा उसका भार कौन सम्भालेगा क्योंकि उनको तो सहस्त्र वर्ष बीत चुके हैँ विहार करते हुए। यह सुनकर ब्रम्हा जी भी सोच में पड़ गये. कि बात तो सभी सत्य कह रहे हैँ। अतः समस्या के समाधान हेतु ब्रम्हा जी सभी देवताओं को लेकर भगवान भोलेनाथ कि शरण में गये।

        और प्रणाम करके बोले कि "हे महादेव प्रसन्न होइए और तीनो लोकों कि रक्षा करें, हे सुरोत्तम आपका तेज कोई भी लोक धारण नहीं कर सकता हैँ।अतः आप तीनो लोकों कि रक्षा हेतु आप अपना तेज अपने शरीर में ही रखिये, जिससे तीनो लोकों कि रक्षा हो सके, और तीनो लोकों का नाश न हो,  सर्वलोको के परम नियंता महादेव जी देवताओं के वचन सुनकर बोले कि "ठीक हैँ बहुत अच्छा परन्तु हे देवताओं यह तो बताओ जो मेरा तेज मतलब वीर्य स्थानच्युत हो गया हैँ उसे कौन धारण करेगा।

           इसपर देवताओं ने महादेव जी से कहा कि "आपका जो तेज (वीर्य ) स्थानच्युत हुआ अर्थात गिरा हैँ । उसे पृथ्वी धारण करेंगी। लेकिन ज़ब देवताओं को मालूम हुआ कि महादेव का तेज पृथ्वी धारण करने में असमर्थ हैँ । तब वे अग्निदेव से बोले कि तुम वायुदेव के साथ इस रूद्र के तेज में प्रवेश करो, तब अग्निदेव के उस तेज में प्रवेश करने से वह तेज एक स्थान पर सिमट कर श्वेत पर्वत के आकर जैसा हो गया। वह तेज अग्नि और सूर्य के सामान चमकीला दिव्य सरपत जैसा बन गया ।

         उसी से अग्नि के समान तेजस्वी स्वामी कार्तिकेय जी का जन्म हुआ । यह देखकर सभी ऋषियों और देवताओं ने देवी उमा और शिवजी का पूजन किया। लेकिन क्रोधित उमा देवताओं से बोली कि "तुम सबने मेरे लिए यह अप्रिय कार्य किया हैँ जिसका तुम्हे फ़ल अवश्य मिलेगा, यह कहकर देवी पार्वती ने हाथ में जल लेकर क्रोधित लाल नेत्रों से उन सभी देवताओं को श्राप दिया कि "तुमने पुत्र उत्पन्न होने में बधाई डाली हैँ अतः कोई भी देवता अपनी स्त्री से पुत्र उत्पन्न नहीं कर पायेगा । आज से तुम्हारी स्त्रियाँ संतानहीन होंगी.  देवताओं को इस प्रकार श्राप देकर भी उमा जी का क्रोध शान्त नहीं हुआ।

          उन्होंने पृथ्वी को भी श्राप दिया कि हे पृथ्वी तू एक सी नहीं रहेगी। तेरे अनेक पति होंगे । अर्थात समस्त भूमंडल का एक स्वामी नहीं होगा अनेक राजा होंगे मेरे क्रोध से तुझे भी पुत्र सुख प्राप्त नहीं होगा । क्योंकि तूने भी इन देवताओं का सहयोग किया हैँ. तब महादेव ने इंद्र सहित सभी देवताओं को लज्जित देख देवी पार्वती के क्रोध को शान्त करने हेतु,  देवी पार्वती समेत हिमालय के उत्तर भाग में हिमवत्प्रभव नामक पर्वत पर तपस्या करने के लिए चले गये ।
     तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं हमें कमेंट के माध्यम से अवश्य बताएं ।        ✓धन्यवाद ✓

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