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महाप्रतापी सम्राट रजि की कथा। विष्णुपुराण कि पौराणिक कथा

                   
                      पौरणिक कथा
नमस्कार दोस्तों
                 मै राहुल आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं। आज की कथा का वर्णन विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के 9 वें अध्याय में किया गया है। जो कुछ इस प्रकार है।
      एक चक्रवर्ती सम्राट हुए जिनका नाम था महाराज रजी। इनके 500 महाबलशाली पुत्र थे। एक बार देवासुर संगम के पहले सभी दैत्य और राक्षस ब्रम्हा जी के पास गए और उनसे पूछा कि "है परमपिता ब्रम्हा हम दैत्यों और देवो में पारस्परिक  कलह के कारण हमेशा युद्ध होता रहता है। अतः अब यह को युद्ध होने जा रहा है । इसमें कौन विजय होगा कृपया हमारा मार्गदर्शन करें।
 
       यह सुनकर ब्रम्हा जी बोले "की है दैत्य गण इस युद्ध में वही विजय प्राप्त करेगा जिसकी तरफ से महाराज रजी शस्त्र धारण करके युद्ध करेंगे । तब सभी दैत्य महाराज रजी के पास गए और युद्ध में अपनी सहायता का अनुग्रह किया। इसपर महाराज रजी ने दैत्यों के सामने शर्त रख दी कि "यदि देवताओं को जीतने पर मै तुम्हारा इन्द्र (राजा) बन सकूं तब तो मै तुम्हारे पक्ष से युद्ध करूंगा अन्यथा नहीं।
      यह सुनकर दैत्य बोले कि है राजन हम दैत्य है एक बात कहकर उसके विरूद्ध दूसरा आचरण नहीं करते अतः हमारे इन्द्र तो प्रह्वाद जी ही होंगे । और यह कहकर दैत्य वापस चले गए। दैत्यों के चले जाने के पश्चात देवता भी राजा रजी के पास आए और अपनी तरफ से युद्ध लड़ने का अनुग्रह किया। तब भी शर्त राजा रजी ने देवताओं के सामने भी रख दी । तब देवताओं ने राजा रजी को अपना इन्द्र होना स्वीकर कर लिया ।
      अतः रजी ने देवताओं की सहायता करते हुए देवासुर संगम में अपने अनेकों अस्त्र शस्त्र से समस्त दैत्यों का विनाश के दिया। शत्रुओं को जीत लेने के पश्चात देवराज इन्द्र ने राजा रजी के चरणों को अपने मस्तक पर रखकर कहा कि" भय से रक्षा करने के कारण, अन्नदान करने के कारण आप हमारे पिता हुए, आप सम्पूर्ण लोको में सर्वोत्तम है क्योंकि मै त्रिलोकेन्द्र आपका पुत्र हूं।
       इसपर राजा ने कहा ठीक है ऐसा ही सही, शत्रुपक्ष के नाना प्रकार के चटुवाक्य युक्त अनुनय विनय का अतिक्रमण करना उचित नहीं होता तो स्वपक्ष की बात ही क्या है । ऐसा कहकर राजा रजी अपनी राजधानी वापस चले  आए । इस प्रकार शतक्रतु ही इन्द्र पद पर स्थिति हुआ. कुछ समय के पश्चात् राजा रजि की मृत्यु हो गई तब देवर्षि नारद की प्रेरणा से रजि के पुत्रों शतक्रतु इन्द्र से अपने पिता का राज्य वापिस माँगा।  किन्तु ज़ब शतक्रतु इंद्र ने मना कर दिया तो रजि पुत्रों ने शतक्रतु इंद्र को जीतकर इन्द्र पद का भोग करने लगे।
      ऐसे ही कुछ काल बीत जाने के पश्चात् एक दिन शतक्रतु ने गुरु वृहस्पति को अकेले बैठा देखा उनके पास गया और बोला कि " क्या आप मेरी तृप्ति के लिए एक बेर के बराबर पुरोडाशखण्ड मुझे दें सकते हैं.  शतक्रतु के ऐसा कहने पर वृहस्पति जी बोले कि" यदि ऐसा हैं तो मुझे पहले कहना था तुम्हारे लिए मैं क्या नहीं कर कर सकता अतः थोड़े ही दिनों में मैं तुम्हे तुम्हारे पद पर स्थित  करता हूँ।
     ऐसा कहकर वृहस्पति जी रजि पुत्रों कि बुद्धि को माहित करने के लिए अभिचार और इंद्र कि तेजोवृद्धिं के लिए हवन करने लगे. बुद्धि को मोहित करने वाले उस अभिचार केम से अभिभूत हो जाने के कारण रजि पुत्र धर्म विरोधी, धर्म त्यागी, और  वेद विमुख हो गये. अतः धर्महीन हो जाने के कारण अति दुर्बल और शक्तिहीन हो जाने के कारण इंद्र ने उन्हें मार डाला और पुरोहित जी के द्वारा तेजोवृद्धिं होकर अपना अधिकार जमा लिया।

         दोस्तों एक चीज जो ध्यान देने योग्य हैं कि इसमें बताया गया हैं कि इंद्र के इस तरह पद से गिरकर उसपर फिर से आरूढ़ होने के प्रसंग को सुनने से मनुष्य apne पद से पतित नहीं होता और उसमे दुष्टता कभी नहीं आती.

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