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भगवान विष्णु ने किया अपने ही पुत्र का वध,

                          
                      भगवान विष्णु ने किया अपने पुत्र का वध

नमस्कार दोस्तों

              यह कथा विष्णुपुराण के 5वे अंश के 29वे अध्याय में उल्लेखित हैं। भगवान विष्णु ने अपने ही पुत्र का वध किया था लेकिन ऐसी कौन सी परिस्थितियों के चलते उन्हें ऐसा करना पड़ा इसको जानने के लिए प्रस्तुत हैं यह कथा........

   
           कथानुसार ज़ब ज़ब श्री हरी विष्णु ने पृथ्वी पर श्रीकृष्णा का अवतार लिया और कंश का वध कर द्वारिकापुरी में रहने लगे। तो एक दिन इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर श्रीकृष्ण के पास पहुचे। और भगवान कृष्णा को प्रणाम करके बोले की "हे मधुसूदन इस समय आप मनुष्य रूप में होकर भी समस्त देवताओं के स्वामी ने हमारे समस्त दुखो का अंत किया हैं। अनिस्ट, केशी, धेनुका,आदि असुर जो तपस्वियों को कष्ट देते थे उन सबको अपने मार डाला।

       लेकिन हे शत्रुदमन पृथ्वी का पुत्र नरकासुर जो प्राग्ज्योतिसपुर का स्वामी हैं. वह देवता, मुनि, सिद्धअसुर, राजा आदि की कन्याओं को बलपूर्वक अपने अंतःपुर में बंदी बना रखा हैं. इस दैत्य ने वरुण का जल बरसाने वाला क्षत्र और मंदरांचल का मणिपर्वत नामक शिखर का भी हरण कर लिया हैं। हे कृष्णा मेरी माता अदिति के अमृतस्त्रावी दो दिव्य कुण्डल भी ले लिए हैं और अब इस ऐरावत हाथी को भी लेना चाहता हैं। अतः हे कृष्ण मैंने अपनी सारी समस्या आपको बताई हैं अब आपको जैसा उचित लगे आप वैसा करें।
   
      इंद्र के ऐसे वचन सुनकर देवकीनंदन मुस्कुराये और इंद्र का हाथ पकड़कर अपने आसान से उठे फिर स्मरण करते ही उपस्थित हुए आकाशगामी गरुण पर सत्यभामा को बैठकर स्वयं चढ़े और प्राग्ज्योतिषपुर के लिए निकल पड़े। और इधर इंद्र भी अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर देवलोक चले गये. इधर प्राग्ज्योतिषपुर पहुचे कर श्रीकृष्ण देखते हैं की प्राग्ज्योतिषपुर के चारो ओर पृथ्वी के सौ योजन तक मुर दैत्य के बनाये हुए चाकू की धार के सामान अति तीक्ष्ण पासो से घिरी हुई हैं।
 
           तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन पासो को अपने सुदर्शन चक्र से काट डाला। यह देखकर मुर दैत्य श्री कृष्ण से युद्ध करने के लिए दौड़ा तभी कृष्ण ने मुर को भी सुदर्शन चक्र से मार डाला। मुर को मरा देख मुर के पुत्र भी श्री कृष्णा से युद्ध करने लगे. लेकिन श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उन्हें भी मार दिया। इस प्रकार कांतिमान कृष्ण ने मुर सहित मुर के सौ पुत्र और पञ्चजन नामक दैत्यों का वध कर शीघ्रता से प्राग्ज्योतिषपुर में प्रवेश किया।
     
       जहाँ श्री कृष्ण का सामना नरकासुर की भयानक सेना से हुआ। एक तरफ नरकासुर की पूरी सेना और दूसरी तरफ श्री कृष्ण अकेले लेकिन नारायण तो नारायण ही हैं उन्होंने पल भर में नरकासुर की समस्त सेना का सर्वनाश कर डाला । यह देखकर तिलमिलाया नरकासुर भगवान कृष्ण से युद्ध करने पंहुचा और अपने सर्वश्रेष्ठ अस्त्र शस्त्र नारायण पर छोड़ने लगा। लेकिन नारायण ने उसके सभी अस्त्र शस्त्र विफल कर दिए. और अंत में दैत्यों का दलन करने वाले श्री हरि ने आखिरकार नरकासुर पर सुदर्शन चक्र से प्रहार कर ही दिया. सुदर्शन चक्र ने भूमिपुत्र नरकासुर के टुकड़े टुकड़े कर डालें।
   
         नरकासुर के मरते ही पृथ्वी अदिति के कुण्डल लेकर प्रकट हुई और श्री जगन्नाथ से कहने लगी कि "हे नाथ जिस अपने वराह अवतार धारण करके मेरा उद्धार किया था उसी समय आपके स्पर्श से मेरा यह पुत्र उत्पन्न हुआ इस प्रकार आपने ही मुझे यह पुत्र दिया आपने इसे नष्ट किया । आप यह कुण्डल लीजिये और अब इसकी संतान कि रक्षा कीजिये । आप प्रसन्न होइए और आपने पुत्र नरकासुर के सभी अपराधों को क्षमा कीजिये भले ही आपने अपने पुत्र को निर्दोष करने के लिए स्वयं ही मार डाला हैं। मेरे ऊपर प्रसन्न होकर ही आप मेरा भार उतारने के लिए अपने अंश से इस लोक में अवतीर्ण हुए हैं।        

          तदन्तर भगवान विष्णु ने पृथ्वी से कहा "तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो " और फिर नरकासुर के महल से तमाम प्रकार के रत्न लिए। और नरकासुर के कन्याओं के अंतःपुर में जाकर 16100 कन्याएँ देखी, तथा चार दाँत वाले 6000 हाथी और 210000 कम्बोजदेशीय घोड़े देखे,  उन कन्याओं और हाथी घोड़ो को श्री कृष्ण ने नरकासुर के सेवको द्वारा तुरंत द्वारिकापुरी पहुँचवा दिया, इसके बाद भगवन ने वरुण का क्षत्र और मंदरांचल का मणिपर्वत देखा उन्हें उठाकर उन्होंने पक्षीराज गरुण पर रख लिया और सत्यभामा सहित स्वयं उसी पर चढ़कर अदिति का कुण्डल देने के लिए स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान किया। और स्वर्गलोक से लौटने के बाद उन्होंने 16100 कन्याओं से विवाह किया । पहले उनकी 8पत्नियाँ थीं इसके बाद 16108 पत्नियाँ हो गई ।

      तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट करके अवश्य बताएं,                                                 ✓ धन्यवाद ✓ 

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