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राजा ययाति की कथा, विष्णु पुराण की पौराणिक कथा

राजा ययाति की कथा,            

       वासना का प्यासा राजा ययाति की कथा
नमस्कार दोस्तों
                   मै राहुल आप सभी का स्वागत करता हूं मेरे ब्लॉग पर । आज की कथा विष्णु पुराण के ४ अंश के १०  अध्याय में उल्लेखित है।

        कथा के अनुसार राजा नहुष के यति, ययाति, सयाति, आयति, वियाति और कृति नामक 6 महाबलशाली पुत्र थे । यति को राजभोग की इच्छा नहीं थी इसलिए ययाति को राजा बनाया गया। ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किया।देवयानी से यदु और तुर्वसू तथा शर्मिष्ठा से दृद्यु,  अनु,  और पूरक को उत्पन्न किया ।

          किसी कारण वश ययाति को शुक्राचार्य के श्राप के कारण असमय ही वृद्धावस्था ने घेर लिया , और कुछ समय के उपरांत शुक्राचार्य के प्रसन्न होकर कहने पर ययाति ने अपनी वृद्धावस्था को ग्रहण करने के लिए अपने बड़े पुत्र यदु से कहा कि वत्स तुम्हारे नाना के श्राप के कारण असमय ही मुझे वृद्धावस्था ने घेर लिया

       अतः अब उनकी कृप्या से मै यह वृद्धावस्था तुम्हे देकर तुमसे युवावस्था की कामना करता हूं क्योंकि मै अभी विषय भोगो से तृप्त नहीं हुआ हूं इसलिए 100 वर्ष तक मै तुम्हारी युवावस्था से भोगना चाहता हूं।

        किन्तु पिता के ऐसा कहने पर यदु ने वृद्धावस्था लेने और युवावस्था देने से इंकार कर दिया । तब क्रोधित ययाति ने अपने पुत्र यदु को श्राप दिया कि तेरी संतान राजपद के योग्य नहीं होगी। अतः फिर ययाति ने तुर्वस, ड्रुद्यू,और अनु से अपना युवावस्था देकर वृद्धावस्था ग्रहण करने की बात कही ।
 
                  
         लेकिन सभी के इंकार करने पर ययाति ने उन सभी को श्राप दे दिया । अंत में सबसे छोटे शर्मिष्ठा के पुत्र पुरू से भी यही बात कही तो उसने अपने पिता को प्रणाम करके उदारता पूर्वक बोला कि" यह तो मेरे लिए सौभाग्य की बात है। यह कहकर पुरू ने अपने पिता की वृद्धावस्था ग्रहण के अपना यौवन ययाति को से दिया। राजा ययाति ने पुरू का यौवन लेकर यथेच्छा  विषयो का भोग किया । तथा अपनी प्रजा का भली प्रकार से पालन करने लगे।

       फिर विश्रवी और देवयानी के साथ विविध भोगी का भी करते हुए । मै समस्त कामनाओं का अंत कर दूंगा ऐसा सोचते सोचते वे प्रतिदिन उत्कण्ठित रहने लगे । लेकिन भोगी की तृष्णा (भूख) फिर भी शांत नहीं हो रही थी । अग्नि में घी के समान बढ़ती है जाती। सम्पूर्ण पृथ्वी पर जितनी भी ऐश्वर्य को वस्तुएं थी सम्पूर्ण वस्तुओं का भोग किया लेकिन उनकी कामना कम न हुई ।

      अतः जब उन्हें ज्ञात हो गया कि कामनाओं का कोई अंत नहीं । तब उन्होंने सोचा कि अब मै इसे छोड़कर भगवान में ही अपने मन को स्थित करूंगा । तत्पश्चात राजा ययाति ने पुरू से वृद्धावस्था लेकर उसका यौवन दे दिया । और उस राज्य सौंपकर  तपस्या करने वनं में चले गए।

        दोस्तों यह कथा कैसी लगी कॉमेंट में जरूर बताएं और ऐसी ही रोचक कथा पढ़ने के लिए बने रहे हमारे साथ।     ✓ धन्यवाद ✓

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