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छींक से जन्मे थे राजा ईक्ष्वाकु.

      पौराणिक कथा             

छींक से जन्मे थे महाराज इक्ष्वाकु

नमस्कार दोस्तों

          मैं राहुल आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ मेरे पोस्ट पर. आज कि कथा जो मैं लेकर आया हूँ  इसका वर्णन विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के दूसरे अध्याय में किया गया है. इक्ष्वाकु के वश के वर्णन के नाम से।


         पृथ्वी पर इक्ष्वाकु वंश के संस्थापक और इक्ष्वाकु वंश के पहले राजा थे। महाराज इक्ष्वाकु जिनके जन्म कि घटना बहुत ही विचित्र है । क्योंकि इनका जन्म बिना माता के हुआ बताया गया है विष्णु पुराण में । विष्णु पुराण के अनुसार छींकने के समय महाराज मनु कि घ्राणेन्द्रियों से ईक्ष्वाकु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

         ईक्ष्वाकु के 100 पुत्र थे जिनमे विकुक्षि, निमि, और दण्ड  नामक तीन पुत्र प्रधान थे। तथा उनके पुत्र शकुनि आदि 50 पुत्र उत्तरापथ के और शेष 48 पुत्र दक्षिणापथ के शासक हुए। एक बार इक्ष्वाकु ने अष्टका श्राद्ध का आरम्भ किया। और आपने पुत्र विकुक्षि को आज्ञा दी कि श्राद्ध के योग्य मांस ले आओ।

          पिता कि आज्ञा सुनकर विकुक्षि बोला ठीक है पिता जी मैं अभी गया और मांस लेकर आया।  और पिता कि आज्ञा सिरोधार्य कर धनुष बाण उठाया और जंगल को निकल गया।  जंगल पहुंच कर वह शिकार कि तलाश में इधर उधर  भटकने लगा.  उसने अनेक मृगों  और खरगोशो का शिकार किया।
                
          लेकिन काफी समय व्यतीत हो जाने के कारण और ज्यादा घूमने के कारण वह बहुत थक गया था साथ ही भूख ने भी व्याकुल कर रखा था। अतः अत्यंत भूखा होने के कारण विकुक्षि ने शिकार किये मृगों और खरगोशो में से एक खरगोश को खा लिया। और तमाम शिकार किये मृगों और खरगोशो को लेकर महल पहुंचा और सभी शिकार किये हुए शिकारों को अपने पिता के सामने निवेदित किया।

       महाराज इक्ष्वाकु इतने सारे शिकारों के देखकर अत्यंत खुश हुए और मन ही मन अपने पुत्र को शाबाशी भी दी। अब महाराज इक्ष्वाकु ने उस मांस का पोक्षण करने के लिए अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी से प्रार्थना की । इक्ष्वाकु के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर ज़ब कुल पुरोहित वशिष्ठ जी ने उस मांस का परिक्षण किया तो बोले कि  हे राजन यह मांस तो अपवित्र है।

      तुम्हारे चांडाल पुत्र ने इसे भ्रष्ट  कर दिया है. क्योकि उसने इसमें से एक खरगोश को खा लिया है. गुरु के ऐसा कहने पर महाराज इक्ष्वाकु ने अपने पुत्र विकुक्षि का त्याग कर दिया और तभी से विकुक्षि का नाम शशाद पड़ा. तथा पिता इक्ष्वाकु कि मृत्यु के पश्चात्  शशाद  ने पृथ्वी पर धर्मनुसार शासन किया.

         दोस्तों आपको कहानी कैसी लगी कमेंट करके अवश्य बताएं.                                                                                                                                   ✓ धन्यवाद ✓

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