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अर्जुन हारे साधारण लुटेरे से,

              अर्जुन हारे युद्ध साधारण लुटेरों से
नमस्कार दोस्तों

     महारथी अर्जुन को कौन नहीं जानता महाभारत के इस योद्धा ने महाभारत का परिणाम ही बदल दिया । पाण्डु कुंती पुत्र अर्जुन जोकि भगवान कृष्ण के मित्र और भक्त दोनों थे। जिसके सामने सभी महारथी सिर झुकाते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया की अर्जुन को कुछ सामान्य लुटेरों से हार का सामना करना पड़ा। जिसका वर्णन विष्णुपुराण में 5 वें अंश के 38 अध्याय में किया हैं कथानुसार...


      यह घटना उस समय की हैं. ज़ब भगवान कृष्ण और बलराम जी के समेत समस्त यादवो का नाश हो जाता हैं। और अर्जुन समस्त यादवो की स्त्रियों और धन संपदा के साथ इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान(निकलते) करते हैं। और रास्ते में उन्हें कुछ ग्रामीण लुटेरे देख लेते हैं तथा स्त्रियों और धन संपत्ति को देखकर उनके मन में लालच आ जाता हैं  और कहते हैं की देखो यह धनुर्धारी अर्जुन अकेला ही हमारा अतिक्रमण करके इन अनाथा स्त्रियों को ले जा रहा हैं।

     हमारे ऐसे बल पुरुषार्थ को धिक्कार हैं। हमारे हाथो में लाठी देखकर यह दुर्बुद्धि धनुष लेकर हमारी अवज्ञा करता हैं। यह कर्ण, द्रोण, भीष्म, आदि को धोखे मारकर ही इतना अभिमानी हुआ हैं। हमारी इन ऊँची ऊँची भुजाओं का क्या लाभ। ऐसा विचार करके वे सैकड़ों लुटेरे लाठी और डंडे लेकर द्वरिकावशीयों पर टूट पड़ते हैं। लुटेरों का ऐसा दुस्साहस देखकर महाबली अर्जुन लुटेरों को झिड़ककर हँसते हुए कहते के की "अरे पापियों अगर तुम्हे मरने की इच्छा न हो तो अभी लौट जाओ अगर मारना हैं तभी अपने पैर आगे बढ़ाना।
       
       लेकिन लुटेरों ने अर्जुन पर थोड़ा सा भी ध्यान नहीं दिया। और समस्त यादवों की धन संपत्ति और स्त्रियों को अपने आधीन कर लिया। तब क्रोधित वीर अर्जुन ने युद्ध के उद्देश्य से अपने गाण्डीव धनुष को चढ़ाना चाहा किन्तु अर्जुन ऐसा नहीं कर पाए, बड़ी मुश्किल से अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष की प्रत्यंचा मतलब डोरी चढ़ा भी ली तो वें शिथिल हो गये । और बहुत सोचने करने के बाद भी उन्हें अपने अस्त्रों का स्मरण ही नहीं हुआ।
   
       तब अर्जुन क्रोधित होकर लुटेरों पर बाण बरसाने लगे। किन्तु गांडीवधारी अर्जुन के छोड़े हुए बाणों ने लुटेरों की त्वचा को ही बींधा, अग्नि के दिए हुए अक्षय बाण भी लुटेरों का कुछ भी न बिगड़ पाए। यह देखकर अर्जुन ने सोचा की मैंने जो अपने बाहुबल से अनेक राजाओ को जीता था । वास्तव में वह सभी भगवान कृष्णा का ही प्रभाव था। अर्जुन के देखते देखते वें लुटेरे उन स्त्रियों को खींच खींचकर ले जाने लगे ।
     
           और कुछ स्त्रियां अपनी इच्छानुसार इधर उधर भागने लगीं. बाणों के समाप्त हो जाने पर वीर अर्जुन ने धनुष की नोंक से प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया लेकिन वे लुटेरे उन प्रहारों की और भी हँसी उडाने लगे। इस प्रकार अर्जुन के देखते देखते वें सामान्य लुटेरे उन स्त्रियों और सम्पूर्ण धन संपत्ति को लेकर चले गये ।
     
         और असहाय अर्जुन दुखी मन से रोते हुए कहने लगे की "अहो मुझे तो उन भगवान ने ही लूट लिया, देखो वहीँ धनुष हैं,  वहीँ अस्त्र हैं, वहीँ घोड़े, वहीँ रथ हैं, किन्तु दिए गये दान के सामान सभी एक साथ नष्ट हो गये. देखो येे वहीँ भुजाएँ हैं, वहीँ मेरी मुष्टि हैं, वहीँ कुरुक्षेत्र हैं,  और मैं वहीँ अर्जुन हूँ, लेकिन भगवान कृष्ण के बिना आज सभी सारहीन हो गये । अवश्य ही मेरा अर्जुनत्व और भीम का भीमत्व सब भगवान कृष्णा की कृपा से ही था । देखो उनके बिना आज महारथियों में श्रेष्ठ मुझे अर्जुन को तुच्छ साधारण लुटेरों ने जीत लिया । इस प्रकार विलाप करते हुए अर्जुन अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ लौट आये ।
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