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देवी यमुना को क्यो मारना चाहते थे बलराम जी

                                 
                        देवी नर्मदा को क्यों मारना चाहते थे बलराम जी
नमस्कार दोस्तों

             आज मैं जो कथा लेकर आया हूँ उस कथा का वर्णन विष्णुपुराण के पाँचवे अंश के 25 वें अध्याय में किया गया है। यह घटना कंश की मृत्यु के पश्चात् ज़ब बलराम जी ब्रज यात्रा को निकलते है तब की है. कथानुसार........


           एक बार बलराम जी अपने गोप मित्रों के साथ वन में विचरण (टहल ) रहे थे। उन्हें घूमते देखा वरुण ने वरुणि (मदिरा) से कहा की " हे मदिरे जिन महाबलशाली अनंन्त को तुम सर्वदा अत्यंन्त प्रिय हो,  हे शुभे तुम उनके उपभोग और प्रसन्नता के लिए वहाँ जाओ। वरुण की ऐसी आज्ञा होने पर वरुणी वृन्दावन में उत्पन्न कदम्ब वृक्ष के कोटर में रहने लगी।

             तब बलदेव जी को वन में विचरते हुए मदिरा की अति उत्तम खुशबू सूँघने से उसे पीने की इच्छा जागृत हुई। उसी समय कदम्ब वृक्ष से मदिरा की धारा गिरते देखा हलधारी बलराम बड़े खुश हुए। तथा गांने बजाने में कुशल गोप और गोपियों के मधुर स्वर में गाते हुए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मदिरा का पान किया।

           तत्पश्चात अत्यंत भीषण गर्मी के कारण स्वेत बिंदुरूप मोतियों से सुशोभित मदोन्मत्त बलराम जी विह्वल हो कर कहा की " हे यमुने यहां आ मैं स्नान करना चाहता हूँ"। लेकिन उनके मदोन्मत्त शब्द को प्रलाप मतलब मजाक समझकर यमुना ने उन पर ध्यान नहीं दिया और वहाँ नहीं आयी।

        इसपर क्रोधित हलायुध ने अपना हल उठा लिया और मद में चूर होकर यमुना को अपने हल की नोक से पकड़कर खींचते हुए बोले की "अरे पापिन तू यहां क्यों नहीं आयी। अब अगर शक्ति है तो कहीं और जाकर दिखा. इस प्रकार अकस्मात् खींचने पर यमुना ने अपना मार्ग छोड़ दिया और जहाँ बलराम जी खड़े थे । उसे अप्लावित्त कर दिया।

        तब यमुना शरीर धारण करके बलराम जी के पास आयी और भयवश डबडबाती आँखों से कहने लगी "हे मुसळधारी बलराम मुझे छोड़ दो.  मुझे क्षमा करें, आप प्रसन्न हो. ऐसी मधुर वाणी सुनकर बलराम जी ने कहा "अरे नदी क्या तू मेरे बल शौर्य की अवज्ञा करती है। देख इस हल से अभी तेरे हजारों टुकड़े कर डालूंगा. इस प्रकार के भयंकर क्रोध को देखकर यमुना नदी तुरंत वहाँ बहने लगी।

       तब बलराम जी ने उस नदी में स्नान किया. और तभी वहाँ उस नदी से लक्ष्मी जी प्रकट हुई और और बलराम जी को एक कुण्डल, कर्णफूल, एक वरुण द्वारा भेजी गई कभी न कुम्लाने वाली कमल पुष्पमाला और दो समुद्र के सामान कांतिवाले नीले वस्त्र प्रदान किये।

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं.                                                 ✓धन्यवाद ✓

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