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एक लाख पत्नियां,दस लाख पुत्र थे इस राजा को

                       विष्णु पुराण की कथा                

      राजा ज्यामाघ की कथा

नमस्कार दोस्तों
               आज जो कथा लेकर आया हू उसका वर्णन विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के 12 वें अध्याय में किया गया है। दोस्तों एक चक्रवर्ती राजा हुए जिनका नाम था शशिबिंदु । ये चौदह रत्नों के स्वामी थे।

          शशिबिन्दु के एक लाख पत्निया और दस लाख पुत्र थे। उनमे पृथुश्रवा, पृथुकर्मा, पृथुकीर्ति, पृथुनजय, पृथुश्रवा और पृथुदान ये छः पुत्र प्रधान थे। पृथुश्रवा का पुत्र पृथुतम तथा उसका पुत्र उसना हुआ। जिसने 100अश्वमेघ यज्ञ किया था।

         तथा उसना से परावृत नामक पुत्र हुआ.  परावृत का पुत्र था ज्यामघ.  ज्यामघ कि पत्नी का नाम था शैव्या.  ज्यामघ और शैव्या  को कोई संतान न थीं लेकिन पत्नी के भय से ज्यामघ ने दूसरा विवाह नहीं किया। एक बार ज्यामघ अपने समस्त शत्रुओँ के  विनाश के लिए अपनी समस्त सेना के साथ निकला। और सभी से युद्ध करते हुए और उन्हें हराते हुए आगे बढ़ रहा था।

          वो जिधर का रुख करता हाहाकार मच जाता। ऐसा करते हुए वह एक बार एक राज्य कि सीमा पर पंहुचा। ज़ब उस राज्य के राजा और मंत्रियों को यह बात पता चली तो वे सब अपना राज्य धन धान्य छोड़कर भगवान निकले।
          ज़ब राजा ज्यामघ उस राज्य में घुसा तो उसे एक चीख सुनाई दी कि "हे तात  हे माता  हे भ्राता" ज़ब राजा उस आवाज कि ओर गया तो देखा एक राजकन्या जोकि अत्यंत भयभीत थीं। "मेरी रक्षा करो मेरी रक्षा करो" कहकर विलाप कर रही थीं।

 
    यह देखकर राजा के मन में विचार आया कि यह तो बहुत अच्छा हुआ। शायद विधाता ने मुझ संतानहीन के लिए इस राजकन्या को भेजा है। ताकि मै इससे संतान उत्पन्न के सकूं। इसलिए मुझे इससे विवाह कर लेना चाहिए । इसे अपने निवास स्थान के चलता हूं वहां देवी शैव्या से पूछकर इससे विवाह कर लूंगा । अतः उस कन्या को लेकर वह नगर को निकला । उधर विजयी राजा के दर्शन के लिए समस्त नगरवासी सहित रानी शैव्या नगर के द्वारा पर आयी हुई थीं,

       ज़ब रानी राजा के बाये बैठी उस राजकन्या को देखा तो क्रोध के कारण कांपते हुए होठो से कहा कि "हे अति चपलाचित तुमने रथ में किसे बैठा रखा हैं। अब राजा अपनी पत्नी से डरता तो था ही अतः यह सवाल सुनकर अत्यंत भयभीत हो गया और भयवश बोला कि यह तो मेरी पुत्रवधु हैं।

      तब शैव्या बोली कि मेरा तो कोई पुत्र भी नहीं हैं और न ही तुम्हारी दूसरी स्त्री फिर किस पुत्र के कारण यह तुम्हारी पुत्र वधु हुई। क्रोध रहित वचनो के विवेकहीन होकर भय के कारण संदेह दूर करने के लिए राजा ने कहा "तुम्हारा जो पुत्र होने वाला हैं उसकी भार्या (पत्नी ) मैंने पहले ही निश्चित कर दी हैं।

       यह सुनकर रानी शर्माकर मधुर मुस्कान के साथ बोली "अच्छा जी ऐसा ही हो " aur राजा के साथ नगर में प्रवेश किया.  तदन्तर पुत्र लाभ के गुणों से युक्त उस अति विशुद्ध  लग्न  होरांसक अवयव के समय हुए पुत्रजन्म विषयक  वार्तालाप के प्रभाव से गर्भधारण कि अवस्था न होने के कारण भी थोड़े ही दिनों में रानी शैव्या गर्भवती हो गई और  यथासमय एक पुत्र उत्पन्न हुआ.  और उसी पुत्र से उस उठाकर लायी हुयी राजकन्या का राजा ज्यामघ ने विवाह करवा दिया.

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                                            ✓धन्यवाद ✓

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