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इस मंत्र के जाप से सांप कभी नहीं कटेगा. विष्णु पुराण के अनुसार

                  
नमस्कार दोस्तों
                  आज की कथा विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के तृतीय अध्याय में उल्लेखित है। कथा के अनुसार राजा युवनश्वा के पुत्र मान्धाता का पुत्र था ।पुरुकुत्स जो न्याय प्रिय तथा प्रजापालक था जो प्रजापति के हित में सदैव तत्पर रहता था।  इसलिए प्रजापति भी उससे बहुत प्रेम करती थीं।

            उसी समय पाताललोक में मौनेय नामक 6 करोड गन्धर्व रहते थे।उन्होंने समस्त नागकुलों के प्रधान रत्न और अधिकार छीन लिए थे। गन्धर्वो के पराक्रम से अपमानित होकर नागों ने भगवन विष्णु कि प्रार्थना कि नागेश्वरों के द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवन विष्णु ने उनको दर्शन दिए और स्तुति का कारण पूछा तब नागगणों ने नारायण को प्रणाम करके कहा कि  "हे प्रभु आप तो अन्तर्यामी हो आप से भला क्या छिपा हैं।
               
         आप तो जानते ही हैं कि इन गन्धर्वो ने हमरा जीवन दूभर कर रखा हैं।इन गन्धर्वो द्वारा उत्पन्न भय किस प्रकार शांति हो आप ही कुछ निवारण बताएं। तब आदि अंत रहित भगवन पुरुषोत्तम ने कहा कि "हे नागेश्वरों आपकी भय का निवारण मैं अवश्य करूँगा,  युवनाश्व  के पुत्र मान्धाता का यह जो पुरुकुत्स नामक पुत्र हैं। उनमे प्रवेश कर मैं समस्त गन्धर्वो का नाश करूँगा। 

         यह सुनकर समस्त नागगणों ने भगवन नारायण को प्रणाम किया और नागलोक वापस लौट आये। और पुरुकुत्स लाने के लिए अपनी बहन और पुरुकुत्स कि पत्नी नर्मदा को प्रेरित किया। सारी बात जानकर सारी व्यथा समझकर नर्मदा पुरुकुत्स को पाताललोक ले आयी। 
                 
            पाताललोक पहुंचने पर भगवन विष्णु के तेज के कारण पुरुकुत्स का शारीरिक बल बहुत ज्यादा बढ़ गया। और बल बढ़ जाने पर पुरुकुत्स ने समस्त गन्धर्वो के नाश्ता कर दिया। और फिर अपने नगर लौट आया। उन समस्त नागों ने नर्मदा के कार्य से खुश होकर वरदान दिया कि जो तेरा स्मरण करते हुए तेरा नाम लेगा।  उसको सांप के विष से कोई भय नहीं रहेगा। इस विषय में यह श्लोक भी हैं।

नर्मदा मंत्र इससे नहीं काटते सांप

अर्थात " नर्मदा को प्रातःकाल नमस्कार है । और रात्रि को भी नर्मदा को नमस्कार है। है नर्मदे तुम्हारा बारम्बार नमस्कार है । तुम मेरी बिष और सर्प से रक्षा करो । 
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         इसका उच्चारण करते हुए किसी समय भी अंधकार में जाने से सांप नहीं काटता तथा इस मंत्र का स्मरण कर भोजन करने वाले का खाया विष भी घातक नहीं होता । वहीं पुरुकुत्स को नागों ने यह वरदान दिया कि तुम्हारे वंश का कभी अंत नहीं होगा. पुरुकुत्स ने नर्मदा से त्रसदस्यु  नामक पुत्र उत्पन्न किया.  त्रसदस्यु से अनरण्य उत्पन्न हुआ जिसे रावण ने अपनी दिग्विजय से समय मारा था।
           
         तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं.  धन्यवाद 

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