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राजा पुरंजय की कथा ।

राजा पुरंजय की कथा ।      

                    महाराज पुरंजाय की कथा
नमस्कार दोस्तों
                    आज मैं आपके लिए शशाद के परमवीर पुत्र पुरांजय की कथा लेकर आया हूं। जिसका वर्णन विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश के द्वितीय अध्याय में किया गया है। दोस्तों शशाद का परम बलशाली पुत्र हुआ पुरंजय।
       

          एक बार जब देव और असुर का युद्ध हुआ और दैत्यों ने देवताओं को हराकर स्वर्गलोक पर कब्ज़ा कर लिया। तब देवताओं भगवन विष्णु कि शरण में गये  और भगवन विष्णु से बोले कि हे भगवन आपको तो सब पता हैं कि दैत्यों ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया हैं। अतः आप हमारे कष्टों का निवारण करें

       यह सुनकर भगवन नारायण बोले कि हे देवताओं राजर्षि शशाद का जो पुरंजय नामक पुत्र हैं उस क्षत्रिय श्रेष्ठ के शरीर अंशमात्र स्यंम  मैं अवतरित होकर.  उन सभी दैत्यों का नाश करूँगा। अतः तुम लोग पुरंजय को युद्ध के लिए तैयार करो।  यह सुनकर देवताओं ने भगवान को प्रणाम किया और महराज पुरंजय के पास आकर बोले कि हे राजन  हम लोग चाहते हैं कि अपने शत्रु वध में प्रवृत्त हम लोगो कि आप सहायता करें।
                   

         हम अभ्यागत जनो का आप मान भांग न करें। यह सुनकर पुरंजय ने कहा कि आप  लोगो के त्रैलोक्यनाथ  शतक्रतु इंद्र है।  यदि मैं इनके कंधे पर चढ़कर युद्ध कर सकूँ तो आप लोगो का सहायक हो सकता हूँ। यह सुनकर समस्त देवतागणों ने उकसाना कथन स्वीकर कर लिया।

       फिर वृषभरूपी इंद्र के कंधे पर चढ़कर चराचर गुरु भगवान विष्णु के तेज से परिपूर्ण होकर राजा पुरंजय ने रोषयुक्त सभी दैत्यों को मार  गिराया। उस राजा ने बैल कुंकुद्ध  पर मलतब बैल के कंधे पर चढ़कर दैत्यों का नाश किया इसलिए कुकुत्स्थ कहलाये ।
         
                दोस्तों कथा कैसी लगी कमेंट के माध्यम  से जरूर बताएं.                                                                                                                                                                      ✓धन्यवाद ✓

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