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देवराज इन्द्र ने अपने भाई को क्यों काट डाला ।

                    देवराज इन्द्र ने अपने भाई को क्यों काट डाला    

      इंद्र ने अपने भाई को क्यों काट डाला गर्भ में
नमस्कार दोस्तों
           आज मै जो कथा लेकर आया हूं इसका वर्णन रामायण बालकाण्ड के 46 सर्ग में किया गया है। दोस्तों दिति और अदिति दक्ष प्रजापति की पुत्रियां थीं जिनका विवाह मरीच पुत्र कश्यप से हुआ था। अदिति का पुत्र इंद्र जो देवताओं का राजा हुआ, और दिति के पुत्र दैत्यगण श्रेष्ठ हुए। इस कथा का प्रारम्भ समुद्र मंथन में उत्पन्न अमृत को लेकर झगडे से होता हैँ।  जिसमे अदिति पुत्र इंद्र और समस्त देवता भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की लीला के चलते अमृत का पान कर लेते हैँ और दैत्यगण अमृतपान से वंचित रहा जाते हैँ, तथा सभी दैत्य अमृतपान कर चुके देवताओं द्वारा मारे जाते हैँ जोकि दिति के पुत्र थे।
     
        दिति अपने पुत्रों के मारे जाने पर अत्यंत दुखी होकर मरीच के पुत्र और अपने पति कश्यप से कहती हैँ की "हे भगवन  तुम्हारे बलवान पुत्रों ने मेरे पुत्रों को मार डाला हैँ अतः मैं इंद्र को मारने वाला पुत्र चाहती हूँ भले ही वह घोर तप से ही क्यों न प्राप्त हो, उसके लिए मैं तप करुँगी, आप मुझे ऐसा गर्भ दीजिये. जिससे महाबलशाली, महाविजयी, दृढबुद्धि वाला समदर्शी, तीनों लोकों के स्वामी इंद्र को मारने वाला जन्मे। तब यह वचन सुनकर तब यह वचन सुनकर मरीच पुत्र कश्यप जी अत्यंत दुखी दिति से बोले की "तेरा कल्याण हो, और तू जैसा चाहती हैँ वैसा ही हो, तू पवित्र हैँ, तू ऐसे ही पुत्र को जन्म देगी जो इंद्र को मारने वाला होगा. किन्तु यह पुत्र तभी होगा ज़ब तू 1000साल तक पवित्रता से रहेगी. मेरे अनुग्रह से तीनों लोकों का स्वामी तेरे गर्भ से उत्पन्न होगा.  इस प्रकार कहकर और आशीर्वाद देकर मुनि कश्यप तपस्या करने चले गये।

     और दिति प्रसन्न होकर कुशप्लव नामक वन में जाकर घोर तप करने लगीं।यह सब जब इंद्र को पता चला की दिति के गर्भ में गर्भ में मुझे मारने वाला पल रहा हैँ तो वह दिति पास गया और उनकी सेवा करने लगा ताकि अवसर मिलने पर अपने काल को वह मार सके। इंद्र बड़ी भक्ति से दिति की सेवा करने लगे, अग्नि, कुश, लकड़ी, फल, फूल, आदि जिन जिन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती, इंद्र बड़े विनय भाव से उसको लाकर देते थे। और तप करने के बाद ज़ब दिति का शरीर थक जाता था तो इंद्र उसका शरीर भी दबाया करते थे।

      इंद्र तन मन से दिति की सेवा में लगे रहते थे सिर्फ एक अवसर की तलाश में, इस प्रकार तप करते हुए ज़ब तप के पूरा होने में 10 वर्ष शेष रह गया। तब दिति ने इन्द्र को प्रसन्नचित होकर कहा की "हे इंद्र तुम्हारे पिता ने मुझे मांगने पर 1000 वर्ष पवित्रता से बिताने पर पुत्र होने का वरदान दिया हैँ और तप पूरा होने में 10 वर्ष शेष रह गया हैँ। अतः इसके बाद तुम अपने भाई को देखोगे, यह बात अलग हैँ की  मैं उसे तुम्हे जीतने के लिए उत्पन्न करना चाहती हूँ। तथा उसके उत्पन्न होने के पश्चात् उसके साथ तुम तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर तीनों लोकों का राज्य सुख भोगोगे, तुम किसी बात की चिंता मत करो।

          दिति और इंद्र के बीच बातचीत होते हुए दो पहाड़ कब बीत गये उन्हें पता ही नहीं चला। इसलिए दिति को नींद आने लगीं और वह पैताने की ओर सिर करके उल्टा उल्टा सो गई। उसको सिराहने की ओर पैर और पैताने की सिर करके सोई हुई अपवित्र दशा में देखकर इंद्र बहुत खुश हुआ और हँसकर दिति के गर्भाशय में प्रवेश कर गया।

          तथा धैर्यवान इंद्र ने अपने अंसख्य धार वाले बज्र से गर्भस्त बालक के शरीर के सात टुकड़े कर डालें. इसपर गर्भस्त बालक जब रोने लगा, तब दिति की नींद टूटी, और इधर बालक को इंद्र कह रहा था नी मत रो, चुप हो जा, और रोते हुए बालक को इंद्र पुनः काटने लगा। इस पर दिति ने इंद्र से कहा की "अरे पापी इस बालक को मत मार इसने तो अभी धरती पर कदम भी नहीं रखा.

           यह सुनकर इंद्र माता का कहना मानकर बाहर आ जाते हैँ और बज्र सहित हाथ जोड़कर माता दिति से कहते हैँ की "हे देवी तू पैरो की ओर सिर और सिर की ओर पैर करके सोई हुई थीं. इसलिये तुम अपवित्र हो गई, इस प्रकार मैंने अवसर पाकर मैंने अपने मारने वाले के सात टुकड़े कर डाले, चूँकि वह मेरा नाश करने वाला था इसलिए मैंने ऐसा कर्म किया, इसके लिए तू मुझे क्षमा कर दें। अब गर्भ के सात टुकड़े तो हो ही गये थे, साथ ही दिति को अपनी गलती का अहसास भी हो गया था।

       अतः वह इंद्र से बोली की "हे इंद्र इसमें तुम्हारा कुछ भी अपराध नहीं हैँ।यह गर्भ तो बिगड़ ही चुका हैँ, इसपर भी मैं तुम्हारा और अपना हित ही चाहती हूँ. अतः ये सात 49 पवनो के स्थानपाल हो, दिव्यरूप वाले मेरे ये सात पुत्र बालस्कन्ध मारुत के नाम से विख्यात होकर आकाश में विचरण करें, इनमे से एक ब्रम्ह्लोक में, दूसरा इंद्रलोक में,  और तीसरा वायु के नाम से आकाश में घूमें, हे इंद्र शेष मेरे चारों पुत्र देवता बनकर तुम्हारी आज्ञा से चारों दिशाओं में घूमा करें, और ये सबके सब तुम्हारे रखे मारुत नाम से प्रसिद्ध हो. मुझे ऐसा वचन दो. ये वचन सुनकर इंद्र ने दिति से हाथ जोड़कर बोले की "हे माते आपने जैसा कहा हैँ, निश्चय ही वैसा ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं हैँ, तुम्हारे पुत्र देवरूप होकर ही विचरण करेंगे, तू निश्चिन्त रह,  इस प्रकार समझौता कर दिति और इंद्र अपने अपने स्थान वापस लौट आये।

            तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगीं हमें कमेंट में अवश्य बताएं,            ✓ धन्यवाद ✓

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