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क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने, Part-1

                 क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र     

                       
                        क्षत्रिय से ब्राम्हण बने विश्वामित्र
नमस्कार दोस्तों
            यह कथा वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड के 51 सर्ग से लेकर 65 सर्ग के मध्य उल्लेखित है। दोस्तों बहुत कम लोग जानते है कि श्री रामचंद्र जी के गुरु विश्वामित्र जी क्षत्रिय थे।औऱ क्षत्रिय होने के साथ साथ वे एक प्रजापालक राजा भी थे जिनके पास एक अक्षौहिणी सेना थीं। लेकिन उनकी जीवन में कई महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटी जिसके चलते उन्होंने अपना राजपाठ त्यागकर कठोर तप शुरू कर दिया। उन घटनाओँ में विश्वामित्र जी ने कई बार वशिष्ठ जी से युद्ध भी किया. राजा त्रिकुंश को शशरीर स्वर्ग पहुंचाया, उनकी तप से डरकर इंद्र ने कई बार उनकी तपस्या भंग की, औऱ भी कई रोचक घटनाएं घटी जो विश्वामित्र के तप में बाधाएं बनी जिनका वर्णन मैंने इस लेख में किया हुआ है विस्तार से....

      दोस्तों राजा गाधि के पुत्र थे महर्षि विश्वामित्र जिन्होंने राजा बनकर हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया। एक बार राजा विश्वामित्र अपनी अक्षौहिणी सेना इकठ्ठा कर सेना के साथ घूमने निकले। और अनेकों राज्यो ,वनो ,पर्वतों में घूमते हुए वे ब्रम्हर्षि वशिष्ठ जी के आश्रम में पहुंचे। वशिष्ठ जी का आश्रम तमाम प्रकार के जीवों से सुशोभित था। देव दानव गंधर्व उनके आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। वह आश्रम सदैव महत्मावो से भरा रहता था।  कोई जल पीकर, कोई वायु पीकर, तो कोई सूखे पत्ते खाकर जीवित रहता था, अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखने वने तमाम ऋषि मुनि उस आश्रम में जप,तप,और हवन इत्यादि करते थे।

        यह देखकर राजा विश्वामित्र अत्यंत प्रसन्न हुए और मुनि वशिष्ठ जी को प्रणाम करके उनके पास बैठकर उनसे विचार विमर्श करने लगे, और वशिष्ठ जी ने भी महाराज का सत्कार करने के लिए उन्हें फल कंद मूल खाने को दिए, बहुत देर तक दोनों में विचार विमर्श होता रहा, और जब विचार विमर्श संपन्न हुआ । तब विश्वामित्र ने प्रस्थान करने की बात कही, तथा उत्तर में वशिष्ठ जी बोले कि हे राजन आपका अतिथि सत्कार तो मैंने कर दिया, मै चाहता हूं कि आपके साथ ये जो आपकी सेना है उनका भी मै अतिथि सत्कार करू, तब विश्वामित्र ने सोचा कि मेरी इतनी बड़ी सेना वशिष्ठ जी इंन सबका सत्कार कैसे करेंगे, अतः उन्होंने वशिष्ठ जी कहा कि हे मुनि आपको चिंता करने कि विल्कुल भी आवश्यकता नहीं है, अतः आप मुझे प्रस्थान करने कि आज्ञा दें,

          लेकिन वशिष्ठ जी अपनी जिद पर अड़े रहे, तब विश्वामित्र जी ने कहा कि ठीक है आप जिसमे प्रसन्न रहे वहीँ ठीक है, ऐसा कहकर विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ जी का निमंत्रण स्वीकर कर लिया, तब वशिष्ठ जी ने अपनी प्यारी गाय कामधेनु को बुलाया औऱ बोले कि हे शबले मैं सेना सहित राजर्षि विश्वामित्र कि पहुनाई करना चाहता हूँ, अतः तू मेरे कहने से तू अच्छे अच्छे भोजनो से, पटरसो के पदार्थो में से जिसको जो रस चाहिए उसको वहीँ पहुंचना, क्योंकि तुम कामधेनु ठहरी तुम क्या नहीं दें सकती,  इस प्रकार आज्ञा पाकर कामधेनु ने जिसको जो चाहिए था वह पहुंचाया, तथा सब पदार्थो को कहा पीकर राजा विश्वामित्र सहित सम्पूर्ण सेना तृप्त हो गई,

        कामधेनु इस विशेषता को देखकर राजा विश्वामित्र ने ब्रम्हर्षि वशिष्ठ से बोले कि हे भगवन आप कामधेनु को देकर मुझसे 1लाख गाये लें लें, क्योंकि कामधेनु एक रत्न है और रत्न रखने का अधिकारी केवल राजा होता है। अतः धर्म कि दृष्टि से यह मेरी है, लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा कि हे राजन कामधेनु को तो मैं किसी भी कीमत पर नहीं दें सकता क्योंकि कामधेनु ही मेरा रत्न औऱ कामधेनु ही मेरा धन है। तब राजा विश्वामित्र ने वशिष्ठ जी को तमाम प्रकार के प्रलोभन दिए. लेकिन ज़ब वशिष्ठ जी नहीं माने तो।

          क्रोधित विश्वामित्र कामधेनु को बल पूर्वक ले जाने लगा। तब कामधेनु दुखी होकर रोते हुए मन में सोचने लगीं कि मुझसे ऐसा कौन सा अपराध हो गया जिसके कारण वशिष्ठ जी ने मेरा त्याग कर दिया। ऐसा सोचकर सैकड़ों कर्मचारियों के हाथ से अपने आपकेोे छुडाकर कामधेनु वशिष्ठ जी के चरणों में जाकर गिर पड़ी। औऱ रोते हुए कहने लगीं कि हे ब्रम्हा पुत्र क्या अपने मेरा त्याग कर दिया है जो राजा के सैनिक मुझे अपने साथ ले जा रहे है।

        यह सुनकर दुखी वशिष्ठ जी बोले कि "हे कामधेनु मैंने अपनी इच्छा से तेरा परित्याग नहीं किया है। यह राजा अपने बल के मद में चूर होकर मुझसे छीनकर तुझे ले जा रहा है। एक तो वह राजा, दूसरे क्षत्रिय, तीसरा पृथ्वी का मालिक है । मेरे पास राजा के बराबर सैन्य बल भी नहीं है, अतः मैं क्या कर सकता हूँ। तब कामधेनु वशिष्ठ जी से बोली कि हे ब्रम्हर्षि ब्राम्हणों के बल के सामने क्षत्रियो का बल तुच्छ है। क्योंकि ब्राम्हण का बल दिव्य होता है अर्थात तपस्या का बल, औऱ क्षत्रिय का बल क्षात्रबल अर्थात शारीरिक होता है.

       मतलब क्षत्रिय राजा आपके बल का सामना नहीं कर सकते। अतः आप आज्ञा दीजिये आपके ब्रम्हबल के प्रताप से मैं अभी इनका गर्व चूर चूर करती हूँ. यह सुन वशिष्ठ जी बोले ठीक है, तुम ऐसी सेना उत्पन्न करो जो शत्रु कि सेना का सर्वनाश कर डालें, यह सुनकर कामधेनु के हुवाँ शब्द करने पर सैकड़ों म्लेच्छ उत्पन्न हो गए औऱ विश्वामित्र के सामने उसकी सेना का नाश करने लगे. सेना नष्ट होते देख क्रोधित विश्वामित्र ने भी आक्रमण कर दिया औऱ सैकड़ों म्लेछों को मार डाला, यह देख कामधेनु ने यवनों सहित शकों को उत्पन्न किया. जो पीली पोषक औऱ स्वर्ण कि तरह चमकीला महातेजस्वी औऱ पराक्रमी थे, वह बड़ी तेजी से विश्वामित्र कि सेना का विनाश करने लगे।

         लेकिन विश्वामित्र के अस्त्र सश्त्र के सामने सभी को विफल होता देख।वशिष्ठ जी ने कामधेनु से कहा कि अब मेरे कहने से योग महिमा से औऱ म्लेच्छ उत्पन्न कर. तब कामधेनु कि हुंकार से कम्बोज, औऱ स्तनों से पप्लव, गुदा से शक, रोम से म्लेच्छ, हरित, औऱ किरात तथा योनि से यवन उत्पन्न हुए। इन लोगो ने विश्वामित्र के हाथी, घोड़े, रथो, औऱ पैदल सेना सहित समस्त सेना का विनाश कर डाला। इस प्रकार अपनी समस्त सेना का नाश होते देख विश्वामित्र के सौ पुत्र वशिष्ठ जी पर झपटे। लेकिन क्रोधित वशिष्ठ जी ने उन्हें भी भस्म कर डाला।

      समस्त सेना औऱ औऱ पुत्रों का नाश हुआ देख लज्जित विश्वामित्र अपने बचें एक पुत्र को राजयभर सौंप कर हिमालय पर शिव कि तपस्या करने चले गये। और कठोर तप करने लगे, तपस्या के कुछ काल बाद तपस्या से प्रसन्न होकर भगवन शिव ने विश्वामित्र को दर्शन दिया औऱ वर मांगने के लिए कहा, तब विश्वामित्र बोले कि "हे रूद्र यदि आप मुझसे प्रसन्न है तो अंग, उपांग, औऱ उपनिषद तथा रहस्य सहित धनुर्वेद मुझे बताइये, जिन प्रसिद्ध अस्त्रों का प्रचार दानवों, गन्धर्व, देवर्षियों, यक्षों औऱ राक्षशों में है, वह सब आपके अनुग्रह से मुझे प्राप्त हो" । यह सुनकर महादेव ने तथास्तु बोला औऱ अंतर्ध्यान हो गये।

       अब तमाम प्रकार के अस्त्र सश्त्र पाकर विश्वामित्र अभिमान सहित आगे बढे यह सोचकर कि अब तो वशिष्ठ मरा ही मरा।  औऱ वशिष्ठ जी के आश्रम पहुचे कर अस्त्रों कि वर्षा करने लगे। उन अस्त्रों कि वर्षा से सारा तपोवन जलने लगा, सैकड़ों ऋषि मुनि भयभीत होकर इधर उधर भागने लगे। यह सब देख कर वशिष्ठ जी ने कहा कि "अरे दुष्ट तूने मेरे भरे पुरे आश्रम को नष्ट कर दिया"  यह कहकर वशिष्ठ जी ने क्रोध पूर्वक अपना दण्ड उठाया जो कालाग्नि के समान दूसरा यमदण्ड जैसा था।

         वशिष्ठ जी के कठोर वचन सुनकर विश्वामित्र ने आग्नेयास्त्र उठाया औऱ बोले ठहर अभी मैं तुझे बताता हूँ। वशिष्ठ जी ने भी ब्रम्हदण्ड को उठाकर क्रोध पूर्वक बोले कि अरे क्षत्रियो में नीच ले मैं खड़ा हूँ जो तूने महादेव से अस्त्र सस्त्र प्राप्त किये है उन सबको मेरे ऊपर चला अरे नीच कहाँ क्षत्रियों में पशुबल और कहा ब्राम्हणों को ब्रम्हबल.  आगे की कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
           
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