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क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने, Part 3

                 क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र
      क्षत्रिय से ब्राम्हण बने विश्वामित्र
नमस्कार दोस्तों
               पिछले संस्करण में आपने पढ़ा कि कैसे त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाने के लिए वशिष्ठ औऱ उनकी पुत्रों के पास गया औऱ वशिष्ठ पुत्रों ने त्रिकुंश को चांडाल होने का श्राप दिया, तथा भटकते हुए त्रिकुंश विश्वामित्र से मिला औऱ विश्वामित्र ने कैसे उसे सशरीर स्वर्ग भेजा लेकिन गुरु श्राप के कारण इंद्र ने उसे नीचे फेक दिया,

           ज़ब त्रिकुंश नीचे गिर रहा था तब उसने विश्वामित्र जी को पुकारा औऱ विश्वामित्र जी ने त्रिकुंश को वहीँ रोक कर, क्रोधित विश्वामित्र ने दक्षिण दिशा में दूसरे स्वर्ग कि रचना प्रारम्भ कर दी,  पहले तो सप्तऋषियों कि रचना कि औऱ बाद में 27 नये नक्षत्र बना डालें, त्रिकुंश को स्वर्ग का मालिक बनाकर नए देवताओं कि रचना करने लगे, यह देखकर समस्त ऋषि मुनि, देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, असुर, आदि सभी घबरा गये,

         औऱ विश्वामित्र के पास पहुँचे, औऱ बोले कि" हे महाभाग यह राजा गुरु श्राप से शापित होने के कारण सशरीर स्वर्ग नहीं जा सकता है, उन महात्माओं के वचन सुनकर विश्वामित्र जी बोले कि "हे महात्माओं आपका कल्याण हो, लेकिन इस धर्मात्मा राजा को सशरीर स्वर्ग पहुंचने कि मैंने प्रतिज्ञा ली ही, उसे मैं मिथ्या नहीं जाने दूंगा, राजा त्रिकुंश को सदा स्वर्ग में रखने के लिए मेरे बनाये हुए ध्रुव सहित सब नक्षत्र तब तक बने रहें, ज़ब तक स्वर्गलोक रहें, औऱ मेरे बनाये देवता भी रहे, आप सब ऐसी अनुमति दें,

        यह सुनकर सब देवताओं ने विश्वामित्र जी से कहा अच्छी बात है आपके बनाये सभी ग्रह, नक्षत्र, देवता, सदैंव बने रहेंगे लेकिन प्राचीन वैश्वानरमार्ग के बाहर रहेंगे,औऱ राजा त्रिकुंश भी देवताओं कि तरह अमर बने रहेंगे, यह कहा कर समस्त देवताओं ने विश्वामित्र जी कि स्तुति कि तथा विश्वामित्र जी ने भी देवताओं कि बात मन ली, उस यज्ञ में जो तपस्वी ऋषिगण आये थे, यज्ञ समाप्त होने पर अपने अपने स्थान लौट गये,

      सभी के चले जाने के पश्चात् विश्वामित्र जी ने विचार किया कि इस दक्षिण दिशा में रहने के कारण यह बड़ा विघ्न पड़ा है मेरी तपस्या में अतः पश्चिम दिशा में जहां पुष्कर तीर्थ है वहाँ जाकर तप करूँगा, यह सोचकर मुनि विश्वामित्र पुष्कर चले गये औऱ फल मूल कहा कर तपस्या करने लगे,

      इसी बीच अयोध्या के राजा अंबरीष ने अश्वमेघ यज्ञ प्रारम्भ किया, लेकिन राजा का यज्ञ पशु देवराज इंद्र चुरा ले गये, पशु के इस प्रकार कहो जाने से पुरोहित ने राजा से कहा कि" हे राजन यज्ञ पशु का चोरी होना अच्छा संकेत नहीं है, क्योंकि इसका दोष रक्षको को लगता है, अतः यज्ञ के समाप्त होते होते या तो दूसरा पशु लाइए या फिर गौधन देकर कोई नर मनुष्य ही लाइए, जिससे इस विघ्न का प्राश्चित हो सके,

       यह सुनकर राजा गाय देकर यज्ञ पशु ढूढ़ने लगे, अनेक देश, जनपद, जंगल, ढूढते ढूढते छान मारे लेकिन यज्ञ पशु नहीं मिला, तलाश करते करते राजा अंबरीश महर्षि ऋचिक के पास पहुँचे, औऱ कुशल मंगल पूंछकर अपनी शरीर आपबीती सुनाई, औऱ निवेदन किया कि "हे मुनि गौधन लेकर आप अपना एक पुत्र मुझे दें दीजिये, लेकिन ऋषि ऋचिक ने अपने बड़े पुत्र को बेचने से मना कर दिया,

     यह सुनकर महात्मा के पुत्रों कि माता बोली कि "बड़ा पुत्र तो बेचारा नहीं जा सकता क्योंकि वह पितृकर्म करने का अधिकारी होता है, औऱ छोटे पुत्र से मेरा बड़ा लगाव है, अतः उसे मैं आपको नहीं दूंगी, पिता औऱ माता कि बात सुनकर उनका मंझला पुत्र शुनःशेप स्यंम बोला कि पिता जी बड़े पुत्र औऱ माता छोटे पुत्र को नहीं बेच सकते अतः आप मुझे बेचा हुआ समझ अपने साथ ले चलिए, यह सुनकर राजा ने ऋषि ऋचिक को एक लाख गाय प्रदान कि औऱ शुनःशेप को लेकर वहाँ से अपने राज्य को चला,

       ज़ब राजा अंबरीष शुनःशेप के साथ पुष्कर पहुँचे तो वहाँ दो पहर विश्राम करने का निर्णय लिया, अतः जब राजा विश्राम कर रहा था, तब शुनःशेप घूमते हुए विश्वामित्र जी के पास पंहुचा, तप करते हुए विश्वामित्र जी को देख वह उदास थका हुआ प्यासा शुनःशेप विश्वामित्र के गोद में गिर पड़ा, औऱ बोला कि मेरे माता पिता नहीं है हे मुनिराज मुझे बचाइए अब आप ही मेरी रक्षा कर सकते है, अतः आप कुछ ऐसा कीजिये कि राजा का यज्ञ भी पूरा हो जाये हुए मैं भी जीवित रहू,

      अब आप ही मुझे अनाथ कि रक्षा कर सकते है, शुनःशेप के वचन सुनके विश्वामित्र ने उसे सांत्वना दी औऱ अपने पुत्रों से बोले कि "हे पुत्रों जिस परलोक के प्रयोजन हेतु पिता अपने पुत्रों को उत्पन्न करते है,  आज वो समय आ गया है, यह ऋषि ऋचिक का पुत्र है, हमारे शरण में आया है इसके प्राणों कि रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है, अतः तुम से कोई एक यज्ञ पशु बनकर अग्निदेव को तृप्त करो,

      विश्वामित्र के ऐसे वचन सुनकर उनकी मधुछन्दादि पुत्रों ने अपने पिता का उपहास करते हुए बोले कि " पिताजी आप अपने पुत्रों को छोड़ किसी अन्य के पुत्र कि रक्षा क्यों कर रहे है, यह तो वैसा ही कर्म हुआ जैसे उत्तम भोजन छोड़ कर कुत्ते का मांस खाना, अतः आपका कार्य उसी प्रकार अनुचित है जिस प्रकार कुत्ते का मांस खाना,

       अपने पुत्रों कि बात सुनकर क्रोधित विश्वामित्र ने कहा कि " तुम्हारा यह कहना धर्म कि दृष्टि से भी भ्रष्ट है औऱ पितृभक्ति से भी भष्ट, अतः तुम लोग भी वशिष्ठ के पुत्रों कि भाँति चांडाल बनकर कुत्ते का मस्त खाते हुए पृथ्वी पर 1000 साल तक घूमोगे, अपने पुत्रों को श्राप देकर विश्वामित्र जी शुनःशेप से बोले कि "हे मुनिपुत्र ज़ब तुम अंबरीष के यज्ञ में पवित्र फांसी के लिए वैष्णव स्तम्भ में लाल माला औऱ लाल चन्दन से सजाकर बाँधे जाओ तब तुम इन दो मंत्रो कि स्तुति करना इससे तुम बचा जाओगे,

          औऱ राजा यज्ञ भी पूरा हो जायेगा, शुनःशेप ने उन दोनों मंत्रो को याद कर लिया औऱ राजा के पास गया औऱ बोला कि "हे बलवान राजसिंह अब शीघ्र चले औऱ यञदिक्षा लेकर अपना यज्ञ पूरा करें, यह सुनकर राजा तुरंत अपनी यञशाला पहुँचे, औऱ शुनःशेप को पशु बनाकर लाल कपडे पहनाकर खम्भे से बांध दिया, आगे की कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

                    दोस्तों आगे कि कथा अगले संस्करण में,  धन्यवाद

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