Breaking News

क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने, Part 4

                 क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र

                           क्षत्रिय से ब्राम्हण बने विश्वामित्र
नमस्कार दोस्तों
           पिछले संस्करण में अपने पढ़ा कि कैसे राजा अंबरीष ने ऋषि ऋचिक के पुत्र को पशुयज्ञ के रूप में प्राप्त किया औऱ अपने राज्य को निकला इसी बीच शुनःशेप कि मुलाक़ात पुष्कर में विश्वामित्र से हुई, तथा शुनःशेप का सारा हाल जानकर विश्वामित्र ने उसे बचाने के लिए अपने पुत्रों को श्राप दिया तथा शुनःशेप को दो मंत्र दिए, तत्पश्चात राजा ने शुनःशेप को यज्ञ बलि के लिए यज्ञ स्तम्भ से बांध दिया,

        दोस्तों ज़ब शुनःशेप को यज्ञ स्तंभ से पशु बनाकर बांध दिया गया, तब शुनःशेप ने विश्वामित्र द्वारा बताएं गये मंत्रो के दवरा इंद्र औऱ उपेंद्र कि स्तुति कि, जिससे प्रसन्न होकर इंद्र औऱ उपेंद्र ने शुनःशेप को दीर्घायु होने का वरदान दिया, तथा राजा ने भी यज्ञ समाप्त कर इंद्र कि कृपा से अनेक वरदान प्राप्त किये, इस प्रकार विश्वामित्र के बताएं मंत्र से शुनःशेप दीर्घआयु हुआ, तथा राजा का यज्ञ भी पूरा हो गया,

      इसके पश्चात् पुनः विश्वामित्र ने 10000 वर्ष तक तपस्या करने की ठानी, औऱ ज़ब 1000 वर्ष तपस्या के पूरे हुए तो, तब समस्त देवता सहित ब्रम्हा जी विश्वामित्र के पास आये औऱ बोले की "हे वत्स तुम्हारा कल्याण हो, तुम अपने उपार्जित कर्मो द्वारा ऋषि हुए,  अर्थात अभी तुम्हे ब्रम्हऋषि पद औऱ ब्राम्हणत्व प्राप्त नहीं हुआ है, यह कहकर ब्रम्हादि देवता वापस चले गये, तब विश्वामित्र जी ने ब्राम्हणत्व की प्राप्ति के लिए औऱ घोर तपस्या करने लगे,

           एक दिन अप्सरा मेनका पुष्कर स्नान करने की इच्छा से पुष्कर आयी, औऱ मेनका का सौंदर्य देखकर मुनि विश्वामित्र जी ने मेनका से कहा की "हे अप्सरे मैं तेरा स्वागत करता हूँ, तेरा मंगल हो, मैं तुझे देखकर कामसक्त हो गया हूँ, अतः तू मेरे साथ आश्रम में रह,  यह सुनकर वह सुन्दर अप्सरा विश्वामित्र के साथ आश्रम में रहने लगीं, तथा विश्वामित्र औऱ मेनका को भोग विलास करते हुए 10 वर्ष बीत गये, औऱ मुनि विश्वामित्र को पता ही नहीं चला,

       औऱ ज़ब मुनि को अपनी गलती का अहसास हुआ तब वे बड़े लज्जित हुए, औऱ सोचने लगे की जरूर यह देवताओं की कारिस्तानी होंगी, उन्होंने ने ही मेरी तपस्या में यह विघ्न डाला है, अरे 10 वर्ष बीत गये लेकिन मुझे लगता है की अभी एक रात्रि ही बीती है, उधर श्राप के दर्द से काँपती औऱ हाथ जोड़े खड़ी मेनका को देख, विश्वामित्र जी ने उसे वहाँ से तुरंत जाने का आदेश दिया, औऱ तुरंत पुष्कर छोड़ उत्तर दिशा हिमालय पर चले गये, औऱ काम को जितने की इच्छा से घोर तप करने लगे,

       ज़ब विश्वामित्र की तपस्या के 1000 वर्ष पुरे हुए, तो हिमालय पर निवास करने वाले देवता औऱ महर्षि डर गये, तथा सभी देवता औऱ महर्षि वीडियो हर करके ब्रम्हाजी के पास पहुँचे, औऱ बोले की हे परमपिता विश्वामित्र को महर्षि का पड़ प्रदान कीजिये, देवताओं तथा महर्षियों के कहने पर ब्रम्हाजी फिर विश्वामित्र के पास पहुँचे औऱ बोले की "हे महर्षि विश्वामित्र मैं तुम्हरी तपस्या से प्रसन्न हूँ अतः तुम्हे ऋषियों में श्रेष्ठ होने का आशीर्वाद देता हूँ,

     यह सुनकर विश्वामित्र जी बोले की "मैंने ब्रम्हऋषि पद प्राप्त करने के लिए तप किया था लेकिन आप मुझे महर्षि ही कह रहे है तो मैं समझाता हूँ की मैं अभी जितेन्द्रिय नहीं हुआ हूँ, जितेन्द्रिय का मतलब काम, क्रोध, मोह, लोभ, औऱ जितने भी प्रकार की इच्छाएं औऱ भावनाएं होतीं है उनपर विजय प्राप्त करना, विश्वामित्र जी के द्वारा ऐसा कहे जाने पर ब्रम्हाजी ने कहा की यह सत्य है तुम अभी अपनी इन्द्रियों को नहीं जीत पाए हो, अतः अभी औऱ तप करो,  यह कहकर देवता औऱ ब्रम्हाजी वापस लौट गये,

      अब विश्वामित्र जी ने कठोर घोर तप करने का निर्णय लिया, तथा बिना सहारे हाथों को उठाये औऱ वायु से पेट भरकर तप करने लगे, वह गर्मी में तपती धूप में, ठंडी में जल में खड़े होकर, बारिश में खुले मैदान में खड़े होकर तप करने लगे, इस प्रकार कठोर तप देखकर देवताओं में खलबली मच गई, तब इंद्र ने अप्सरा रम्भा से विश्वामित्र का तप भंग करने की बात कहीं, लेकिन रम्भा ने कहा की "हे देवराज मुनि विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित मुनि है मेरे इस कृत्य के लिए वे निश्चित ही मुझे श्राप दें देंगे, कृप्या मुझे वहाँ मत भेजिए,

         तब इंद्र ने कहा डर मत मैं स्यंम कोकिल पक्षी बनकर कामदेव के साथ वृक्ष पर तेरे आसपास ही रहूँगा, इंद्र के समझने पर वह मन गई, औऱ विश्वामित्र के पास पहुँचकर विश्वामित्र को अपनी अदाओं से मुस्कुरा कर लुभाने लगीं, उस समय विश्वामित्र कोकिल का मधुर कुहुकना सुनकर रम्भा की ओर देखने लगे, लेकिन रम्भा का गाना औऱ कोकिल की कुहुक सुन, विश्वामित्र को संदेह हो गया की यह इंद्र की ही माया है,

        अतः क्रोधित विश्वामित्र ने रम्भा को श्राप दिया की "हे रम्भा काम, क्रोध, को वश में करने वाले मुझे तू लोभ रही है, इसलिए 10000 वर्ष तक तू पत्थर बनकर रहेगी, तथा की महान तपस्वी द्वारा ही तेरा उद्धार होगा, विश्वामित्र के श्राप से रम्भा पत्थर की बन गई, औऱ विश्वामित्र को क्रोधित देखकर देवराज इंद्र औऱ कामदेव रफूचक्कर हो गये, अब क्रोध करने के बाद विश्वामित्र का रपल्य नष्ट हो गया, तथा इस घटना के बाद मुनि विश्वामित्र ने प्रतिज्ञा की कि  वह अब क्रोध नहीं करेंगे, न ही किसी से बातचीत बल्कि सैकड़ों वर्षों तक साँस भी नहीं लूंगा,

        ज़ब तक तपोबल से ब्राम्हणत्व प्राप्त न कर लूं, यह विचार कर विश्वामित्र उत्तर दिशा का त्याग कर पूर्व दिशा में जाकर फिर से उग्र तप करने लगे, यहाँ तक ज़ब तपस्या का 1000 वर्ष पूरा हुआ तब विश्वामित्र का शरीर काठ कि तरह हो गया, इसी बीच कई तरह कि बाधाएं भी उत्पन्न हुई लेकिन अपने मन में क्रोध उत्पन्न न होने दिया, अतः ज़ब विश्वामित्र को लगा कि उनका 1000 वर्ष तपस्या करने का संकल्प पूरा हो गया है, औऱ उन्होंने क्रोध को जीत लिया है, तब वे भोजन ग्रहण करने बैठे, लेकिन

         उसी समय इंद्र ब्राम्हण का भेष धारण करके आये औऱ विश्वामित्र की थाली में परोसे भोजन मांग को लिया, तब विश्वामित्र जी ने अपनी थाली का भोजन ब्राम्हण रूपी इंद्र को दें दिया, औऱ स्यंम बिना खाये रह गये, किन्तु ब्राम्हण को कुछ नहीं कहा क्योंकि उन्होंने मौनव्रत धर्म किया हुआ था, फिर विश्वामित्र जी ने 1000 वर्ष तक साँस रोक कर तपस्या करनी प्रारंम्भ कर दी, साँस रोक कर रखने के कारण उनकी सिर से धुँआ निकलने लगा, जिससे तीनों लोक घबरा गये,

       देवता, यक्ष, राक्षश, गन्धर्व, नाग, सभी विश्वामित्र के तप रूपी अग्नि से मूर्च्छित हो गये, उनकी तेज मंद पड़ गये, तब उन सब ने दुखी मन से ब्रम्हा जी कहा की "हे देव हमने विश्वामित्र को अनेक प्रकार से लुभाया, क्रोधित करना चाहा लेकिन उनका तप बढ़ता ही गया, अब इनमे राग द्वेष नाम मात्र का ही रह गया है, देखिये महर्षि ने घोर तप से सूर्य प्रभावहीन हो गया है, पृथ्वी कांप रही है, वायु की गति गड़बड़ा गई है,

      अतः हे देव विश्वामित्र के मन में इस जगत को नाश करने की इच्छा उत्पन्न होने पहले आप उनको संतुष्ट कीजिये, क्योंकि इस समय वें अग्निरूप होने के कारण महाविद्युतिमान हो रहे है, जैसे प्रलय की अग्नि तीनों लोकों को जला कर नष्ट कर डालती है, वैसे ही वे भी जलाकर भष्म कर डालेंगे, यदि वे इन्द्रासन चाहे तो वह भी उनको देकर उनकी इच्छा पूरी करें, यदि आप इनको ब्रम्हऋषि पद जो इनका अभीष्ट है नहीं देंगे तो, यह इंद्रपुरी राज्य की इच्छा करने लगेंगे, सभी के इस प्रकार कहने पर,

          ब्रम्हाजी विश्वामित्र के पास पहुँचे औऱ बोले की ब्रम्हऋषि हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुए, तुमने अपने घोर तप से ब्राम्हणत्व प्राप्त कर लिया है, अब जहा तुम्हारी इच्छा हो वहाँ जाओ, तब विश्वामित्र जी बोले की यदि अपने mujhe ब्राह्णत्व दिया और दीर्घआयु किया है तो ओंकार, वषट्कार, तथा वेद भी मुझे अंगीकार करें, तथा चारों वेदो के ज्ञाता ब्रम्हाजी के पुत्र भी मुझे ब्रम्हर्षि कहे तो ही मेरा तप पूरा होगा,

         यह सुनकर देवता वशिष्ठ मुनि के पास गये, औऱ उन्हें मनाकर राजी किया, तब वशिष्ठ जी आये औऱ बैरभाव छोड़कर विश्वामित्र जी से बोले की "हे विश्वामित्र आप ब्रम्हर्षि हो गये है इसमें कोई संदेह नहीं है, औऱ अब ro सबने तुम्हे ब्रम्हर्षि होने मन भी लिया है, विश्वामित्र जी ने भी ब्राम्हणत्व प्राप्त करके महर्षि प्रवर वशिष्ठ जी का पूजन किया, और तप करते हुए समस्त पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे,

           तो दोस्तों आपको विश्वामित्र जी की कथा कैसी लगीं हमें कमेंट में अवश्य बताएं,                                                                                                   👉 धन्यवाद 👈

REED MORE STORIES :-
क्षत्रिय विश्वामित्र से राम के गुरु ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने Part :- 1
क्षत्रिय विश्वामित्र से राम के गुरु ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने Part:-2
क्षत्रिय विश्वामित्र से राम के गुरु ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने Part:-3
शिवजी ने इस देवी का स्तनपान किया था
भगवान विष्णु को हराया इस योगी ने

कोई टिप्पणी नहीं