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कार्तिकेय जी मारना चाहते थे गणेश जी को

                   भविष्य पुराण कथा                

कार्तिकेय जी क्यों मारना चाहते थे गणेश जी को
नमस्कार दोस्तों।
             मै राहुल आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं, आज की कथा का वर्णन भविष्य पुराण के ब्रम्हपर्व के 22 अध्याय में किया गया है,

कथानुसार,
             एक बार राजा शतानीक ने मुनि सुमन्त से पूछा की गणेश जी ने किसके कार्य में विघ्न (बाधा) डाला था जिसके कारण उन्हें विघ्नविनायक कहा जाता है, आप विघ्नेश तथा उनकी द्वारा उपन्न किये विघ्न का कारण मुझे बताने का कष्ट करें,

         तब मुनि सुमंत जी बोले की "हे राजन एक बार अपने लक्षण शास्त्र के अनुसार स्वामी कार्तिकेय जी पुरुषों औऱ स्त्रियों के श्रेष्ष्ठ लक्षण की रचना कर रहे थे, लेकिन तभी गणेश जी ने उसमे विघ्न डाल दिया, इस पर कार्तिकेय जी क्रोधित हो गये औऱ गणेश जी का एक दांत उखाड़ लिया तथा उन्हें मारने के लिए दौड़े,

       लेकिन तभी भगवान शंकर जी ने कार्तिकेय को रोककर उनकी क्रोध का कारण पूंछा, तब स्वामी कार्तिकेय जी ने भगवान शिव से कहा की "हे पिताजी मैं पुरुषों के लक्षण बनाकर स्त्रियों के लक्षण बना रहा था लेकिन तभी दुष्ट गणेश ने उसमे विघ्न डाल दिया, इस कारण मुझे क्रोध आया औऱ मैं गणेश को मारने के लिए उद्घत हुआ,

        यह सुनकर भगवान शिव ने कार्तिकेय का क्रोध शान्त किया औऱ हॅसते हुए पूछा की "पुत्र अगर तुम पुरुष के लक्षण जानते हो तो बताओ मुझमे पुरुष के कौन से लक्षण है,  तब कार्तिकेय जी बोले की पिताजी आपमें पुरुष का ऐसा लक्षण है की आप संसार में कपाली के नाम से जाने जाओगे, कार्तिकेय के ये वचन सुनकर भोलेनाथ को क्रोध आ गया, औऱ कार्तिकेय जी के उस लक्षण ग्रन्थ को उठाकर समुद्र में फेंक दिया,

         औऱ स्यंम अंतर्ध्यान हो गये, बाद में समुद्रदेव को बुलाकर कहा की "हे समुद्र देव तुम स्त्रियों के आभूषण स्वरुप विलक्षण लक्षण की रचना करो औऱ कार्तिकेय ने जो पुरुष लक्षण के विषय में कहा है वो मुझे बताओ, तब समुद्र देव जी ने कहा की" हे भगवान जो मेरे द्वारा पुरुष लक्षण का शास्त्र कहा जायेगा, वह मेरे ही नाम से अर्थात सामुद्रिक शास्त्र के नाम से प्रसिद्द होगा, अतः अपने जो आज्ञा दी है वह निश्चित ही पूरी होगी, यह कहकर समुद्र दें  वहाँ से चले गये,

      समुद्र देव के जाने के पश्चात् शिव जी ने कार्तिकेय से कहा की "हे पुत्र इस समय तुमने जो गणेश का दांत उखाड़ लिया है उसे गणेश को वापस दें दो, निश्चय ही जो कीच हुआ है वह तो होना ही था, दैवयोग से यह गणेश के बिना संभव नहीं था, इसलिए इनके द्वारा यह विघ्न उत्पन्न किया गया, यदि तुम्हे लक्षण शास्त्र चाहिए तो समुद्र से ग्रहण कर लो, किन्तु स्त्री पुरुष का यह श्रेष्ठ लक्षण शास्त्र समुद्र शास्त्र के ही नाम से प्रसिद्द होगा,

       अतः अब तुम गणेश को दन्तयुक्त कर दो, तब कार्तिकेय जी ने भगवान शिव से कहा की, " पिताजी आपके कहने से मैं दांत तो विनायक जी के हाथ में दें देता हूँ, लेकिन इन्हे इस दाँत को सदैंव धारण करना पड़ेगा, औऱ यदि वे इस दांत को फेंककर इधर उधर घूमेंगे तो यह फेंका गया दाँत ही इन्हे भस्म कर देगा,  ऐसा कहकर कार्तिकेय जी ने गणेश का वह दाँत वापस कर दिया, तब भगवान शिवजी ने गणेश जी को कार्तिकेय की इस बात को मानने के लिए सहमत किया,

        दोस्तों आज भी भगवान शिव के पुत्र गणेश की प्रतिमा हाथ में दांत लिए देखी जा सकती है,  औऱ गणेश चतुर्थी पर यह कथा कोई कहता, सुनता, या सुनाता है तो उसका कार्य निश्चित ही निर्विघ्न पूरा होता है, विघ्नहर्ता गणेश जी की कृप्या से,

तो दोस्तों गणपति बाप्पा मोरया कमेंट में लिखना न भूलें, साथ शेयर भी करें,                                               👉 धन्यवाद 👈

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