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नपुंसक इंद्र को लगाया भेड़ का अंडकोष.

               नपुंसक इंद्र को लगाया भेड़ का अंडकोष    

                                    नपुंसक इन्द्र को लगाया भेड़ का अंडकोष
नमस्कार दोस्तों
           आज की कथा का वर्णन वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड के 49 वें सर्ग में किया गया हैँ। कथानुसार ज़ब श्री रामचंद्र और लक्ष्मण जी गुरु विश्वामित्र के साथ मिथिलापुर जा रहे थे तो रास्ते उन्हें एक निर्जन किन्तु रमणीक आश्रम देखकर गुरु विश्वामित्र जी से पूछा की "हे मुनि यह आश्रम तो परमशोभायमान हैँ किन्तु यहां कोई ऋषि रहता हुआ नहीं दिखा रहा ऐसा क्यों हैँ इसमें रहस्य क्या हैँ, हे भगवन मैं जानना चाहता हूँ कि  यह आश्रम किसका हैँ, आप बताने का कष्ट करें l

             दोनों बालकों की जिज्ञाषा देख गुरु विश्वामित्र ने कहा की "हे राघव पूर्वकाल में यह आश्रम गौतम ऋषि का था। इस देवता जैसे आश्रम की देवता भी वंदना करते थे l इस आश्रम में अपनी पत्नी अहिल्या के साथ गौतम ऋषि ने बहुत वर्षों तक तपस्या की थीं l एक दिन प्रातःकाल स्नान करने के लिए नदी तट पर गये l तथा आश्रम में गौतम ऋषि को अनुपस्थित देख कर देवराज इंद्र ने गौतम ऋषि का वेष  धारण कर अहिल्या के पास गया और बोला की " हे देवी कामी पुरुष समय विशेष की प्रतीक्षा नहीं करते l अतः हे सुंदरी आज मैं तेरे साथ सम्भोग करना चाहता हूँ l

               मुनि वेष धारण किये हुए इंद्र को पहचान कर भी दुष्ट अहिल्या ने प्रसन्नता पूर्वक इंद्र के साथ सम्भोग किया l और सम्भोग के पश्चात् अहिल्या इंद्र से बोली कि "हे इंद्र मेरा मनोरथ पूरा हो गया अतः हे देवताओं में श्रेष्ठ इंद्र यहां से अब तुम शीघ्र प्रस्थान करो तथा सदा मेरी रक्षा करना l इसके उत्तर में इंद्र ने भी हँसकर कहा कि अहिल्या तेरे साथ सम्भोग करके मैं बहुत प्रसन्न हूँ अतः अब मैं आनंद पूर्वक अपने स्थान पर जाऊँगा l यह कहकर इंद्र अहिल्या कि कुटिया से बाहर निकले ।

               लेकिन  तभी स्नान करके वापस आ रहे गौतम ऋषि ने इंद्र को देख लिया, और अपना रूप धारण किये हुए इंद्र को देख ऋषि गौतम समझ गये कि यह दुष्कर्म करके ही जा रहा हैँ l अतः क्रोधित गौतम ऋषि ने इंद्र को श्राप दिया कि " तूने मेरा वेष धारण करके यह न करने वाला कार्य किया हैँ अतः तू अंडकोष विहीन हो जायेगा, अर्थात नपुंसक हो जायेगा l महात्मा गौतम के श्राप देते ही उसी क्षण इंद्र के दोनों अंडकोष जमीन पर गिर पड़े l

              इस प्रकार इंद्र को श्राप देकर गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या को भी श्राप दिया कि " तूने सब कुछ जानते हुए भी इस दुष्ट इंद्र से सम्भोग किया, इस लिए तू हजारों वर्षों तक यहां वश करेंगी, तेरा भोजन केवल पवन (हवा) होगा और कुछ भी नहीं खा सकेगी, तू इसी स्थान पर अदृश्य होकर भस्म में लोटा करेंगी, ज़ब दशरथ नंदन राम इस वन में आएंगे तो उनका लोभ मोह रहित आतिथ्य सत्कार करने बाद तू अपने शरीर को धारण करेगी हुए मेरे श्राप से मुक्त हो पायेगी ।

                  इस प्रकार दोनों को श्राप देकर गौतम ऋषि ने आश्रम का त्याग कर दिया l इधर इंद्र गौतम के श्राप से नपुंसक बने उदास मन से देवताओं के पहुँचे, और बोले कि गौतम कि तपस्या भंग करके मैंने देवताओं का कार्य सिद्ध किया l क्योंकि गौतम ऋषि सर्व देवताओ का स्थान लेना चाहते थे, स्वर्ग में अहिल्या से सुन्दर सुन्दर अप्सराये होने के वावजूद ऐसा निन्दित कार्य किया अतः हे देवताओं गौतम ने क्रोधित होकर नपुंसक होने का श्राप दिया हैँ l अब हे देवर्षियों हे देवताओं आप सब मुझे ठीक होने में मेरी सहायता करें ।

              इंद्र के इस प्रकार विलाप करने पर, अग्नि को आगे कर पवन आदि देवतागण काव्यवानादि पितरो के पास गये, और बोले "हे पितरो देवराज इंद्र अंडकोष विहीन हो गये हैँ और आपके भेड़ के अंडकोष हैँ, अतः इसे उखाड़कर इंद्र को तुरंत दें दीजिये l आज से जो मनुष्य अंडकोष रहित भेड़ का यज्ञ में बलिदान करके आपको प्रसन्न करेंगे, उनको तुम लोग अक्षय और अनंत फल देना, पितरो के ऐसे वचन सुनकर पितरो ने भेड़ का अंडकोष निकाल कर इंद्र को दें दिया l

 और हाँ दोस्तों अहिल्या के पत्थर बनने का वर्णन पद्मपुराण में आया हैँ ll  वाल्मीकि रामायण में अहिल्या के पत्थर बनने का वर्णन नहीं हैँ।

 दोस्तों कथा कैसी लगीं हमें कमेन्ट के माध्यम से अवश्य बताएं,  धन्यवाद

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1 टिप्पणी:

  1. अहल्या का पत्थर बना मतलब सच में Rock में तब्दील हुई या पापकर्म के guilt में depression से ग्रसित हुई?

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