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क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र कैसे बने, Part-2

           क्षत्रिय विश्वामित्र से ब्राम्हण विश्वामित्र           

                     क्षत्रिय से ब्राम्हण बने विश्वामित्र
नमस्कार दोस्तों
           इससे पहले की कथा तो आप सबने पढ़ ली होगी । जब विश्वामित्र को शिवजी द्वारा वरदान मिला तो गर्व से वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंचे और अपने अस्त्रो सश्त्रो कि बरसात कर दी। औऱ ज़ब वशिष्ठ जी सामने आये अपना ब्रम्हदण्ड लेकर तो विश्वामित्र ने वशिष्ठ पर आग्नेयास्त्र से प्रहार किया लेकिन वशिष्ठ जी ने अपने ब्रम्हदण्ड से विश्वामित्र द्वारा चलाये गये आग्नेयास्त्र को उसी प्रकार शान्त कर दिया जैसे जल अग्नि को शान्त कर देता है।

                तब विश्वामित्र ने वशिष्ठ जी पर पशुपत, रौद्र, बज्रास्त्र, कालपाश, वरुणपाश, ऐन्द्र, सन्तापन, धर्मचक्र, विष्णुचक्र, कालचक्र, घोरत्रिशूल, कपाल जितने भी अश्त्र थे सबका उपयोग किया,  लेकिन वशिष्ठ जी ने सभी अस्त्रों को अपने ब्रम्हदण्ड से पकड़ लिया, इन सब अस्त्रों के विफल होने पर, विश्वामित्र ने ब्रम्हास्त्र चलाने के लिए उठाया, जिसे देख समस्त देवता दानव, गन्धर्व, यक्ष, तीनों लोक भयभीत हो गये,  लेकिन लेकिन उस ब्रम्हास्त्र को भी अपने ब्रम्हविद्या अभ्यास जनित तेज से अर्थात ब्रम्हदण्ड से पकड़कर शान्त कर दिया।

          ब्रम्हास्त्र का ग्रास करते समय वशिष्ठ जी का रूप अत्यंत डरावना हो गया,  वशिष्ठ जी के प्रत्येक रोम छिद्र से धूमरहित अग्नि ज्वाला कि तरह निकलने लगीं,  वशिष्ठ जी का ब्रम्हदण्ड कालाग्नि के समान जल उठा, यह देख अन्य मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी कि स्तुति करने लगे, औऱ बोले कि" हे ब्राम्हण आपका बल अमोघ है। आप ब्रम्हास्त्र कि इस अग्नि को अपने तेज कि महिमा से शान्त करें,  आपने इस महातपा विश्वामित्र के तप को नष्ट कर दिया है. अतः अब आप प्रसन्न हो जिससे सब लोगों को शांति प्राप्त हो,  मुनियों ke ऐसा कहने पर वशिष्ठ जी शान्त हो गये,

         औऱ लज्जित विश्वामित्र भी ठंडी साँस लेकर बोले कि "क्षत्रिय क्षत्रिय के बल को धिक्कार है ब्रम्हा तेज बल ही यथार्थ बल है,  क्योंकि अकेले ब्रम्हदण्ड ने मेरे समस्त अस्त्र शस्त्र निकम्मे कर डालें, अब मैं क्षत्रिय स्वभाव को त्यागकर ब्राम्हण होने के लिए तप करूँगा, अपने तिरस्कार को बार बार याद कर विश्वामित्र का ह्रदय संतप्त हुआ,  औऱ अपनी रानी सहित दक्षिण दिशा में चले गये,  जहां उन्होंने घोर तपस्या प्रारम्भ कर दी औऱ ज़ब उनकी तपस्या को 1000 वर्ष पूरे हो गये,

          तो परमपिता ब्रम्हा जी प्रगट हुए औऱ बोले कि हे कुशिक के पुत्र तुमने घोर तप के बल से राजर्षियों के लोक जीत लिए है,  अतः तुम आज से राजर्षि कहलाओगे,  ब्रम्हाजी के वचन सुनकर विश्वामित्र ने शर्म से अपना सिर निचे झुका लिए, औऱ दुखी मन से बोले कि इतना घोर तप करने के बाद भी समस्त देवता औऱ मुनि मुझे राजर्षि ही मानते है, अतः मैं ब्रम्हर्षि बनने के लिए फिर से तप करूँगा,  तथा तपस्वी विश्वामित्र फिर से घोर तप करने लगे,

       इसी बीच  सत्यवादी इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकु के मन में यह बात उठी कि क्यों न कोई ऐसा यज्ञ करूँ जिसके द्वारा मैं सशरीर स्वर्ग जा संकु तथा वशिष्ठ जी को बुला कर अपने मन कि बात कही,  लेकिन वशिष्ठ जी ने कहा कि ऐसा होना असंभव है, ज़ब वशिष्ठ जी ने त्रिशंकु को जबाब दें दिया तो त्रिशंकु दक्षिण दिशा में वशिष्ठ जी के पुत्रों के पास गया औऱ प्रणाम करके अपने मन कि बात कही औऱ साथ ही बताया कि आपके पिता ने इसके लिए जबाब दें दिया है, इसलिए मुझे आपके पास आना पड़ा, अतः आप मेरा यज्ञ पूरा करने में मेरी सहायता करें,

            लेकिन त्रिशंकु कि बात सुनकर वशिष्ठ के सौ पुत्रों ने क्रोधित होकर कहा कि" हे दुर्बुद्धे गुरु कि आज्ञा नहीं मानकर तू दुसरो के पास क्यों आया, जिस यज्ञ को ब्रम्हाऋषि वशिष्ठ जी ने मना कर दिया है उस यज्ञ को हम कैसे कर सकते है,  हम उनका अपमान कैसे कर सकते है, यह सुनकर राजा ने कहा ठीक है अब मैं किसी अन्य कि शरण में जाऊंगा, आप सब लोग आनंद कीजिये, राजा के ऐसे वचन सुनकर वशिष्ठ पुत्रों ने राजा को श्राप दें दिया कि तू चांडाल बंद जायेगा, यह श्राप देकर सभी मुनि अपनी अपनी कुटिया में चले गये,

           अब रात बीतने पर राजा चंडालता को प्राप्त हो गया, उसका शरीर काला पड़ गया बाल छोटे हो गये, चिता कि भस्म शरीर पर पुत गई,  सोने के गहने लोहे के बन गये, नगर वासियों ने उसे नगर के बाहर निकाल दिया,  वह राजा चलते चलते मुनि विश्वामित्र के पास पंहुचा,  राजा को राजभ्रष्ट औऱ चंडालता को प्राप्त देख विश्वामित्र को दया आ गई,  दयावश विश्वामित्र जी ने घोर अपराधी त्रिकुंश से कहा कि "हे महाबली तुम्हारा मंगल हो तुम मेरे पास किस उद्देश्य से आये हो, मैं भली भांति जानता हूँ, तुम अयोध्या के राजा त्रिकंशु हो,

         चंडाल त्रिकंशु यह वाक्य सुनकर हाथ जोड़कर बोला कि "हे महाराज मेरे गुरु औऱ उनकी पुत्रों ने मुझे निराश किया है, मैं बस इतना चाहता था कि मैं सशरीर स्वर्ग जाऊ उल्टा उन्होंने मुझे चांडाल बनाकर पृथ्वी पर ही मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, मैंने जो सौ यज्ञ किये उनका भी फल मुझे नहीं मिला, क्षात्रधर्म कि शपथ खाकर कहता हूँ मैंने धर्म पूर्वक प्रजापति का पालन किया है, औऱ अब भी मैं धर्म कि खातिर ही एक यज्ञ औऱ करना चाहता हूँ, परन्तु हे मुनि मेरे गुरु लोग राजी न हुए,

         अतः हे मुनि अब आप ही अपने पुरुषार्थ से मेरे दुर्भाग्य को दूर कीजिये, राजा के ऐसे वचन सुनकर विश्वामित्र ने कहा कि "हे राजन मैं जानता हूँ कि तू धर्मात्मा है, इसलिए मैं तुझे अपनी शरण में लेता हूँ, मैं अभी सभी पुण्यात्मा महर्षियों को न्योता भेजता हूँ, वे सब आकर यज्ञ में सहायता करेंगे औऱ तू सानंद यज्ञ करेगा, गुरु श्राप से जो तेरा रूप बिगड़ गया है तू इसी रूप में स्वर्ग जायेगा, यह कहकर विश्वामित्र ने अपने परम धार्मिक पुत्रों को यज्ञ कि तैयारी करने कि आज्ञा दी औऱ अपने शिष्यों को आज्ञा दी कि समस्त श्रेष्ठ ऋषियों औऱ वशिष्ठ पुत्रों को लेकर आये,  जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध कुछ कहे, वह पूरी बात मुझसे आकर कहो,

           गुरु विश्वामित्र कि आज्ञा पाकर सभी शिष्य चारों दिशाओं में फ़ैल गये, विश्वामित्र जी का न्योता पाकर अनेक देशों के ब्रह्चारी ऋषि मुनि आने लगे, तथा सभी शिष्य भी विश्वामित्र के पास लौट आये aur बोले कि आपका न्योता पाकर सब ब्रम्हवादी ऋषि औऱ मुनि आ रहे है, ज़ब सभी देशों के ऋषि मुनि आ गये तो महोदय नामक ऋषि नहीं आये साथ ही वशिष्ठ के पुत्रों ने भी मुनि विश्वामित्र को बुरा भला कहा, ज़ब विश्वामित्र को पता चल कि महोदय ऋषि औऱ वशिष्ठ के पुत्रों उन्हें बुरा भला कहकर यज्ञ मे भाग लेने से मना के दिया है,

       तो वे क्रोधित लाल नेत्रों से बोले कि "मैं महाउग्र तपस्या कर रहा हूँ फिर भी वशिष्ठ के दुष्ट पुत्रों ने मेरी अवज्ञा की, अतः वे सात सौ वर्ष तक मुर्दा खाने वाले होंगे, वे नियमित कुत्ते का मांस खाएंगे, घृणित कुरूप होकर इधर उधर घूमेंगे मुष्टिक उनकी नाम होंगे, वहीँ महोदय नामक दुर्बुद्धि ने जो मुझे पर दोष लगाया है उसके लिए वह निषाद योनि में जन्म लेकर हिंसक, निर्दयी होकर दीर्घकाल तक मेरे क्रोध से बड़ी दुर्गति भोगेगा, तथा महोदय औऱ वशिष्ष्ठ के पुत्रों को अपनी तपस्या के बल पर मरा हुआ मान,

            महातेजस्वी विश्वामित्र ऋषियों से बोले की "यह त्रिशंकु ईक्ष्वाकु वंश का प्रसिद्द राजा है,  जो धर्मज्ञ औऱ उदार होकर मेरी शरण में आया है, तथा सशरीर स्वर्ग जाना चाहता है, अतः यह जिस प्रकार सशरीर स्वर्ग जा सके आप लोग मेरे साथ मिलकर यज्ञ कराइये, विश्वामित्र के वचन सुनकर समस्त महर्षि आपस में कहने लगे की यह कुशिकवंशीय विश्वामित्र जी बड़े क्रोधित है इसलिए यह जैसे जैसा कहते है यदि उनके अनुसार नहीं किया, तो साक्षात् अग्नि के समान विश्वामित्र क्रोधित होकर हमें भी श्राप दें देंगे, अतः ऐसा यज्ञ करो जिससे यह त्रिशंकु विश्वामित्र के तप प्रभाव से सशरीर स्वर्ग चला जाये,

         सोच विचार कर सभी ऋषियों ने वेद विधान से यज्ञ क्रिया प्रारम्भ कर दी इस यज्ञ के याजक विश्वामित्र जी बने बाकी ऋषि मुनि ऋत्विज आदि हुए, उन सबने यज्ञ विधि विधान से किया, जो कई दिनों तक चला, यज्ञ सम्पूर्ण होने पर विश्वामित्र जी ने यज्ञ भाग ग्रहण करने के लिए देवताओं को बुलाया, लेकिन बुलाने पर भी ज़ब कोई देवता यञभाग लेने नहीं आया, तब क्रोधित विश्वामित्र जी राजा त्रिशंकु से बोले, कि "हे त्रिशंकु मेरा तपोबल ही काफी है तुम्हे सशरीर स्वर्ग भेजनें के लिए, इसलिए मेरा जो थोड़ा बहुत तपस्या का फल है, उसके द्वारा ही तू सशरीर स्वर्ग जा,

         ज़ब विश्वामित्र जी ने यह कहा तो त्रिशंकु सशरीर मुनियो के आँखों के सामने ही स्वर्ग पहुचे गये, लेकिन चांडाल त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आया देख इंद्र सहित सभी देवताओं ने कहा कि "हे त्रिशंकु तू स्वर्ग में रहने लायक नहीं है तू पृथ्वी पर ही रह क्योंकि तू गुरु के श्राप से शापित है अतः हे मुर्ख तू सिर नीचे करके जमीन पर गिर, इंद्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु नीचे कि ओर गिरने लगा, तब त्रिशंकु ने विश्वामित्र जी को पुकारा तथा विश्वामित्र जी ने त्रिशंकु को वहीँ रोक दिया और क्रोधित होकर..  आगे की कथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
         
            कहानी अभी बाकी है दोस्तों अब अगले संस्करण में,  धन्यवाद

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