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नौरात्रि स्पेशल, महिसासुर का वध

                  महिषासुर का वध , श्री दुर्गा सप्तशती 

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नमस्कार दोस्तों
           इससे पहले मैंने बताया था कि  कैसे माता दुर्गा त्रिदेवो तथा समस्त देवताओं के तेज से उत्पन्न हुई, औऱ किस देवता के तेज से माता रानी के कौन से अंग बने, तथा किस देवता ने कौन से अस्त्र सस्त्र औऱ पुरस्कार प्रदान किये, लेकिन इस संस्करण में मैं आपको बताऊंगा कि कैसे माता रानी ने महिसासुर समेत समस्त असुर सेनापतियों तथा असुर सेना का नाश किया,

         दोस्तों ज़ब देवी दुर्गा का प्रदुर्भाव हुआ औऱ समस्त देवताओं ने देवी को अस्त्र सस्त्र प्रदान किये, तब देवी ऊँचे स्वर में हसने लगीं औऱ उनका वहाँ सिंह भी गर्जना करने लगा, जिससे तीनों लोक काँपने लगे, साथ ही महिसासुर का सिंघासन हिलने लगा, जिससे समस्त असुर भयभीत होने लगे, तब गर्जना करता हुआ महिसासुर हाथो में हथियार लेकर खड़ा हो गया औऱ सम्पूर्ण दैत्यगण अपनी सेना को कवच औऱ हथियारों से सुसज्जित करके महिसासुर के साथ उस सिंघनाद को लक्ष्य करके दौड़े,

        औऱ जब आगे जाकर उस देवी को देखा, जो अपनी प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थीं, उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थीं, उनके धनुष कि टंकार से सातों पाताल औऱ तीनों लोक भय से काँप रहें थे, तत्पश्चात दैत्य देवी दुर्गा पर झपटे औऱ भयंकर युद्ध शुरू हो गया, तमाम प्रकार के अस्त्र शस्त्र से चारों दिशाएं उदभाषित होने लगीं, उस समय चिक्षुर नामक महान असुर महिषासुर का सेनानायक था,

           समस्त दैत्य देवी दुर्गा के साथ युद्ध करने लगे, अन्य दैत्यों को चतुरंगिणी सेना साथ लेकर चामर भी युद्ध भूमि में कूद पड़ा, 60000 दैत्य रथियों के साथ उदग्र नामक दैत्य ने भी लोहा लिया, एक करोड महारथियों के साथ महाहनुः नामक राक्षस भी युद्ध करने लगा, वहीँ आसिलेला नामक महादैत्य पांच करोड रथी सैनिको सहित युद्ध में आ डटा, वाष्कल पांच अरब हाथीसवार, घुड़सवारों के साथ, तथा एक करोड रथियों को लेकर युद्धःक्षेत्र पंहुचा, औऱ विडाल नामक दैत्य पाँच अरब रथियों के साथ युद्ध करने लगा, स्यंम महिषासुर उस युद्ध भूमि में कोटि कोटि सहस्त्र रथों, हाथी, घोड़ों, से गिरा खड़ा हुआ था,

            सोचिये, कल्पना कीजिये कि अरबों खरबों कि संख्या में दैत्य औऱ माता रानी अकेले क्या नजारा दिखा रहा होगा उस समय, वें दैत्य देवी के साथ खडग, मूसल, फरसा, तलवार, भालों तथा असंख्य शास्त्रों के साथ युद्ध करने लगे, कुछ दैत्य उनपर अस्त्र शस्त्र से प्रहार कर रहें थे कुछ शक्ति से तथा कुछ देवी पर पाश फेंक रहें थे, देवी ने भी क्रोध से भरकर अपने अस्त्रों शस्त्रों से दैत्यों के समस्त अस्त्र शस्त्र काट डाले, वे देवी दैत्यों पर शस्त्रों कि वर्षा कर रही थीं, देवी का वहाँ सिंह भी जंगल में हिरन कि तरह दैत्यों का शिकार करने लगा,

             देवी ने जितने भी निश्वाश छोड़े वे तुरंत ही सैकड़ों हजारों गणो में प्रगट हो गये, औऱ दैत्यों से युद्ध करने लगे, देवी के प्रहार से महादैत्य मृत्यु को प्राप्त हो रहें थे, कितने ही दैत्य उनके तलवार के वार से दो टुकड़े हो गये, कितनो कि गर्दन कट गई, वहीँ कितने दैत्य मस्तक कट जाने पर भी केवल धड़ से देवी से युद्ध करने लगते, रथ, घोड़े, हाथी, दैत्यों से समस्त भूमण्डल पट गया, इस प्रकार देवी को दैत्यों का संघार करते देख दैत्य सेनापति चक्षुर देवी से युद्ध करने के लिए आगे आया, औऱ देवी से युद्ध करने लगा, लेकिन तभी देवों ने उसके सारथी औऱ घोड़े को मार गिराया, तब दैत्य सेनापति चक्षुर ने अपने तलवार से देवी कि सवारी सिंह पर वार करके देवी की बायीं भुजा पर प्रहार किया लेकिन उसकी तलवार ही टूट गई, तब क्रोधित देवी ने उस राक्षस के सैकड़ों टुकड़े कर डाले,

           दैत्य सेनापति के मारे जाने पर चामर हाथी पर सवार होकर माता से युद्ध करने लगा, लेकिन तभी देवी के वाहन सिंह ने छलांग लगाकर हाथी सहित चामर का भी वध कर दिया, उसी प्रकार उदग्र भी देवी के हाथों मारा गया, क्रोध से भरी देवी ने वाष्कल, ताम्र, अंधक को अपने बाणों से मार गिराया, तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने त्रिशूल से उग्रास, उग्रवीर्य, तथा महाहनुः नामक दैत्य को मारा, तलवार की चोट से विडाल का मस्तक काट डाला, दुर्धर, और दुर्मुख को अपने बाणों से यमलोक भेज दिया,

            इस प्रकार अपनी सेना का विनाश होते देख महिषासुर ने भैसें का रूप धारण करके देवी के गणो को मारना प्रारम्भ कर दिया, किन्ही को अपने खुरों से कुचलकर मार देता, किसी को अपने बेग से, किसी को अपनी सींघ से छेदकर मरता हुआ आगे बढ़ा, इस प्रकार वह देवी के गणों को मरता हुआ देवी के वाहन सिंह पर झपटा, जिससे देवी को भयंकर क्रोध हुआ, उधर महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोध मे भरकर धरती को अपने खुरों से खोदने लगा, तथा पर्वतो को अपनी सींघो से उठाकर फेंकने औऱ गर्जना करने लगा, उसके बेग के चक्कर देने के कारण पृथ्वी फटने लगीं, तथा पूंछो से टकराकर समुद्र पृथ्वी को डुबाने लगा, इस प्रकार क्रोध से भरे दैत्य को अपनी ओर आते देख,

           देवी चंडिका ने उस दैत्य पर पाश फेककर उसे बाँध लिया, और पाश से बंध जाने के कारण उसने भैसें का रूप त्याग दिया, औऱ तत्काल सिंह के रूप में प्रगट हुआ, उस अवस्था ज्यों ही जगदम्बा ने उसका मस्तक काटना चाहा त्यों ही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखाई देने लगा, तब देवी में उसे अपने बाणों की वर्षा से उसे बींध डाला, लेकिन इतने में वह हाथी के रूप में प्रगट हुआ, औऱ अपनी सूँड से देवी के वाहन सिंह को खींचने लगा तथा गर्जना करने लगा, तब देवी ने उसकी सूँड को कट डाला, तब उस दैत्य ने पुनः भैसें का रूप धारण कर लिया, उस समय क्रोधित जगतमाता लाल नेत्रों के साथ हँसने लगीं औऱ वह राक्षस गर्जने लगा,

            बोलते समय माता का मुख मधु के मध से लाल हो रहा था, देवी ने कहा कि " रे मुर्ख जब तक मैं मधु का पान कर रही हूँ तू गर्जना कर ले उसके बाद देवता गर्जना करेंगे, क्योंकि मेरे हांथो से ही तेरी मृत्यु होगी, यह कहकर देवी उछली औऱ उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गई,  फिर अपने पैरों से दबाकर शूल से उस दैत्य के कंठ पर प्रहार किया,  देवी के पैरों से दबे होने कारण महिषासुर मुख से अपने दूसरे रूप से बाहर आने लगा, लेकिन आधे शरीर से ही वह बाहर आने पाया, आधा शरीर निकला होने पर भी वह दैत्य देवी से युद्ध करने लगा, लेकिन तभी देवी ने उसका मस्तक काट डाला,  और महिषासुर का अंत हो गया,  यह देख सभी देवता बड़े हर्षित हुए, औऱ माता पर फूलों कि वर्षा करने लगे, और एक महा आततायी असुर के वध का जश्न मनाने लगे, तत्पश्चात सभी देवताओं ने देवी जगदम्बा कि स्तुति की,

                        तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं मुझे कमेंट बॉक्स मे जरूर बताएं,
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