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ब्रम्हा जी को कैद किया विष्णु जी ने

                        
नमस्कार दोस्तों
             आज मैं जो कथा लेकर आया हूँ इसका वर्णन लिंग पुराण मे hindi pdf के पृष्ठ स. 96 से लेकर 102 के मध्य किया गया है, कथानुसार......
          ज़ब प्रलयकाल मे एक ही अभिभाजित अंधकारमय समुद्र और चारों तरफ जल ही जल था, तब उस एकांत अकेले महासागर मे शंख, गदा, पद्म, चक्र धारण किये हुए शेषनाग कि शैय्या पर शयन करते हुए क्रीड़ा करने के लिए श्री हरि विष्णु ने महान तरुण सूर्य के समान सौ योजन लम्बा कमल का बज्र दण्ड अपनी नाभि से उत्पन्न किया, तब उस कमलदण्ड के समीप सोने के अंडे से चार मुख वाले, विशाल नेत्रों वाले, दिव्य सुगंध से युक्त ब्रम्हा जी प्रगट हुए,

       और क्रीड़ा करते हुए भगवान विष्णु को देखा, और भगवान विष्णु को देखकर विस्मय पूर्वक ब्रम्हा जी बोले कि"" आप कौन है जो इस जल के मध्य शयन कर रहें है, ब्रम्हा के ऐसे वचन सुनकर श्री हरि विष्णु जी अपनी शैय्या से उठकर बोले कि "तुम कौन हो, कहा से आये हो, कहा जाना है, और मेरे पास क्यों आये हो, श्री हरि विष्णु के ऐसा कहने पर ब्रम्हा जी ने उत्तर दिया कि "आप शम्भू कि माया से मोहित है, इसलिए आप अपने आपको आदिकर्ता मान बैठे है,
      ज़ब ब्रम्हा जी ने ऐसा उत्तर दिया तो विष्णु जी आश्चर्यचकित रह गये और निरिक्षण करने के उद्देश्य से योग के द्वारा ब्रम्हा जी के मुख से होकर पेट मे प्रवेश कर गये, और वहां विष्णु जी ने 18 द्वीप, सभी समुद्र, सभी पर्वत, तथा ब्रम्हा के सत्तम्भपर्यन्त सातों लोकों को ब्रम्हा जी के उदर (पेट) मे ही देख लिया, तब श्री हरि ने विस्मय पूर्वक इस महातपस्वी को देखने कि इच्छा से, हजारों वर्ष तक ब्रम्हा जी के पेट मे भ्रमण करते रहें, अनेको लोक, अनेको पर्वत घूमकर थक गये, लेकिन कोई अंत न मिला, तो भगवान विष्णु थक हार के ब्रम्हा जी के मुख से बाहर आ गये,


     और बोले कि आप तो आदि अंत से रहित है और न ही कोई मध्य है, न ही कोई दिशा, मैंने आपके पेट का अंत ही नहीं देखा, हे निश्पाप ब्रम्हा जी ऐसा ही आदि अंत से रहित शाश्वत मेरा भी उदर है, उसमे प्रवेश करके आप उन सभी चीजों को देख सकते है जो आप मे समाहित है, श्री हरि विष्णु कि आनदमयी वाणी सुनकर ब्रम्हा जी भी विष्णु जी के उदर मे प्रवेश कर गये, ब्रम्हा जी भी विष्णु जी के उदर मे हजारों साल घूमते रहें, लेकिन कोई आदि अंत न मिला, लेकिन तभी विष्णु जी ब्रम्हा कि गति पहचानते हुए, अपने शरीर के सभी द्वार बंद कर दिए, शूक्ष्म से शूक्ष्म छिद्र भी बंद कर दिए ,

     सभी द्वारा को बंद जानकर ब्रम्हा जी अपने शरीर को शूक्ष्म करके कमल की नली के द्वारा बाहर आये, बाहर आकर ब्रम्हा जी भगवान विष्णु से बोले कि "मैं आपको जानने कि इच्छा से आपके उदर मे घुसा था, मेरे उदर मे जैसे लोक है, वैसा ही लोक आपके उदर मे भी  है, आपको वश मे करने कि इच्छा से मैं हजारों साल घूमा, लेकिन हे महाभाग आपके शरीर के सारे द्वार बंद हो गये, तब विचार पूर्वक अपने तेज से नाभिप्रदेश कमल सूत्र से बाहर आया, इसलिये हे महाभाग अब आपको खेद प्रगट करने की आवश्यकता नहीं है अब मेरे लिए क्या आज्ञा है बताइये,
  तब ब्रम्हा जी की ऐसी श्रेष्ठ वाणी सुनकर भगवान विष्णु बोले कि " मैंने तुमको बौद्ध कराने कि इच्छा से यह क्रीड़ा पूर्वक अपने शरीर के द्वार बंद कर लिए थे, अन्य कोई भाव नहीं था, हे कल्याण मेरे धारण किये इस कमल से नीचे उतरो मैं तेजरूप आपको धारण करने मे असमर्थ हूँ, आज से तुम पद्मयोनि के नाम से प्रसिद्द होंगे,
                          तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं,                                                                                                  धन्यवाद
                                              साथ ही श्री वासुदेवाय नमः जरूर लिखें

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