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ब्रम्हा, विष्णु, महेश का जन्म कैसे हुआ,



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नमस्कार दोस्तों
          मैं राहुल आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करते हूँ, आज की कथा का वर्णन ब्रम्हवैवर्त पुराण ब्रम्हखण्ड के तीसरे अध्याय मे  किया गया है,जिसमे बताया गया है की कैसे ब्रम्हा विष्णु, महेश, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, औऱ यमराज का जन्म कैसे हुआ, आइये जानते है इस कथा के बारे मे थोड़ा सा विस्तार से.....

          दोस्तों ज़ब प्रभु ने देखा की समस्त जगत शून्यमय है, कहीं कोई जीव जंतु नहीं है, न ही जल वायु औऱ प्रकाश है सभी स्थानों पर जल औऱ अंधकार फैला हुआ है, तो मन ही मन मे आलोचना करते हुए, एक मात्र स्वेच्छामय प्रभु ने अपनी स्वेच्छा से सृष्टि की रचना प्रारम्भ कर दी, सबसे पहले उन परमपुरुष श्री कृष्ण ने दक्षिण पार्श्वभाग से कारण रूप तीन गुण प्रगट हुए, उन गुणों से अहंकार पाँच तंत्रमात्राये तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, औऱ शब्द ये पाँच विषय प्रगट हुए,

        इसके पश्चात् श्री कृष्ण से ही भगवान श्री हरी विष्णु का जन्म हुआ, जो श्याम वर्ण के चार हाथ औऱ चारों हाथों मे चक्र, गदा, शंख औऱ पद्म धारण किये हुए थे, मुख पर मंद मंद मुस्कान औऱ रत्नमय आभूषणों से विभूषित थे, तथा कौस्तुभमणि उनके वक्षस्थल की शोभा बढ़ा रही थीं, उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को हाथ जोड़कर प्रणाम औऱ स्तुति की औऱ रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठा गये,

        इसके पश्चात् परमेश्वर श्री कृष्ण के बाएं पार्श्वभाग से भगवान शिव प्रगट हुए, जिनके पाँच मुख औऱ पाँचों मुख मे तीन तीन नेत्र थे, तथा दिशाए ही उनके वस्त्र थे, सिरपर चंद्र मुकुट औऱ हाथों मे त्रिशूल लिए हुए थे, जो मृत्यु के भी मृत्यु, मृत्यु के ईश्वर, मृत्युस्वरूप औऱ मृत्यु पर विजय पाने वाले मृत्युञ्जय है, ब्रम्हतेज से ज्वाजल्यमान भगवान शिव जो समस्त वैष्णवों के भी सिरोमणि है, प्रगट होने के पश्चात् भगवान शिव ने भी श्री कृष्ण की स्तुति की औऱ प्रणाम करके श्री हरि विष्णु के बगल रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हुए,

       इसके पश्चात् परमपुरुष श्री कृष्ण के नाभिकमल से महातपस्वी ब्रम्हा जी प्रगट हुए, जिनके दाँत, वस्त्र, औऱ सभी बाल सफ़ेद थे, चार मुख वाले ब्रम्हा जी हाथ मे कमण्डल औऱ चारों वेदो को लेकर प्रगट हुए वे ही स्रिष्टा औऱ विधाता है, तथा समस्त कर्मो के करता धरता औऱ संहर्ता है, वे ही वेदो के ज्ञाता औऱ वेदो को प्रगट करने वाले है, ब्रम्हा जी ने भी श्री कृष्ण को प्रणाम किया औऱ शिवजी औऱ विष्णु जी के बगल आसीन हो गये,

         तत्पश्चात श्री कृष्ण जी के वक्षस्थल से एक पुरुष जो सफ़ेद वर्ण का था, जिनके मस्तक मे जटा थीं, जो सबका सर्वज्ञ, तथा सबके कर्मो के दृष्टा थे, उनके ह्रदय मे सबके प्रति दया भरी हुई थीं, उन्हें धर्म का ज्ञान था, वह धर्म स्वरुप धर्मज्ञ, धर्म प्रदान करने वाले, वहीँ धर्मात्मा धर्मराज के नाम से विख्यात हुए, उन्होंने भी श्री कृष्ण को प्रणाम किया औऱ सबके बगल बैठा गये,  तत्पश्चात धर्मराज के बाएँ पार्श्वभाग से एक रूपवती कन्या प्रगट हुई, जो मूर्ति नाम से विख्यात हुई,

      इसके बाद भगवान कृष्ण के मुख से देवी प्रगट हुई, जो वीणा औऱ पुस्तक धारण किये हुई थीं जो श्रुतियों, शास्त्रों, ऐरोली वाणी की अधिस्ठात्री शान्तस्वरूपिणी सरस्वती थीं, इसके बाद श्री कृष्ण के मन से गौरवर्ण की देवी प्रगट हुई, जो सम्पूर्ण ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री, फलस्वरूप, संपूर्ण सम्पत्तियों को प्रदान करने वाली राजलक्ष्मी कहलाती है, उन्होंने भी श्री कृष्ण को प्रणाम किया औऱ सबके साथ आसान पर बैठा गई,

        तदन्तर परमात्मा श्री कृष्ण की बुध्दि से सबकी अधिष्ठात्री देवी, ईश्वरी मूलप्रकृति का जन्म हुआ, वें रत्नमय आभूषणों के साथ निद्रा, तृष्णा, क्षुधा, पिपासा, श्रद्धा, औऱ क्षमा आदि की देवियाँ है, उन सबकी औऱ समस्त शक्तियों की ईश्वरी तथा अधिष्ठात्री देवी है उनकी सौ भुजाएँ है जो दर्शन मात्र से भय उत्पन्न कर दें, उन्ही को दुर्गतिनाशिनी दुर्गा कहा गया, वे परमात्मा श्री कृष्णा की शक्तिस्वरूपा तथा तीनों लोकों की जननी है, तथा तथा सभी हाथों मे अस्त्रों सश्त्रों को लिए श्री कृष्ण के सामने खड़ी हो भगवान श्री कृष्ण की स्तुति वंदना की और प्रणाम करके श्री कृष्ण की आज्ञा से श्रेष्ठ रत्न जड़ित सिंहासन पर बैंठ गयीं,,

      दोस्तों यह कथा ब्रम्हवैवर्तपुराण के अनुसार है जिसमे सभी देवी देवताओं को श्री कृष्ण से उत्पन्न बताया गया है, अगले संस्करण मे मैं आपको बाकी समस्त देवताओं की उत्पत्ति के बारे मे बताऊंगा, जैसा ब्रम्हवैवर्तपुराण मे उल्लेखित है, तो पढ़ना न भूले अगला संस्करण और अगर यह संस्करण अच्छा लगा है,
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