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शेषनाग ने पृथ्वी को फन पर क्यों धारण किया ,



                        शेषनाग ने पृथ्वी क्यों धारण की

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 नमस्कार दोस्तों
            मैं राहुल आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं,शेषनाग ने पृथ्वी को अपने सिर पर क्यों धारण किया, क्या कारण था, या किसके कहने पर किया, क्या कोई मज़बूरी थीं, अक्सर ऐसा सवाल हमारे मन मे उठता है, आज मैं आपको बताऊंगा की ऐसा कौन सा कारण था जिसके कारण शेषनाग को पृथ्वी धारण करना पड़ा, इस कथा का वर्णन महाभारत के आदिपर्व मे किया गया है,
       दोस्तों आप यह तो जानते ही है की विनता और कद्रू दक्ष प्रजापति की दो पुत्रियां थीं, जिनका विवाह ऋषि कश्यप जी से हुआ था, और कश्यप जी ने कद्रू को 1000 महाबलशाली नागपुत्र और विनता को नागपुत्रो के ही समान बलवान 2 पुत्र होने का वरदान फिया था, जिस कारण विनता को अरुण और गरुण दो पुत्र हुए, और कद्रू को शेषनाग, वासुकि, तक्षक, समेत 1000 पुत्र हुए, एक बार दोनों बहने विचरण कर रही थीं,

       तभी उन्हें विश्वश्रवा नामक घोड़ा दिखाई दिया, जोकि समुद्र मंथन मे उत्पन्न हुआ था, और चन्द्रमा के समान उज्जवल था, तब कद्रू ने विनता से शर्त लगायी की यह घोड़ा तो सफ़ेद है लेकिन इसकी पूंछ काली है, शर्त यह रखी की जो भी शर्त हारेगा वह उसकी दासी बन जायेगा, और अगले दिन घोड़े को देखना तय हुआ, अब घर पहुँचकर कद्रू ने अपने 1000 पुत्रों को आदेश दिया की तुम सब जाओ और घोड़े की पूंछ मे जाकर काले बाल बनकर चिपक जाओ, ताकि मैं शर्त जीत जाऊ,

    लेकिन कुछ सर्पों ने मना कर दिया, यह कहकर की माता यह तो छल होगा, यह सुनकर क्रोधित कद्रू ने अपने नागपुत्रो के श्राप दें दिया, की जो मेरा कहना नहीं मान रहें है वें सब जन्मेजय के यज्ञ मे जलकर भस्म हो जायेंगे, और यही श्राप की बात ज़ब शेषनाग को पता चली, तो उन्होंने अपनी माता कद्रू और समस्त भाइयों को छोड़कर तपस्या करने की ठानी, और एकांत मे जाकर तपस्या प्रारम्भ कर दी, वे केवल हवा पीकर जीवित रहने लगे, और अपने व्रत का पूर्ण पालन करने लगे, साथ ही समस्त इन्द्रियों को वश मे करके गंधमादन पर्वत, हिमालय, गोकर्ण की तराई मे एकांतवास करते हुए, पवित्र तीर्थ स्थलों की यात्रा भी करते, ऐसा करते हुए शेषनाग को कई वर्ष बीत गये,

       और ज़ब ब्रम्हा जी ने देखा की शेषनाग के शरीर की त्वचा, मांस, और नाड़ियां सुख गई है, तब ब्रम्हा जी शेषनाग के पास आये और बोले की हे शेष तुम अपनी घोर तपस्या से प्रजा को क्यों संतप्त कर रहें हो, इस घोर तपस्या का उद्देश्य क्या है बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है, तब शेषनाग जी ने कहा की "हे परमपिता मेरे समस्त भाई मुर्ख है, वे परस्पर एक दूसरे से शत्रु सा व्यवहार करते है, छोटी माता विनता अरुण और वरुण से ईर्ष्या करते है, आखिर वह भी हमारी माता और हमारे ही भाई है, इसलिए तपस्या करके यह शरीर छोड़ दूंगा, बस चिंता इस बात की है कि मारने बाद भी उन दुष्टों का साथ न हो,
        यह सुनकर ब्रम्हा जी ने कहा कि" वत्स तुम्हारे भाइयों कि करतूत किसी से छिपी हुई नहीं है, माता कि आज्ञा का उलघ्घंन करने के कारण ही वे मुसीबत मे पड़े है, तुम उनकी चिंता छोड़कर अपने लिए जो इच्छा हो वह वर मांग लो क्योंकि सौभाग्यवश तुम्हारी बुद्धि धर्म मे अटल है,  यह सुनकर शेषनाग जी बोले कि "हे परमपिता मैं यही वर चाहता हूँ कि मेरी बुद्धि, धर्म, तपस्या, और शांति मे संलग्न रहें,

     यह जानकर ब्रम्हाजी बोले कि "वत्स मैं तुम्हारी इन्द्रियों और मन के संयम से अत्यंत प्रसन्न हूँ, अतः प्रजा हित के लिए एक काम करो, यह पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर, नगर, विहारों के भर से हिलती डुलती रहती है, तुम इसे अपने मस्तक पर इसप्रकार धारण करो, जिससे यह अचल और स्थिर हो जाये, तब शेषनाग जी बोले कि "हे पितामह आप प्रजा के स्वामी है, मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए इस पृथ्वी को अवश्य धारण करूँगा, आप इसे मेरे मस्तक पर रख दीजिये, तब ब्रम्हा जी ने कहा कि "हे वत्स शेषनाग पृथ्वी तुम्हे खुद ही मार्ग प्रदान करेंगी, तुम बस इसके भीतर घुसना प्रारम्भ करो, तब ब्रम्हाजी कि आज्ञा पाकर शेषनाग जी पृथ्वी के भीतर प्रवेश करके नीचे चले गये, और समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी को चारों तरफ से पकड़कर अपने मस्तक पर धारण कर लिया तभी पृथ्वी स्थिर भाव से स्थित है,
      अगले संस्करण मे मैं आपको गरुण जी सर्पो के लिए अमृत क्यों ले आये और अपनी  माता कद्रू को के दासीपन से मुक्त कराया ,
         तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं कमेंट मे जरूर बताएं, साथ ही शेयर करना न भूले, धन्यवाद

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