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ज़ब पुरुष ने पैदा किया बच्चे को,

             ज़ब पुरुष ने पैदा किया बच्चे को

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नमस्कार दोस्तों
              आज मैं जो कथा लेकर आया हूँ इसका वर्णन विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के दूसरे अध्याय में किया गया है. कितना अजीब है न की एक पुरुष ने एक बच्चे को जन्म दिया. ऐसा कैसे संभव है आप भी यही सोच रहें है न, मैंने भी बहुत सोचा लेकिन ज़ब यह कथा पढ़ी तो वास्तविकता पता चली,  क्योंकि उस समय के ऋषि मुनि साक्षात् भगवान जैसी सिद्धियों वाले होते थे, अपनी तपस्या के बल पर असंभव कार्य भी संभव कर देते थे, यह कथा उनकी क्षमता को दर्शाती है,

कथानुसार
         ईक्ष्वाकु वंश में एक प्रतापी राजा हुए जिनका नाम था युवनाश्व, महाराज युवनाश्व ने इस पृथ्वी पर बहुत दिनों तक राज्य किया, वह प्रजापालक औऱ न्यायप्रिय थे, उनकी राज्य में सभी सुखी औऱ संपन्न थे, प्रजा भी उनसे बहुत प्रेम करती थीं,  लेकिन बहुत समय व्यतीत होने के बाद भी धर्मात्मा युवनाश्व को कोई सन्तान न हुई, जिस कारण से वह हमेशा दुखी रहने लगे, औऱ एक समय ऐसा भी आया की वह अपना राज्य त्यागकर, मुनियो के आश्रम में जा कर रहने लगे।

        लेकिन महारज युवनाश्व को दुखी देखकर ऋषियों से रहा न गया, अतः मुनीश्वरो ने राजा को सन्तान प्राप्ति के लिए एक यज्ञ का अनुष्ठान आयोजित किया, औऱ ज़ब आधी रात को यज्ञ को समाप्त हुआ तो मुनियो ने अभिमंत्रित जल को एक कलश बेदी पर रखा औऱ सोने के लिए अपनी अपनी कुटिया में चले गये, मुनियो के सो जाने के पश्चात् महाराज युवनाश्व को प्यास लगीं, तथा प्यास से व्याकुल राजा उस स्थान पर पंहुचा जहाँ सभी मुनि सोये हुए थे।

      अब मुनियो को सोया हुआ देख राजा ने उनको उठाना उचित नहीं समझा, तथा उस अभिमंत्रित महात्मशाली कलश के जल को पी लिया, जो मुनियो ने बेदी पर रखा हुआ था,  औऱ ज़ब प्रातःकाल जागने के पश्चात् मुनियो ने जल वाले कलश को यज्ञ बेदी से गायब देखा, तो ऋषियों ने पूंछा की "इस यज्ञ बेदी पर रखा जल किसने पिया, इस अभिमंत्रित जल का पान करके ही राजा युवनाश्व की पत्नी गर्भ धारण करेगी, औऱ एक महाबल विक्रमशील पुत्र को जन्म देगी,

         यह सुनकर राजा बोला की "हे मुनि मैंने ही अज्ञानता वश इस जल का पान किया है, मेरी इस अज्ञानता को क्षमा कीजिये, तब मुनियो ने कहा की हे राजन आपने भले ही यह जल अज्ञानता वश पिया है अतः जल के अभिमंत्रित होने के कारण अब आपको ही गर्भ धारण करना होगा, औऱ यह पुत्र आपसे ही उत्पन्न होगा, अब महाराज युवनाश्व को अभी तक सन्तान न होने की चिंता थीं, औऱ अब उन्हें चिंता होने लगीं की मैं पुरुष होकर कैसे पुत्र उत्पन्न करूँगा,

       लेकिन बीतते समय के साथ राजा युवनाश्व के पेट में गर्भ स्थापित हो ही गया, औऱ समय के वह गर्भ बढ़ने लगा, औऱ ज़ब समय पूरा हुआ तो वह गर्भ राजा युवनाश्व की दांयी कोख फाड़कर बाहर आया लेकिन इससे राजा की मृत्यु नहीं हुई, अब बालक ने जन्म तो ले लिया, लेकिन मुनियो को चिंता इस बात की थीं की यह बालक क्या पान (पीकर) करके जीवित रहेगा, क्योंकि स्त्री तो स्तनपान करा सकती है।

     लेकिन पुरुष नहीं, सभी ऋषिगण चिंतित हो गये, लेकिन तभी वहाँ देवराज इंद्र का आगमन हुआ औऱ देवराज ने आकर कहा की "यह बालक मेरे आश्रय जीवित रहेगा,  यह कहके इंद्र ने अपनी तर्जनी ऊँगली बालक के मुख में दें दी औऱ वह बालक भी उसे पीने लगा,  तथा उस अमृतमयी ऊँगली का आस्वादन करके वह बालक एक ही दिन में वयस्क (बड़ा) हो गया, इसलिए उसका नाम मान्धाता पड़ा, औऱ तभी से चक्रवर्ती मान्धाता सप्तद्वीपा पृथ्वी का राज्यसुख भोगने लगे,  REED MORE STORIES

  तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगीं हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं,                                                👉धन्यवाद👏

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