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हस्तिनापुर को गंगा में क्यों डूबना चाहते थे बलराम जी

    हस्तिनापुर को गंगा में क्यों डूबना चाहते थे बलराम जी

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नमस्कार दोस्तों
            आज कि कथा का वर्णन विष्णुपुराण के 5वें अंश के 25 वें अध्याय में किया गया है, कथानुसार ....

        भगवान कृष्ण और जामवंती के पुत्र का नाम था सांम्ब, एक बार सांम्ब ने दुर्योधन कि पुत्री के स्वयंबर के अवसर पर उसका हरण कर लिया, लेकिन महावीर कर्ण और अन्य योद्धाओं ने सांम्ब को युद्ध में हराकर बंदी बना लिया, ज़ब यह समाचार श्री कृष्णा को मिला तो समस्त यादव दुर्योधन आदि को मारने के लिए इकठ्ठा हुए ।

      लेकिन उनसभी को रोककर बलराम जी मदिरा के नशे में बड़बड़ाते हुए बोले कि " कौरवगण मेरे कहने से सांम्ब को छोड़ देंगे अतः मैं अकेले ही उनकी पास जाऊंगा, अतः अगले दिन बलदेव जी निकाल पड़े हस्तिनापुर के लिए, बलराम जी हस्तिनापुर के समीप पहुंचकर उसके समीप एक बगीचे में ठहर गये, उधर ज़ब दुर्योधन को यह बात पता चली की हस्तिनापुर में स्यंम बलराम जी पधारे है, ।

       तो दुर्योधन स्यंम बलराम जी के पास गया और बलराम जी को गौ, अर्ध्य, खाद्यपदार्थ निवेदित किये, उन सबको विधिवत ग्रहण करके बलदेव जी ने कौरवों से कहा कि महाराज उग्रसेन का आदेश है कि आप सब लोग सांम्ब को तुरंत छोड़ दें, बलराम के इसप्रकार वचन सुनकर भीष्म, द्रोण, और दुर्योधन को बड़ा क्षोभ (कष्ट) हुआ, और क्रोधित होकर मुसळधारी बलराम से कहने लगे कि " तुम यह क्या कह रहें हो, क्या ऐसा कोई यदुवंशी है जो कुरु वंश में उत्पन्न किसी वीर को यह आज्ञा दें सके, ।

        और यदि उग्रसेन भी कौरवों को आज्ञा दें सकता है तो राजाओं के योग्य इस श्वेत क्षत्र का क्या मतलब, अतः हे बलदेव तुम जाओ या रहो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हम लोग तुम्हारी या तुम्हारे महाराज उग्रसेन कि आज्ञा से कुकर्मी सांम्ब को नहीं छोड़ सकते, पूर्वकाल में कुकुर और अंधकवंशीय यादवगण हम माननीयों को प्रणाम करते थे, लेकिन अब वे ऐसा नहीं करते तो न सही, लेकिन स्वामी को सेवक की तरह आज्ञा देना कैसा, तुम लोंगो के साथ समान आसान पर बैठकर भोजन करके हमने ही तुम्हे गर्बीला बना रखा है इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है, वास्तव में हमारे कुल की तरफ से तुम्हारे कुल को अर्ध्यादि देना उचित नहीं है, ।

       यह सुनकर क्रोधित बलराम जी ने उनके तिरस्कार से उत्पन्न क्रोध से मत्त होकर लाल आँखों से घूरते हुए जोर से एक लात पृथ्वी पर मारी जिससे पृथ्वी फट गई, और उसकी गूँज सम्पूर्ण दिशाओं में फ़ैल कर सम्पूर्ण पृथ्वी को हिलाने लगीं, तथा बलराम जी लाल नेत्रों से बोले की " इन दुरात्मा कौरवों को ये कैसा राजमद का अभिमान है, कौरवों का महीपालत्व तो स्वतः सिद्ध है और हमारा सामयिक, ऐसा समझ कर ही आज महाराज उग्रसेन की आज्ञा का उलंघन कर रहें है, आज राजा उग्रसेन सुधर्मा सभा में स्यंम विराजमान है,  उस सभा में शचीपति इंद्र भी नहीं बैठने पाते, ।

     जिनके सेवक की स्त्रियां भी पारिजात मंजरी धारण करती है, वह भी इन कौरवों के महाराज नहीं, वे उग्रसेन ही समस्त दिशाओं के राजा बनकर रहें, अतः आज मैं अकेला ही पृथ्वी को कौरव विहीन करके ही महाराज उग्रसेन की द्वारिकापुरी जाऊंगा, आज दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, अर्जुन, भीम, नकुल,  अनन्य समस्त कौरव पांडव को उनके हाथी घोड़े समेत मारकर ही नवबधु और सांम्ब को साथ लेकर ही मैं द्वारिका में अन्य भाई बन्धुओं को देखूंगा, ।

     अतः समस्त कौरवों सहित हस्तिनापुर नगर को ही मैं गंगा जी में फेंक देता हूँ, यह सोचकर मद में चूर हलायुध बलराम जी ने हल की नोंक को हस्तिनापुर की खाई औऱ दुर्ग से युक्त प्रकार के मूल में लगाकर खींचा, जिससे समस्त हस्तिनापुर कांपने लगा,  और हस्तिनापुर को डगमगाता देख सस्ता कौरव भयभीत हो गये, ।

         और कहने लगे की " हे हलायुध क्षमा करो,  हे मुसलायुध हमें करके अपना क्रोध शान्त करें,  हे बलराम जी हम आपको आपकी पुत्रवधु समेत इस सांम्ब को भी आपको सौंपते है, हम आपके प्रभाव को नहीं जानते थे इसलिए आपका अपमान कर बैठे, कृप्या क्षमा करें, समस्त कौरव बलराम जी क्षमा मागने लगे, तब कही बलराम का क्रोध शान्त हुआ, और सांम्ब सहित अपनी पुत्रवधु को लेकर बलराम जी द्वारिकापुरी को निकाल पड़े, इसीलिए हस्तिनापुर आज भी गंगा जी की ओर झुका दिखाई देता है, ।

                   तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगीं कमेंट में जरूर बताएं, औऱ अगर अच्छी लगीं है तो शेयर भी करें,
 
                                आवश्यक सुचना कमेंट में ""जय श्री कृष्णा "" लिखना न भूलें
                                                                   👉 धन्यवाद👈

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