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मोहमाया का जन्म कैसे हुआ,


                                मोहमाया का जन्म 

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नमस्कार दोस्तों
        आज की कथा का वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में किया गया है, जिसमे बताया गया है की कैसे महामाया योगनिद्रा का जन्म हुआ, औऱ कैसे महामाया योगनिद्रा के प्रभाव से भगवान विष्णु मुक्त हुए, तथा मधु कैटभ का वध कैसे हुआ. आइये जानते है इस कथा को थोड़ा विस्तार से......

 दोस्तों
           ज़ब सम्पूर्ण जगत में जल ही जल था, उस समय सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा के आश्रय सो रहें थे, उसी समय भगवान विष्णु के कानों के मैल से दो भयंकर महाबली राक्षस उत्पन्न हुए, जो मधु औऱ कैटभ नाम से विख्यात थे, वे दोनों विशालकाय राक्षस उत्पन्न होते ही ब्रम्हा जी को मारने के लिए तैयार हो गये। उधर भगवान विष्णु की नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रम्हाजी ने ज़ब दोनों भयानक असुरों को अपने पास आते औऱ भगवान विष्णु को सोया हुआ देखा।

         तब एकाग्रचित होकर भगवान विष्णु को जगाने के लिए, विष्णु जी के नेत्रों में वास करने वाली महामाया योगनिद्रा की स्तुति आरम्भ कर दी, तमाम प्रकार से स्तुति करने के बाद ब्रम्हा जी बोले, " कि ऐसी स्थिति में तुम्हारी कौन कौन सी स्तुति हो सकती है, जो इस जगत का पालन औऱ संघार करते है, उन भगवान को भी ज़ब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तो तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है, मुझको भगवान शंकर को औऱ औऱ भगवान विष्णु को तुमने ही शरीर धारण कराया है ।

      अतः तुम्हारी स्तुति कि शक्ति किसमे है, हे देवी ये जो दोनों असुर महाबली मधु औऱ कैटभ है इनको मोहित करके मोह में डाल दो, औऱ जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही अपनी योगनिद्रा से मुक्त कर दो, साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान असुरों  को मारने कि बुद्धि उत्पन्न करो, ज़ब ब्रम्हाजी ने भगवान विष्णु जी को जगाने के लिए तमोगुण कि अधिष्ठात्री देवी महामाया योगनिद्रा कि इस प्रकार स्तुति की।

        तब योगनिद्रा भगवान विष्णु के नेत्र, मुख, नाक, बाहु, वक्षस्थल, औऱ ह्रदय से निकाल कर ब्रम्हाजी के सामने खड़ी हो गई, औऱ योगनिद्रा से मुक्त होकर भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या से जाग उठे, औऱ उन असुरों को देखा, वें दुरात्मा मधु औऱ कैटभ अत्यंत बलशाली औऱ पराक्रमी थे, औऱ क्रोधित लाल नेत्रों से ब्रम्हाजी को खाने के लिए जा रहें थे, तब भगवान विष्णु जी ने उन दोनों असुरों के साथ 5000 वर्षों तक लेवल बाहुयुद्ध किया,  वे दोनों बल के घमंड में उन्मत्त हो रहें थे, औऱ ज़ब इधर मोहमाया ने उन दोनों राक्षसों पर मोह डाला, तो उस मोह के वश में होकर।

      वे राक्षस भगवान विष्णु से बोले कि  " हम तुम्हारी वीरता से अत्यंत प्रसन्न है अतः तुम हमसे जो चाहे वर मांग लो " यह सुनकर भगवान विष्णु बोले कि " यदि तुम दोनों सचमुच मुझपर प्रसन्न हो, तो अब तुम मेरे हाथों मारे जाओ, बस इतना सा ही वर माँगा है यहाँ किसी दूसरे से क्या वर मांगना, इस प्रकार इस प्रकार धोखे में आ जाने पर, ज़ब उन राक्षसों ने समस्त जगत में जल ही जल देखा तो वे श्री हरि विष्णु जी से बोले कि " ठीक है लेकिन जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहाँ सूखा स्थान हो वहाँ हमारा वध करो," क्योंकि वे जानते थे कि सम्पूर्ण जगत तो जल में डूबा हुआ है, ज़ब कोई सूखा स्थान ही नहीं है तो विष्णु जी उन्हें मरेंगे कहा पर, वह तो अबध्य ही रहेंगे, लेकिन लेकिन भगवान विष्णु तो भगवान विष्णु ठहरे तब तथास्तु कहकर शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु ने उन दोनों राक्षसों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर अपने चक्र से काट डाला।
           इस प्रकार माँ दुर्गा के पहले अवतार महामाया योगनिद्रा का जन्म  हुआ, जो स्यंम प्रगट हुई थीं,

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