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आँखों की पलकें क्यों खुलती औऱ बंद है,

       आँखों की पलकें क्यों खुलती औऱ बंद है,

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नमस्कार दोस्तों 

                   क्या आपने कभी सोचा है हमारी आंखों को पलकें क्यों अपने आप खुलती औऱ बंद होतीं है, ऐसा कौन सा कारण या रहस्य है जिसके वजह से ऐसा होता है, हमारे धर्मग्रंथो में इससे सम्बंधित एक कथा है जो यह दर्शाती है कि आँखों के खुलने औऱ बंद होने के पीछे दैवीय कारण है औऱ मैं आज वहीँ कथा लेकर आया हूँ, जिसका वर्णन विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के पांचवें अध्याय में किया गया है,

            दोस्तों विष्णुपुराण के अनुसार ईक्ष्वाकु वंश निमि नामक राजा हुए, जिन्होंने सहस्त्रों वर्ष चलने वाले यज्ञ को लड़ने कि ठानी, अतः इसीलिए उद्देश्य के साथ राजा निमि ब्रहर्षि वशिष्ठ के पास गये aur प्रणाम करके बोले कि " हे मुनि आप हमारे कुलगुरु है अतः मैं जो यज्ञ करना चाहता हूँ आप उस यज्ञ का कार्यभार संभाले, लेकिन वशिष्ठ मुनि ने कहा कि " हे राजन पांच सौ वर्ष तक चलने वाले इंद्र के यज्ञ को कराने के लिए मैंने पहले ही हामी भर लिए है अतः इतने वर्षो तक ठहरो वहाँ से आने के पश्चात् मैं आपका भी यज्ञ संपन्न करा दूंगा, ऋषि वशिष्ठ का जबाब सुनकर राजा निमि ने वशिष्ष्ठ जी को कोई भी उत्तर नहीं दिया, और राजा निमि अपने महल लौट आये, औऱ महर्षि वशिष्ठ जी ने यह समझकर कि राजा निमि ने उनका वचन स्वीकर कर लिया है, इंद्र का यज्ञ आरम्भ कर दिया है,

            किन्तु राजा निमि ने भी उसी समय महर्षि गौतम औऱ अन्य ऋषियों के साथ अपना यज्ञ आरम्भ करवा दिया, औऱ उधर ब्रम्हर्षि वशिष्ठ जी इंद्र के 500 वर्ष के यज्ञ का समापन  होते ही, मुझे राजा निमि का भी यज्ञ कराना है ऐसा विचार कर, इंद्र के यहाँ से प्रस्थान किया औऱ सीधा राजा निमि के यहाँ आ पहुँचे, लेकिन ज़ब वशिष्ठ जी राजा निमि ले यहाँ पहुँचकर देखते है कि वहाँ यज्ञ का सारा कार्यभार महर्षि गौतम संभाल रहें है,  और अपना कर्म ऋषि गौतम को करता देख, क्रोधित वशिष्ठ जी ने सोते हुए राजा निमि को श्राप दें दिया कि " मेरी अवज्ञा करके सम्पूर्ण यज्ञ का कार्यभार ऋषि गौतम को सौंपा इसलिए तू देहहीन (मृत्यु) हो जायेगा,

         औऱ सोकर उठने के बाद ज़ब राजा निमि को इस श्राप का पता चला, तो राजा निमि ने भी अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी को श्राप दें दिया कि " इस गुरु ने बिना कारण जाने औऱ बातचीत किये मुझ सोये हुए को देहविहीन होने श्राप दिया इसलिए इसका शरीर भी नष्ट हो जायेगा, इस प्रकार श्राप देकर राजा ने भी अपने प्राण त्याग दिए, और राजा निमि के श्राप से कारण वशिष्ठ जी का लिंगदेह मित्रावरुण के वीर्य में प्रविष्ट हुआ, और अप्सरा उर्वशी को देखने से मित्रावरुण का वीर्य स्खलित होने पर उसी से ब्रम्हर्षि वशिष्ठ ne दूसरा शरीर धारण किया, और उधर राजा निमि का शरीर भी उनकी मंत्रियों ने मनोहर गन्ध और तेल आदि से सुरक्षित रखा था, जिसके कारण राजा निमि का शरीर भी सड़ा गला नहीं बल्कि तत्काल मारे हुए के समान ही बना रहा,

         अतः ज़ब राजा निमि का यज्ञ समाप्त हुआ तो सभी देवता अपना यज्ञ भाग ग्रहण करने के लिए आये तो ऋषिगण बोले कि " देवताओं यजमान को वार प्रदान करें, अतः देवताओं के द्वारा बार बार कहे जाने पर राजा निमि कि आत्मा ने उनसे कहा कि " भगवन आप लोग समस्त संसार के दुःख दूर करने वाले हैं और मेरे विचार से शरीर और आत्मा के वियोग होने से जैसा दुःख होता है,  वैसा aur कोई दुःख नहीं है इसलिए मैं दोबारा शरीर ग्रहण नहीं करना चाहता, अतः मैं समस्त लोगो के नेत्रों में वास करूँ मुझे ऐसा वरदान प्रदान करें, राजा निमि के ऐसा कहने पर समस्त देवताओं ने राजा निमि को समस्त जीवों के नेत्रों  में अवस्थित कर दिया,
                                     तभी से समस्त प्राणियों के आँखों कि पलकें अपने आप खुलना और बंद होना प्रारम्भ हो गई,

        तो दूसरो आपको यह कथा अगर अच्छी लगीं है तो इसे शेयर अवश्य करें, और कमेंट करके मुझे भी बताएं कि आपको यह कथा कैसी लगीं,
                                                    👉धन्यवाद👈

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