Breaking News

नौरात्रि स्पेशल :- माँ दुर्गा का जन्म


                                 माँ दुर्गा का जन्म 

     https://www.rahulguru.com
नमस्कार दोस्तों
            आज की कथा वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती के 2 अध्याय मे किया गया है, जिसमे बताया गया है की कैसे देवी दुर्गा सभी देवताओं के तेज से उत्पन्न हुई, औऱ किस देवता के तेज से देवी दुर्गा के कौन कौन से अंग बने तथा किस देवता ने देवी दुर्गा को कौन कौन से अस्त्र शस्त्र तथा पुरस्कार प्रदान किया, आइये जानते है विस्तार से....

        दोस्तों पूर्वकाल में देवता औऱ असुरों में घोर युद्ध हुआ, जिसमे असुरों का स्वामी महिषासुर औऱ देवताओं के स्वामी इंद्र थे, उस संग्राम में देवताओ की सेना महिषासुर से बुरी तरह परास्त हो गई, और देवताओं को जीतकर महिषासुर स्यंम इन्द्र बन बैठा, तब पराजित देवता परमपिता ब्रम्हाजी को साथ लेकर उस स्थान पर गये जहाँ, भगवान शिव जी और भगवान विष्णु जी विराजमान थे,

    औऱ देवताओं ने दोनों महेश्वरों को प्रणाम करके महिषासुर के पराक्रम औऱ अपनी पराजय कि बात भगवान शिव औऱ विष्णु जी से कहीं, औऱ बोले कि हे देवेश्वर महिषासुर ने सभी देवताओं के अधिकार छीन लिए है औऱ स्यंम इन्द्र बंद बैठा है, औऱ हम देवता साधारण मनुष्यों कि भांति पृथ्वी पर विचरण (घूमना) कर रहें है, अब हम आपकी शरण में आये है अब आप ही हमें उस असुर महिषासुर से छुटकारा दिला सकते है, अतः उसके वध का कुछ उपाय सोचिये भगवन,

     इस प्रकार के वचन सुनकर भगवान शिव औऱ विष्णु जी को उस दैत्य पर बड़ा क्रोध आया, उनकी आँखों कि भौहें तन गई, तब अत्यंत क्रोध से भरे विष्णु जी के मुख से एक तेज उत्पन्न हुआ, औऱ उसी प्रकार का तेज भगवान शिव औऱ परमपिता ब्रम्हा तथा समस्त देवताओं के मुख से भी उत्पन्न हुआ, औऱ ज़ब वह तेज मिलकर एक हुआ, तो वह प्रकाश पुज्ज एक पर्वत के आकर में बदल गया, जिससे सम्पूर्ण दिशाए प्रकाशित होने लगीं,

      औऱ उसी एकत्रित हुए तेज से एक नारी का आकर उत्पन्न हुआ, जिसका प्रकाश तीनों लोकों में व्याप्त हुआ जान पड़ता था, तब भगवान शिव का जो तेज था उससे उस देवी का मुख प्रगट हुआ, श्री विष्णु के तेज से देवी कि भुजाएँ उत्पन्न हुई, यमराज के तेज से उनके सिर के बाल उत्पन्न हुए, चंद्र के तेज से दोनों स्तन, इंद्र के तेज से मध्य भाग, वरुण के तेज से जंघा, औऱ पिंडली, पृथ्वी के तेज से नितम्ब भाग प्रगट हुआ, ब्रम्हा के तेज से दोनों चरण, औऱ सूर्य के तेज से उनकी उंगलियां उत्पन्न हुई, वसुओं के तेज से हाथों कि उंगलियां, औऱ कुबेर के तेज से नसिका (नाक) प्रगट हुई, उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज से औऱ तीनों नेत्र अग्नि से प्रगट हुए, औऱ उसी प्रकार भौहें संध्या से तथा कान वायुदेव के तेज से प्रगट हुए, इसी प्रकार अनन्य देवताओं के तेज से देवी कल्याणी का अभिर्भाव हुआ,

     उस समय समस्त देवताओं के तेज से उत्पन्न हुई देवी को देखकर समस्त देवता बहुत प्रसन्न हुए, तब भगवान शिव ने अपने शूल से एक शूल निकाल कर प्रदान किया, विष्णु जी ने अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके देवी को प्रदान किया, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायुदेव ने धनुष औऱ बाण, देवराज इंद्र ने बज्र से बज्र उतपन्न करके दिया, यमराज ने कालदण्ड से दण्ड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिककाक्ष कि माला, ब्रम्हाजी ने कमण्डल, सूर्य ने अपना तेज, काल ने तलवार औऱ ढाल, क्षीर सागर ने उज्जवल हार, दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, सभी भुजाओं के लिए केयूर, दोनों चरणों के लिए नूपुर, कड़े, उज्जवल अर्धचंद्र, गले कि सुन्दर हसुली, सभी उंगलियों के लिए रत्नो से बनी अंगूठी, तथा कभी न जीर्ण (गन्दा) होने वाला वस्त्र प्रदान किया,

         विश्वकर्मा ने अत्यंत निर्मल फरसा, साथ ही अनेक प्रकार के अस्त्र सस्त्र, अभेद कवच दिए, इसके आलावा मस्तक औऱ वक्षस्थल पर धारण करने वाली कभी न कुम्भलाने वाली कमल कि माला दी, जलधि ने उन्हें सुन्दर कमल फूल भेंट किया, हिमालय ने सवारी के लिए सिंह (शेर) औऱ रत्न, तथा कुबेर ने मधु से भरा पानपात्र दिया, औऱ समस्त नागों के राजा शेषनाग जो इस पृथ्वी को धारण करते है, उन्होंने मणियों से विभूषित नागहार प्रदान किया,

        अन्य देवताओं ने भी तमाम प्रकार के अस्त्र सस्त्र देकर देवी का सम्मान किया, तत्पश्चात उस देवी ने तथा उनके सिंह ने ऊंचे स्वर में गर्जना कि जिससे तीनों लोक कांप उठे औऱ पृथ्वी हिलने लगीं, उस समय समस्त देवताओं ने देवी सिंघवाहिनी भवानी कि स्तुति कि, इस प्रकार माता शेरावाली का जन्म हुआ,

                   तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं कमेंट में जरूर बताएं, औऱ जय माता दी लिखना न भूले, धन्यवाद

REED MORE STORIES :-
 १:- नवरात्रि स्पेशल - महिषासुर का वध
२:- शिवजी को वश में कैसे करें
 ३:- ब्रम्हा जी की मृत्यु क्यों हुई
४:- कार्तिकेय जी क्यो मारना चाहते थे गणेश जी को

कोई टिप्पणी नहीं