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ब्रम्हाजी ने कई बार अपना शरीर क्यों त्यागा ,

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नमस्कार दोस्तों 
        क्या आप जानते है कि ब्रम्हा जी ने कई बार अपने शरीर का त्याग किया था। सुनने में ये भले ही अजीब लगे। लेकिनi विष्णु पुराण के प्रथम अंश के पांचवें अध्याय में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कैसे ब्रहा जी ने अपने शरीर से रात, दिन, सुबह, शाम, देवता, मनुष्य, राक्षस, गंधर्व, जानवर, औषधि आदि की उत्पति करने के लिए बार बार अपने शरीर का त्याग किया था, कथानुसार.......

          दोस्तों जब समस्त जगत में जल ही जल था तब भगवान विष्णु के नभिकमल से उत्पन्न पितामह ब्रम्हा जी को सृष्टि कि रचना का भार सौंपा गया। तब परमपिता ब्रम्हा जी ने मनुष्य, देवता, असुर, पितृगण इन चारो की तथा जल की सृष्टि करने कि इच्छा से अपने शरीर का उपयोग किया था। और तब सृष्टि की रचना की कामना से परमपिता के युक्तचित्त होने पर ब्रम्हा जी के शरीर में तमोगुण की वृद्धि हुई, अतः सबसे पहले उनकी जंघा से असुर उत्पन्न हुए। तब ब्रम्हा जी ने उस तमोमय शरीर को छोड़ दिया। और वह छोड़ा हुआ शरीर ही रात्रि हुआ। और ब्रम्हा जी ने सत्वप्रधान शरीर धारण किया, और उस सत्वप्राधन शरीर के मुख से सत्वप्रधान देवगण उत्पन्न हुए, तदन्तर ब्रम्हा जी ने उस सत्वप्रधान शरीर का भी त्याग कर दिया, औऱ वहीँ त्यागा हुआ सत्वप्रधान शरीर ही दिन बना, इसलिए असुर रात्रि मे बलवान होते है, औऱ दिन मे देवगणो का बल विशेष होता है,

        इसके बाद ब्रम्हा जी ने आंशिक सत्वमय शरीर धारण किया, औऱ अपने को पितृ तिक्त मानते हुए, अपने पार्श्वभाग से पितृगण की रचना की, औऱ उस शरीर का त्याग कर दिया, वह त्यागा हुआ शरीर ही दिन औऱ रात्रि के मध्य स्थित संध्याकाल बनी, तत्पश्चात उन्होंने आंशिक रजोमय शरीर अन्य धारण किया, उससे रजप्रधान मनुष्य उत्पन्न हुए, औऱ ब्रम्हा जी ने उस शरीर का भी त्याग कर दिया, जोकि ज्योत्सना मतलब प्रातःकाल बनी, इसलिए प्रातःकाल को मनुष्य औऱ सांयकाल को पितृगण बलवान होते है, इसलिए प्रातःकाल, दिन, सांयकाल औऱ रात्रि ये चारों ब्रम्हा जी के ही शरीर है,।

     इसके बाद ब्रम्हा जी ने एक औऱ रजोमात्रत्मक शरीर धारण किया, जिसके द्वारा ब्रम्हाजी से क्षुधा उत्पन्न हुई, क्षुधा से काम की उत्पत्ति हुई, तब प्रजापति ने अंधकार स्थित होकर क्षुधाग्रस्त सृष्टि की रचना की, उसमे बड़े कुरूप औऱ दाढ़ी मूँछ वाले व्यक्ति उत्पन्न हुए, वे स्यंम ब्रम्हा जी को खाने के लिए दौड़े, उनमे से जिन्होंने कहा ऐसा मत करो, इनकी रक्षा करो, वे राक्षस कहलाये, औऱ जिन्होंने कहा कि हम खाएंगे, वे खाने कि कामना वाले यक्ष कहलाये, उनकी इस अनिष्ट प्रवित्ति को देखकर ब्रम्हा जी के केश सिर से गिर गये, और पुनः उनके मस्तक पर आरूढ़ हुए, इस प्रकार केश ऊपर चढने के कारण वे सर्प कहलाये, औऱ नीचे गिरने कारण अहि कहे गये,।

     तब जगत रचयिता ब्रम्हाजी ने क्रोधित होकर क्रोधयुक्त प्राणियों कि रचना की, वें कपीश मतलब कालापन लिए हुए वर्ण के अति उग्र मतलब क्रोधित स्वभाव वाले मांसाहारी प्राणी हुए, इसके बाद गान करते हुए ब्रम्हा जी के शरीर से गन्धर्व उत्पन्न हुए, वे वाणी का उच्चारण अर्थात गाते हुए उत्पन्न हुए थे इसलिए गन्धर्व कहे गये, इस सब की रचना करके ब्रम्हा जी ने पक्षियों को उनके पूर्व कर्म से प्रेरित होकर स्वच्छंदता अपनी आयु से रचा, तत्पश्चात उनके वक्षस्थल से भेड़, मुख से बकरी, उदर (पेट) औऱ पार्श्वभाग से गौ, पैरों से घोड़े, हाथी, गधे, वनगाय, मृग, ऊंट, ख़च्चर, आदि पशुओं की रचना की, उनके रोमों से फल मूलरूप औषधियां उत्पन्न हुई,

         फिर अपने प्रथम मुख से :- गायत्री, ऋक, त्रिवृतसोम, रथन्तर, औऱ अग्निस्टोम यज्ञों को निर्मित किया,
दक्षिण मुख से :- यजु, त्रिष्टुपछन्द, यज्ञदशस्तोम, बृहस्साम तथा उक्ना की रचना की,
पश्चिम मुख से :- शाम, जगतीच्छन्दा, सप्तदशस्तोम वैरूप, औऱ अतिरात्र को उत्पन्न किया तथा
उत्तर मुख से :- एकविशतिस्तोम, अथर्ववेद, आप्योयार्माण, अनुष्टुपछन्द औंर वैराण की रचना की
   
        इस प्रकार शरीर के समस्त ऊँच नीच प्राणी उत्पन्न हुए, उन आदिकर्ता ब्रम्हा जी ने देव, असुर, पितृगण, औऱ मनुष्यों की सृष्टि कर तदन्तर कल्प का आरम्भ होने पर यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, मनुष्य, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, और सर्प आदि संपूर्ण नित्य और अनित्य जगत की रचना की, उनके जैसे कारण पूर्व कल्पो मे थे, पुनः सृष्टि होने पर उनकी उन्ही मे फिर प्रवित्ति हो जाती है, उस समय हिंसा-अहिंसा, मृदुता-कठोरता,  धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, ये सब उनकी पूर्व भावना के अनुसार प्राप्त हो जाते है,

      दोस्तों चातुर्वर्ण व्यवस्था का वर्णन विष्णुपुराण के छठें अध्याय मे मिलता है, जिसके अनुसार ब्रम्हा जी के मुख से सत्वप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई जोकि ब्राम्हण थे, वक्षस्थल से रजप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई जोकि क्षत्रिय थे, जंघाओं से रज औऱ तमविशिष्ट प्रजा उत्पन्न हुई जोकि वैश्य थे, तथा सबसे नीचे पैरों से तमप्रधान प्रजा उत्पन्न हुई जोकि शूद्र कहलाये, इस प्रकार ही चारों वर्ण उत्पन्न हुए जो क्रमशः मुख, वक्षस्थल, जंघा औऱ पैर से उत्पन्न हुए औऱ क्रमशः ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, औऱ शूद्र कहलाये, कथा कैसी लगीं कमेंट मे जरूर बतायें,    धन्यवाद

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