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गरुण भगवान विष्णु के वाहन कैसे बने

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नमस्कार दोस्तों
      आज कि कथा का वर्णन महाभारत के आदिपर्व मे किया गया है, जिसमे बताया गया है कि गरुण जी भगवान विष्णु के वाहन कैसे बने, गरुण का जन्म कैसे हुआ, पृथ्वी पर सर्पों का जन्म कैसे हुआ, हुए सर्पों कि जीभ कैसे फटी, तथा गरुण जी सर्पों के लिए अमृत क्यों ले आये, ये सभी कथाएं आज मैं आपके लिए लेकर आया हूँ आइये जानते है कथा को विस्तार से कथानुसार......
       दक्ष प्रजापति कि दो पुत्रियां थीं जिनका नाम कद्रू औऱ विनता था, औऱ उनका विवाह कश्यप मुनि से हुआ था, एक दिन महर्षि कश्यप जी अपनी पत्नियों से खुश होकर बोले कि "तुम दोनों कि जो इच्छा हो वर मांग लो " तब कद्रू ने कहा कि "1000 महाबलशाली औऱ समान तेजस्वी नाग पुत्र मेरे हो " औऱ विनता बोली कि "तेज, शरीर औऱ बुद्धि बल मे कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ केवल दो पुत्र मेरे हो " तब कश्यप जी एवमस्तु कहा औऱ सावधानी पूर्वक गर्भ धारण करने को कह कर वन मे तपस्या करने चले गये,
      समय आने पर कद्रू ने 1000 औऱ विनता ने दो अंडे दिए, जब पाँच सौ वर्ष हुआ तो कद्रू के 1000 पुत्र अंडे से बाहर आ गये, लेकिन विनता के दोनो पुत्र बाहर नहीं निकले, तो विनता ने एक अंडा अपने हाथ फोड़ डाला,उस अंडे का शिशु आधे शरीर से तो हष्ट पुष्ट था, लेकिन नीचे का हिस्सा अभी कच्चा था, तब क्रोधित नवजात शिशु अपनी माता को श्राप देते हुए बोला कि " माता तूने लोभवश मेरे अधूरे शरीर को बाहर निकला है, इसलिए तुझे घोर कष्ट सहना पड़ेगा, औऱ यदि तूने दूसरे अंडे के साथ ऐसा नहीं किया तो उससे उत्पन्न बालक ही तुझे इस श्राप से मुक्त करेगा, यदि तेरी इच्छा है कि तेरा पुत्र बलवान हो, तो धैर्य पूर्वक 500 वर्षों तक औऱ प्रतीक्षा कर,
         ऐसा श्राप देकर वह बालक आकाश मे चला गया, जो आगे चलकर सूर्यदेव का सारथी बना, aur अरुण नाम से प्रसिद्द हुआ, एक बार कद्रू औऱ विनता विचरण (घूमना) कर रही थीं, तभी उन्हें एक घोड़ा दिखाई दिया, यह वहीँ उच्चैःश्रवा घोड़ा था जो समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ था, उसे देखकर कद्रू ने विनता से कहा कि "बहन जल्दी बताओ यह घोड़ा किस रंग का है, तब विनता ने कहा कि "यह घोड़ा सफ़ेद रंग का है तूँ इसे किस रंग का समझ रही हो " तब कद्रू ने कहा कि " निश्चित ही यह घोड़ा सफ़ेद रंग का है लेकिन इसकी पूंछ काली है" इस बात को लेकर दोनों बहनों ने शर्त लगा ली, औऱ शर्त यह रखी कि जो शर्त हारेगा वह उसकी दासी बनकर रहेगा, इस तरह शर्त लगाकर दोनों ने दूसरे दिन घोड़े को देखना तय किया, औऱ  वापस अपने घर लौट आयी,
      घर पहुँचकर कद्रू अपने ने 1000 नागपुत्रो को आदेश दिया कि " तुम सब काले बाल बनकर उच्चैःश्रवा नामक घोड़े कि पूंछ मे चिपक जाओ, ताकि मैं शर्त जीत जाऊँ, और मुझे विनता का दासी ना बनना पड़े, लेकिन कुछ सर्पों ने कहा कि " माता यह तो छल होगा, जिन सर्पों ने कद्रू कि आज्ञा नहीं मानी, उनको कद्रू ने श्राप दिया कि " जाओ तुम लोग जन्मेजय के सर्पयज्ञ मे जलकर भस्म हो जाओगे, बाकी बचें सर्पों ने निश्चय किया कि वह माता की मदद करेंगे, अब सुबह दोनों बहने घोड़े को देखने पहुँच गई,
       और ज़ब घोड़े को देखा तो उसका सारा शरीर चंद्रमा के समान उज्जवल था, लेकिन पूंछ काली, क्योंकि सभी सर्प काले बाल बनकर घोड़े की पूँछ को ढँक लिया था, पूँछ काली देकर विनता उदास हो गई, औऱ कद्रू ने विनता को दासी बना लिया, उधर समय पूरा होने पर गरुण जी अंडे से बाहर आये, उनके तेज से समस्त दिशाएँ प्रकाशित हो गई, आँखे बिजली के समान पीली, औऱ शरीर अग्नि के समान तेजस्वी, वें जन्मते ही आकाश मे उड़ गये,
      अग्नि के समान विशालकाय को देखकर, इंद्र जी अग्नि के पास गये, औऱ बोले की " हे अग्नि देव आप अपना शरीर इतना मत बढ़ाइए, देखिये आपकी यह तेजोमयी मूर्ति मेरी तरफ आ रही है तब अग्निदेव ने बताया कि " यह मूर्ति मेरी नहीं अपितु विनतानंदन पक्षीराज गरुण कि है, वें नागों के नाशक, देवताओं के हितैषी है, तब समस्त मुनि औऱ देवताओं ने गरुण कि स्तुति की, स्तुति सुनकर गरुण जी बोले की "जो मेरा विराट शरीर देखकर घबरा गये थे, वें बिल्कुल भी भयभीत न हो मैं अपने शरीर को छोटा औऱ तेज को कम कर सकता हूँ, यह सुनकर देवता औऱ मुनि सभी प्रसन्नता पूर्वक लौट गये,
       एक दिन गरुण जी अपनी माता के साथ बैठे थे, तभी कद्रू ने गरुण से कहा की मेरे पुत्रों को घूमने की इच्छा है, अतः इन्हे अपने कंधे पर बैठकर घुमाकर ले आओ, तब गरुन जी ने सर्पों को पर्वत, द्वीप, वन, आदि स्थानों पर घुमाया, ज़ब गरुण जी वापस आये तो अपनी माता से बोले की "हे माते मुझे कद्रू औऱ सर्पों की आज्ञा का पालन क्यों करना चाहिए, तब विनता बोली कि " पुत्र इन सर्पों से छल से मैं एक शर्त हार गई थीं, जिसके कारण मुझे अपनी सौतन कद्रू कि दासी बनना पड़ा, औऱ तू मेरा पुत्र होने के कारण तू भी इनका दास है,
    सुनकर दुखी गरुण जी सर्पों के पास गए औऱ सर्पों से बोले कि " हे सर्पगण मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ, कौन सी वस्तु है जो लगा दूँ, अथवा ऐसा कौन सा उपकार कर दूँ, जिससे मैं औऱ माता तुम्हारी दासता से मुक्त हो जाएं, तब नागों ने कहा कि " गरुण यदि तुम हमारे लिए अमृत ला सको, तो हम तुम्हे औऱ तुम्हारी माता को अपनी दासता से मुक्त कर देंगे, नागों कि बात सुनकर गरुण जी अपनी माता के पास गये औऱ बोले कि "माता मैं अमृत के लिए तो जा रहा हूँ, लेकिन मैं वहाँ खाऊंगा क्या, तब विनता बोली कि" बेटा समुद्र द्वीप मे निषादों की बस्ती है, उन्हें खाकर तुम अमृत ले आओ लेकिन ध्यान रहें ब्राम्हण का वध कभी मत करना,

       गरुण जी माता की आज्ञानुसार द्वीप के निषादों को खाकर आगे बढ़ने लगे, इसी बीच गरुण कश्यप जी से मिले, तथा कश्यप जी ने भी अपने पुत्र गरुण का कुशल मंगल पूछा, तब गरुण ने कहा की माता शकुशल हैं, औऱ मैं माता को दासीपन से छुड़ाने के लिए सर्पों के लिए अमृत लेने जा रहा हूँ, माता ने तो निषादों को खाने के लिए कहा था, लेकिन मेरा पेट उनसे नहीं भर रहा है, अब आप ही कुछ उपाय बताएं, जिसे खाकर मैं अमृत ला सकूँ,
     तब कश्यप जी ने कहा की "यहाँ से थोड़ी दूर पर एक सरोवर है उसमे एक हाथी औऱ एक कछुवा रहता है हाथी छः योजन ऊँचा औऱ 12 योजन लम्बा है, औऱ कछुवा 3 योजन ऊँचा औऱ 10 योजन गोल है, वे दोनों एक दूसरे के प्राण के भूंखे है, अतः तुम उन दोनों भयंकर जन्तुओ को खाकर अमृत ले आओ, अब कश्यप जी की आज्ञा पाकर गरुण जी उस सरोवर पर गये, और अपने एक पैर मे हाथी औऱ दूसरे पैर मे कछुवें को पकड़कर उड़ते हुए आलम्ब तीर्थ जा पहुँचे,
       वहाँ स्वर्णगिरि पर्वत पर बहुत से देववृक्ष के पेड़ थे, जो गरुण जी को देखकर काँपने लगे की कहीं इनके धक्के से टूट न जाय, उन वृक्षों को भयभीत देख गरुण जी दूसरे दिशा मे चल दिए, गरुण को जाते देख एक वटवृक्ष निवेदन किया कि आप मेरी सौ योजन लम्बी शाखा पर बैठकर इस हाथी और कछुए को खा सकते है, लेकिन जैसे ही गरुण जी वटवृक्ष कि शाखा (डाल) पर बैठे वह टूटकर नीचे गिरने लगीं, तभी गरुण जी ने उस टूटी शाखा को अपने एक चोंच मे दबा लिया, औऱ ध्यान से देखा तो देखते है कि बालखिल्य ऋषियों का समूह सिर के बल लटककर तपस्या कर रहें थे,
      अब गरुण जी दोनों पैरों मे हाथी औऱ कछुवा तथा चोंच मे वटवृक्ष कि शाखा पकडे हुए गंधमादन पर्वत पर गये, ज़ब कश्यप जी ने गरुण को इस हाल मे देखा तो बोले कि " बेटा सूर्य कि किरणों को पीकर तपस्या करने वाले बालखिल्य मुनि हैं ये बहुत अच्छा किया जो इन्हे यहाँ ले आये, अगर ये क्रोधित हो जाते तो तुम्हे भस्म कर देते, तब कश्यप जी ने उन ऋषियों से कहा कि " हे तपोधन गरुण प्रजा के हित के लिए एक महत्त्वपूर्ण कार्य करने जा रहा है, आप लोग इसे आज्ञा औऱ आशीर्वाद दें,ऋषियो ने कश्यप की प्रार्थना स्वीकार कर ली औऱ वटवृक्ष कि शाखा छोड़कर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने चले गये,
     तब गरुण जी ने वह वटवृक्ष वहीँ छोड़ दी औऱ पर्वत की चोटी पर बैठकर हाथी aur कछुए को खाया, औऱ खा पीकर गरुण जी स्वर्ग की ओर उड़े, उस समय देवताओं ने देखा की स्वर्ग मे भयंकर उत्पात मचा हुआ है, यह देखकर देवराज इंद्र गुरु वृहस्पति के पास गये औऱ बोले कि "हे भगवन ये अचानक भयंकर उत्पात क्यों होने लगा, कोई ऐसा शत्रु भी नहीं है, जो मुझे हरा सके, यह सुनकर वृहस्पति जी ने कहा कि "देवराज महात्मा बालखिल्य के तपोबल से विनतानंदन गरुण यहाँ पर अमृत लेने आ रहें है, औऱ उनमे अमृत ले जाने कि क्षमता भी है, इसीलिए ऐसा उत्पात हो रहा है,
      यह सुनकर इंद्र अमृत रक्षको से बोले कि "सावधान पक्षीराज गरुण अमृत लेने आ रहें है, वे बलपूर्वक अमृत ना ले जाने पाएं, यह कहकर देवराज इंद्र सहित समस्त देवता अमृत को घेरकर खड़े हो गये, गरुण ने वहाँ पहुंचकर इतनी धूल उड़ाई कि सभी देवता अंधे से हो गये, तब इंद्र ने वायुदेव कि आज्ञा दी कि इस धूल का पर्दा फाड़ दो यही तुम्हारा कर्तव्य है, वायुदेव ने वैसा ही किया, जिससे चारों तरफ उजाला हो गया, सभी देवता गरुण पर प्रहार करने लगे, लेकिन गरुण ने भी देवताओं के सारे प्रहार निष्फल कर डालें, तब गरुण जी अपने पंखो औऱ चोंच से देवताओं पर प्रहार करना चालू कर दिया, जिससे सभी देवता इधर उधर भागने लगे,
      इसके बाद आगे बढ़ाते गरुण ने देखा की अमृत के चारों ओर आगे धधक रही है, तब गरुण जी ने अपने शरीर मे 8100 मुँह बनाये, औऱ बहुत सी नदियों का पानी पीकर उस धधकती आगे को शान्त किया, औऱ शरीर छोटा करके आगे बढे, अमृत जहां रखा था वहाँ प्रवेश किया, वहाँ पहुँचकर गरुण जी ने देखा की एक लोहे का तीखी धार वाला चक्र वहाँ निरंतर घूम रहा है, जिसमे सहस्त्रों अस्त्र शस्त्र लगे हुए है, लेकिन गरुण जी बड़ी चतुराई से शूक्ष्म रूप धारण करके चक्र के बीच से अंदर चले गये, अब वहाँ पहुँचकर देखते है की अमृत की रक्षा दो भयंकर सर्प कर रहें है, तब चालक गरुण जी ने उन सर्पों की आँखों मे धूल झोंककर कुचलकर मार डाला औऱ पंजे मे अमृत दबाकर आकाश मे उड़ चले,
      लेकिन अमृत पाकर भी गरुण जी ने उसका पान नहीं किया, बस आकाश मे उड़कर सर्पों के पास चल दिए, आकाश मे गरुण को भगवान विष्णु के दर्शन हुए, गरुण के मन मे अमृत पीने का लोभ नहीं है यह जानकर, श्री हरि विष्णु बहुत प्रसन्न हुए, औऱ गरुण जी से बोले की "हे निष्कपट गरुण मैं तुमसे अतिप्रसन्न हूँ अतः तुम मुझसे मनचाहा वरदान मांगो, तब गरुण जी बोले कि " हे प्रभु यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो आप मुझे अपनी ध्वजा मे स्थान दीजिये, और दूसरा मुझे बिना अमृत पिए ही अजर अमर बना दीजिये, " यह सुनकर विष्णु जी ने तथास्तु कहा,
       तभी गरुण ने भगवान विष्णु से कहा कि "हे प्रभु मैं भी आपको इसके बदले कुछ देना चाहता हूँ, अतः आप भी मुझसे कुछ मांग लीजिये, यह सुनकर विष्णु जी मंद मंद मुस्कुराये औऱ बोले कि "ठीक है तुम मेरे वाहन बन जाओ,, गरुण ने भी कहा ऐसा ही होगा, औऱ अनुमति लेकर गरुण जी उड़ चले, उधर तभी देवराज इंद्र कि मूर्छा टूटी औऱ गरुण को अमृत ले जाता देख, गरुण पर बज्र से प्रहार किया, लेकिन बज्र का प्रहार सहकर गरुण जी हसतें हुए बोले कि" इन्द्र जिनकी आस्तियों से यह बज्र बना है उनके सम्मान के लिए अपना एक पंख छोड़े जाता हूं ,तुम उसका भी अंत नहीं के सकोगे ,यह कहकर गरुण ने अपना एक पंख गिरा दिया,
      तब आश्चर्यचकित इन्द्र ने कहा कि "हे पक्षीराज मै जानना चाहता हूं कि तुममें कितना बल है साथ ही तुम्हारी मित्रता भी चाहता हू, तब गरुण जी ने कहा कि "हे देवराज अपने मुंह से अपने बल की प्रशंसा अच्छी बात नहीं है लेकिन अपने मित्रभाव से पूछा है तो मै बताता हूं कि मै समस्त संसार को स्वर्ग लोक ,नर्कलोक , पाताल लोक सहित अपने एक पंख पर उठाकर बिना किसी कठिनाई के उड़ सकता हूं, यह सुनकर इन्द्र बोलें की "हे गरुण आप जिनके लिए यह अमृत लें जा रहे है वे अमृतपान करके समस्त संसार को कष्ट पहुंचाएंगे, जोकि अनुचित होगा क्या आप ऐसा पाप करना चाहेंगे, जिससे समस्त संसार आपको कोसे,
      तब गरुण जी बोले कि " हे मित्र मै अमृत किसी को पिलाना नहीं चाहता लेकिन जो वचन मैंने अपनी माता और सर्पों को दिया है, वह तो निभाना ही है, इसलिए मेरे वहां अमृत रखने के बाद आप उठा लाइएगा, यह सुनकर इन्द्र देव खुश हो गए और गरुण को वरदान मांगने के लिए कहा, तब गरुण ने कहा कि" इस सर्पों के कारण ही मुझे और मेरी मां को कष्ट सहना पड़ा, इसलिए ये सर्प ही मेरे भोजन कि सामग्री हो ऐसा वरदान दीजिए, तथास्तु कहकर देवराज इन्द्र अन्तर्ध्यान हो गए,
    अब गरुण जी अमृत लेकर सर्पों के पास आए और बोले कि "यह को अमृत लेकिन इसे पीने से पहले पवित्र अवश्य हो जाओ, अतः मैं इसे इस कुश पर रख देता हूं और हां तुम्हारे कहे अनुसार मै अमृत ले आया, इसलिए अब मुझे मेरी माता सहित अपनी दासता से मुक्त के दो, सर्पों ने भी यह बात स्वीकार कर ली, और सर्प प्रसन्नता पूर्वक स्नान करने के लिए गए, तब इन्द्र वह अमृत कैलाश उठाकर स्वर्ग लोक चले गए, जब स्नान करके सभी सर्प वापस आए, तो देखा कि अमृत कलश उस स्थान पर नहीं है, उन सर्पों को समझ में आ गया कि विनता को छल से दासी था उसी का फल मिला है,
     थोड़ी देर सोच विचार करने पर सर्पों ने सोचा कि जिस कुश पर यह अमृत कलश रखा था उसमे अमृत का कुछ अंश अवश्य लगा होगा, इसलिए सर्पों ने उस कुश को चाटना प्रारम्भ के दिया, लेकिन ऐसा करते ही सर्पों के जीभ के दो टुकड़े हो गए, और तभी से सर्पों के जीभ के दो टुकड़े होने लगे, और अमृत का स्पर्श होने के कारण कुश को पवित्र माना जाने लगा,
                       
                        अवधी भाषा में कहावत है कि,
       जस करनी तस भोगिहै ताता ।  नरक जात काहे पछताता।।

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी हम कमेंट में जरूर बताए ,अच्छी लगी है तो शेयर करने न भूलें,                "धन्यवाद "

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