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इस योद्धा से हारे थे ब्रम्हा और विष्णु, लिंगपुराण कथा

इस योद्धा से हारे थे ब्रम्हा और विष्णु,  लिंगपुराण की कथा 

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नमस्कार दोस्तों
          आज मैं जिस योद्धा के बारे मे बताने जा रहा हूँ उसकी कथा का वर्णन लिंगपुराण हिंदी pdf के पृष्ठ संख्या 298, से 301, के मध्य किया गया है, इससे सम्बंधित दो कथा जो क्रमशः है .....

प्रथम कथानुसार :-
   

     एक महाबलशाली राक्षस हुआ जिसका नाम था जलंधर, जोकि जलमंडल से उत्पन्न हुआ था, कही कहीं जलंधर को भगवान शिव का अंश भी बताया गया है ( लेकिन लिंगपुराण मे इसका वर्णन नहीं किया गया कि वह शिव अंश था ) जलंधर ने अपनी तपस्या के बल से बहुत सारी शक्तियां अर्जित कर लिए थीं, जिससे कि उसने यक्ष, गन्धर्व, देव, दानव, सभी को पराजित करके अपने अधीन कर लिया, यहाँ तक कि ब्रम्हा को भी जीत लिया और फिर भगवान विष्णु को जितने के लिए जलंधर ने श्री हरि विष्णु से भयंकर युद्ध किया, जोकि हजारों वर्षों तक चलता रहा और अंत मे जलंधर ने श्री हरि विष्णु को भी जीत लिया,

     
       और युद्ध जीतकर भगवान विष्णु से बोला कि " विष्णु अब मैंने तुम्हे भी जीत लिया है अतः अब केवल शंकर ही बाकी है, मैं उन्हें भी जीतकर इस चराचर जगत का स्वामी बन जाऊंगा, और इसके बाद उसने अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए बोला कि " अब केवल महादेव ही बाकी रह गया है मैं उसे भी जीतकर रुद्रपने, ब्रम्हपने, विष्णुपने तथा इंद्रपने को आपको समर्पित करूँगा,  जलंधर के ऐसे वाक्य सुनकर सभी दैत्य हुंकार भरने लगे जिससे लीणो लोक कांप उठे, और जलंधर अपने सभी दैत्यों और हाथी घोड़ो और रथों आदि को लेकर महादेव के पास गया, वहीँ भगवान शिव ने जलंधर को अवध्य सुन रखा था,

       और ब्रम्हा के वचनो कि रक्षा करते हुए भोलेनाथ, पार्वती और नंदी आदि गणों से हॅसते हुए कहने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिए, तथा फिर जलंधर से बोले कि " हे दैत्यराज अगर तुम मुझसे युद्ध के इच्छुक हो तो मेरे बाण तुम्हारे सिर को तुम्हारे धड़ से अलग कर देंगे जिससे तुम निश्चित ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे, भगवान सही के इस प्रकार वचन सुनकर जलंधर बोला कि " हे वृषभध्वज ऐसे वचनो का क्या लाभ अतः इस प्रकार के वचनों को छोड़कर आप मुझसे युद्ध करो, यह सुनकर भगवान रूद्र ने अपने पैर के अंगूठे से चारों तरफ जल ही जल कर दिया और हसते हुए बोले कि " मेरे पैरों के द्वारा बनाये गये इस महासमुद्र से तु बाहर आ जाता है तब तु मेरे साथ युद्ध करने लायक है अन्यथा नहीं,

  तब हँसता हुआ जलंधर बोला कि " हे शंकर तुझे गदा के द्वारा और देवताओं सहित इंद्र को मारकर मैं चराचर का हवन कर सकता हूँ, जिस प्रकार सर्प के बच्चे को गरुण मार सकता है, हे शंकर ऐसा कौन है जो मेरे वाणों से वींधा न गया हो, मैंने बालपन मे तपस्या से ब्रम्हा को जीत लिया, जवानी मे देवता और ऋषि मुनियो को, तपस्या के बल पर मैं तीनों लोकों को क्षण भर मे दग्ध कर दिया, हे रूद्र विष्णु को मैंने जीत लिया, इंद्र, कुबेर, वरुण, अग्नि, आदि देवता मेरी गन्ध भी नहीं सह सकते, ब्रम्हा का मुख भी उल्टा कर दिया, उर्वशी आदि अप्सराओं को मैंने बंदी बना रखा है, जैसे तैसे इंद्र ने प्रार्थना करके और शरण मे आकर एक शची को मुझसे प्राप्त किया, सो हे रूद्र तु मुझे नहीं जानता,

    इस प्रकार के अहंकारी वचन सुनकर महादेव ने नेत्र की अग्नि द्वारा जलंधर का रथ भस्म कर दिया, और दृष्टि मात्र से अन्य राक्षसों के हाथी घोड़े, रथ आदि भस्म कर डालें, ज़ब जलंधर ने यह सब देखा तो क्रोध से भर गया और महादेव को मारने के लिए सुदर्शन चक्र उठाने के लिए अपने अपने हाथों को कंधे के पास ले गया वैसे ही जलंधर सिर से लेकर पैर तक दो भागों मे कटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, जैसे बज्र से कटा हुआ पर्वत गिर गया हो, और रूद्र के नियोग से उसका मांस भी रक्त हो गया, वहीँ रक्त रौरव नर्क को प्राप्त हो रक्त का कुंड बन गया, जलंधर को मरा देख समस्त देवता हर्ष से गर्जना करने लगे तथा पुष्प की वर्षा करने लगे,

द्वितीय कथानुसार...
     
       भगवान विष्णु और जलंधर का युद्ध हुआ ही नहीं, ज़ब जलंधर ने समस्त देवताओं को जीत लिया तो वह भगवान शिव से युद्ध करने के लिए पंहुचा, और जलंधर तथा भगवान शिव के मध्य एक भयंकर युद्ध शुरू हो गया जो कई हजारों वर्षों तक चला, लेकिन ज़ब भगवान शिव जलंधर को मारने मे असमर्थ रहें, जिस कारण युद्ध ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था, तब भगवान विष्णु ने ध्यान लगाया तो जाना कि जलंधर कि शक्ति का श्रोत जलंधर कि पतिब्रता पत्नी तुलसी है ज़ब तक उसका सतीत्व भंग नहीं होगा तब तक जलंधर को नहीं मारा जा सकता, तब भगवान विष्णु ने जलंधर का वेष धारण करके तुलसी का सतीत्व भंग किया, और तुलसी का सतीत्व भंग होते ही, जलंधर शक्तिहीन हो गया, जिस कारण भगवान शिव ने जलंधर को अपने त्रिशूल से मार डाला,

      लिंग पुराण मे यह भी बताया गया है कि जो भी जलंधर कि कथा कहता सुनता या सुनाता है, वह शिवजी को गणपत्य रूप को प्राप्त होता है, तो दोस्तों इस कथा को शेयर अवश्य करें,
   
       और जाते जाते कमेंट मे ओम नमः शिवाय अवश्य लिखें,   धन्यवाद

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