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पति को निवस्त्र नहीं देखना चाहती थीं यह स्त्री

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नमस्कार दोस्तों
                     यह कथा एक ऐसी अप्सरा की है जो अपने पति को निर्वस्त्र देखकर उसे छोड़कर चली गई थी । जिसका वर्णन विष्णु पुराण में वर्णित हैं। कथानुसार.....

        प्राचीन काल में प्रसिद्ध राजा हुए महाराज पुरुरवा जिनके पिता का नाम बुद्घ और माता का नाम इला था । एक बार स्वर्गलोक में पुरुरवा की महानता का बखान हो रहा था । राजा पुरुरवा की महानता का बखान अप्सरा उर्वशी बड़े ध्यान से सुन रही थी जोकि मित्रा वरुण को अच्छा न लगा । क्योंकि राजा पुरुरवा एक मनुष्य मात्र थे । इसलिए मित्रा वरुण ने उर्वशी को मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाने का श्राप दे दिया ।
   
       अब श्राप का विचार करते हुए उर्वशी ब्रम्हांड में विचरण कर रही थी। तभी उर्वशी की नजर सत्यवादी राजा पुरुरवा पर पड़ी और उर्वशी राजा पुरुरवा को देखकर मोहित हो गई । और राजा पुरुरवा के पास आयी । जब राजा ने अप्सरा उर्वशी को देखा तो राजा भी उर्वशी के प्रति वशीभूत हो गया । तभी निसंकोच होकर राजा पुरुरवा ने कहा कि" हे सुंदरी मै तुम्हे पाने की इच्छा करता हू अतः मुझे प्रेम दान प्रदान करें, राजा के इस प्रकार कहने पर उर्वशी ने लज्जा पूर्वक स्वर में कहा कि" यदि आप मेरी प्रतिज्ञा को निभा सकते है तभी यह संभव है हो सकता है अन्यथा नहीं ।
   
        तब राजा ने उर्वशी की प्रतिज्ञा पूछी, और प्रतिज्ञा पूछे जाने पर उर्शवी ने कहा कि "मेरे पुत्र रूप इं दोनों मेषों (भेड़) को मेरी शैय्या से दूर नहीं करोगे, मै आपको कभी निर्वस्त्र न देखने पाऊं, और घृत (घी) ही मेरा आहार होगा, यदि मेरी यह तीन प्रतिज्ञा मंजूर हो तो मै आपके साथ रह सकती हूं । तब राजा पुरुरवा राजी हो गए, और उर्वशी के साथ भोग विलास में लिप्त हो गए, कई वर्षों तक दोनों ने एक दूसरे के साथ भोग विलास किया, और इधर 60000 वर्ष बीत जाने के पश्चात बिना उर्वशी स्वर्गलोक सूना रहने लगा ।
   
     अतः उर्वशी और पुरुरवा की प्रतिज्ञा जानने वाले विश्वाशू ने रात्रि के समय गंधर्वो को साथ लेकर उनके शयन कक्ष में गए और एक भेड़ का हैरान के लिया। लेकिन भेड़ को के जाते समय उस भेड़ की आवाज सुन ली और कहने लगी कि " मुझ अनाथा के पुत्र को कौन लिए का रहा है कोई बचाओ उसे, राजा पुरुरवा यह सब सुन रहे थे लेकिन निर्वस्त्र होने की वजह से कुछ न कर सके, तब गंधर्व दूसरा भेड़ भी ले जाने लगे। दूसरे भेड़ को भी ले जाते देख उर्वशी कहने लगी कि" मै किस कायर के अधीन हो गई हूं, इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद भी यह कायर लेता हुए है कुछ करता भी नहीं है, हाय अब मै क्या करूं,
 
   
      यह सुनकर राजा ने सोच की अभी तो अंधकार है उर्वशी मुझे निर्वस्त्र नहीं देख सकती इसलिए दहाड़ता हुए क्रोध पूर्वक बोला कि अरे दुष्ट आज तेरा अंत निश्चित है और तलवार लेकर जैसे ही दौड़ा, गंधर्वो ने तेज प्रकाशमान बिजली उत्पन्न कर दी, जिससे राजा को वस्त्रहीन देखकर उर्वशी की प्रतिज्ञा टूट गई, और तुरंत ही उर्वशी देवलोक वापस चली गई, तब गंधर्व भी उन भेड़ों को छोड़कर स्वर्गलोक चले गए। जब राजा भेड़ों को लेकर प्रसन्नचित मन से शयनकक्ष में लौटा तो उर्वशी को न पाकर वह वस्त्रहीन अवस्था में ही इधर उधर घूमने लगा।
     
       घूमते घूमते एक दिन उसने कुरुक्षेत्र के कमल सरोवर में उर्वशी को चार अन्य अप्सराओं के साथ देखा तो बोला "कि अरे कठोर हृदय वाली स्त्री ठहर जा कुछ बात करनी है, ऐसा सुनकर उर्वशी बोली "कि महाराज अज्ञानियो की तरह चेष्टा करने का कोई लाभ नहीं है, मै अभी गर्भवती हूं, अतः एक वर्ष पश्चात यही आइएगा और अपना पुत्र लेकर मेरे साथ एक रात बिताइएगा, मै पूरी रात आपके साथ गुजारूंगी, अतः आप अपने राज्य को वापस जाए, उर्वशी के ऐसा कहने पर राजा अपने राज्य वापस लौट आए,
   
        और एक वर्ष पूरा होने पर पुनः उसी स्थान पर गए जहां उर्वशी ने मिलने के लिए कहा था। तब उर्वशी ने आयु नमक पुत्र राजा को दिया और एक रात रुककर पांच पुत्र उत्पन्न करने के लिए गर्भ धारण किया। और खा कि हमारे पारस्परिक प्रेम के कारण सभी गंधर्व आपको वरदान देना चाहते है।अतः आप अभीष्ट वर मांग लीजिए, तब राजा ने कहा कि मेरे पास सबकुछ संपन्न है अतः उर्वशी के अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए मै उर्वशी के साथ काल यापन करना चाहता हूं,
     
       तब गंधर्वो ने एक यज्ञस्थली पत्र दिया और बोले कि इस अग्नि को वैदिक विधि से गाहर्पत्य, आवाहनीय औऱ दक्षिणाग्नि रूप तीन भाग करके इसमें उर्वशी से सहवास की कमान से भलीभांति यजन करो तो तो अवश्य ही अपना अभीष्ट प्राप्त करोगे, यह कहकर गन्धर्व वहां से चले गये, और राजा भी अग्निस्थली को लेकर अपने नगर को चल पड़ा, मार्ग मे उसने सोचा की मैं कैसा मुर्ख हूँ, अग्निपात्र तो ले आया लेकिन उर्वशी को वहीँ छोड़ आया, ऐसा सोचकर अग्निस्थली को जंगल मे छोड़कर अपने नगर वापस लौट आया,

        लेकिन आधी रात को नींद टूटने पर राजा ने सोचा की उर्वशी को प्राप्त करने के लिए ही तो गन्धर्वो ने अग्निस्थली मुझे दी थी।  मैंने उसे उस जंगल में छोड़ दिया । ऐसा सोचकर अग्निस्थलि को लेने दोबारा वहां गए लेकिन अग्निस्थाली के स्थान पर शमीगर्भ पीपल के वृक्ष को देखकर सोचा कि मैंने यहीं पर वह अग्निस्थली छोडी थीं, वह स्थली ही शमीगर्भ पीपल हो गई है, अतः उस अग्निरूपी अश्वथ (पीपल) को ही अपने नगर ले जाकर, अरणी बनाकर उससे उत्पन्न अग्नि की ही उपासना करूँगा, ऐसा सोचकर राजा उस अश्वत्थ को ही अपने नगर ले आये
 
       औऱ उसकी अरणी बनायीं, तदन्तर उन्होंने एक काष्ठ को एक एक अंगुल करके गायत्रीमंत्र का पाठ किया, उनके पाठ से गायत्री मंत्र के अक्षर संख्या के बराबर एक एक अंगुल की अरणियां अपने आप हो गई, उनके मंथन से तीनों प्रकार की अग्नियों को उत्पन्न कर उनमे वैदिक विधि से हवन किया तथा उर्वशी को सहवास रूप फ़ल की इच्छा की, तथा उसी अग्नि से नाना प्रकार के यज्ञों का यजन करते हुए, गन्धर्व लोक प्राप्त किया, औऱ फिर उर्वशी से उनका वियोग कभी नहीं हुआ, उससे पहले एक ही अग्नि थीं, उस एक ही अग्नि से इस मन्वन्तर मे तीन प्रकार की अग्नियों का प्रचार हुआ,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगीं हमें कमेंट मे जरूर बताएं,  धन्यवाद

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