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वशिष्ठ जी ने नरमांस भोजन क्यों माँगा

                              ऋषि वशिष्ठ की कथा 

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नमस्कार दोस्तों

                   वशिष्ठ जी ने क्यों माँगा नरमांस भोजन,  इस कथा का वर्णन विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश के अध्याय नंबर 4 मे किया गया है, जो आप खुद पढ़ सकते है,

 कथानुसार :-

           प्रभु श्री राम के पूर्वजों मे से एक थे सौदास मित्रसह, एक दिन वह मृग (हिरन) का शिकार करने निकले, और घुमते घुमते उन्हें दो बाघ दिखाई दिए, तब राजा ने उन बाघों मे से एक बाघ को अपने वाणों से मार डाला, लेकिन वास्तव मे वे बाघ के भेष मे दो राक्षस थे, एक बाघ को तो राजा मित्रसह ने मार डाला लेकिन दूसरा बाघ यह कहता हुआ भगा की वह इसका बदला लेगा और अदृश्य हो गया, उसके कुछ समय बाद राजा ने एक यज्ञ का आयोजन किया, और यज्ञ समाप्त होने बाद जब ब्रम्हर्षि वशिष्ठ जी बाहर गये, तब वह राक्षस वशिष्ठ जी का रूप धारण करके राजा के पास आया और बोला कि  " हे राजन यज्ञ समाप्त हो चुका है अतः आपको मुझे नरमांस भोजन कराना चाहिए अतः तुम अब नरमांस भोजन कि व्यवस्था करो मैं अभी आता हूँ,


       ऐसा कहकर वह बाहर चला गया और रसोईएं का भेष बनाकर, राजा कि आज्ञा से उसने मनुष्य का मांस पकाकर राजा के सामने पेश किया और राजा भी उसे स्वर्णपात्र मे रखकर वशिष्ठ जी कि प्रतीक्षा करने लगे, और वशिष्ठ जी के आते ही वह नरमांस उनके सामने परोस दिया, और निवेदन किया कि इसे ग्रहण करें, अब वशिष्ठ जी ने सोचा कि इस राजा कि कुटिलता तो देखो यह मुझे जानबूझकर मांस खाने के लिए दें रहा है, अतः उन्होंने जानने कि इच्छा से कि यह किसका मांस है ज़ब ध्यान लगाकर देखा कि यह तो मनुष्य का मांस है, तब वशिष्ठ जी का क्रोध अपने चरम सीमा पर पहुँच गया और क्रोधित वशिष्ठ जी ने राजा को श्राप दें दिया कि " जैसे तूने मुझे आज नरमांस खाने को दिया है वैसे ही तु भी नरभक्षी हो जायेगा,

        अब राजा के पसीने छूटने लगे और कांपते हुए बोले कि " हे ब्राम्हण आपने ही तो ऐसी आज्ञा दी थीं, तब वशिष्ठ जी ने कहा कि क्या मैंने ऐसा कहा था और ध्यान के द्वारा यथार्थ बात जानकर राजा से दयाभाव से बोले कि "हे राजन तु अधिक दिनों तक नरमांस भोजन नहीं करेगा, केवल 12 वर्षों वर्षों तक तुझे ऐसा करना होगा, वशिष्ठ जी के ऐसा कहने पर राजा सौदास ने भी अपनी अंजुली मे जल लेकर मुनीश्वर को श्राप देने के उद्देश्य से जैसे ही आगे बढे वैसे ही राजा सौदास कि पत्नी मदयन्ति ने उन्हें रोक दिया और कहने लगीं कि " स्वामी ये हमारे कुलगुरु है, और कुलदेवरूप को श्राप देना उचित नहीं है, यह सुनकर सौदास शान्त हो गये और अन्न मेष कि रक्षा के कारण वह जल पृथ्वी आकाश मे नहीं फेंका बल्कि उससे अपने पैरों को भिगा लिया, लेकिन उसके क्रोधयुक्त श्राप जल से राजा सौदास का पैर जलकर चितकवरा हो गया, और तभी उनका नाम कल्माषपाद हुआ,

     वह राक्षस स्वभाव धारण करके वन (जंगल) मे घूमने हुए मनुष्यों को खाने लगे, एक दिन एक मुनि ऋतुकाल के समय अपनी पत्नी के साथ सम्भोग कर रहें थे तभी वह राजा भयंकर राक्षस रूप धारण मे पंहुचा जिससे भयभीत होकर दोनों दम्पति भागने लगे, लेकिन  तभी राक्षस ने ब्राम्हण को पकड़ लिया, तब ब्रम्हाणी ने अनेक प्रकार से प्रार्थना की और कहा कि " हे राजन आप राक्षस नहीं है अपितु आप इक्ष्वाकु कुलतिलक राजा सौदास मित्रसह है, आप स्त्री संयोग के सुख को जानने वाले है, मैं अभी अतृप्त हूँ, अतः मेरे पति को मारना आपको उचित नहीं है, ऐसा कहकर वह रोने लगीं, लेकिन उसके राक्षस रूपी राजा ने ब्राम्हण का भक्षण इस प्रकार किया जैसे कोई बाघ पशु को पकड़ कर खा जाता है,

         तब क्रोधित ब्रम्हाणी ने राजा को श्राप दिया कि " जैसे तूने मेरे अतृप्त रहते मेरे पति को कहा लिया, उसी प्रकार ज़ब तु भी सम्भोग मे लिप्त होगा तो तेरा भी अंत हो जायेगा, ऐसा कहकर वह ब्रम्हाणी अग्नि मे प्रवेश कर गई, अतः 12 वर्ष के पश्चात् वह राजा उसके राक्षस रूप से मुक्त हो गया, और मनुष्य बनकर फिर से उसने अपना राज्यभर संभाला, एक दिन राजा कामवासना कि इच्छा से रानी मदयन्ति के पास सम्भोग करने के लिए गये, लेकिन मदयन्ति ने राजा को ब्रम्हाणी के श्राप का स्मरण करा दिया, तभी से राजा ने स्त्री सम्भोग का त्याग कर दिया,

        लेकिन राजा को कोई सन्तान ना थीं, इसलिए राजा के अनुरोध करने पर ऋषि वशिष्ठ जी ने मदयन्ति का गर्भाधान किया, लेकिन ज़ब उस गर्भ को सात वर्ष बीत जाने पर भी जन्म न लिया तो मदयन्ति ने अपने पेट पर पत्थर से प्रहार किया, जिससे उसी समय मदयन्ति को पुत्र कि प्राप्ति हुई, जिसका नाम अस्मक हुआ, अस्मक का एक पुत्र था जिसका नाम मूलक था, परशुराम द्वारा ज़ब पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया जा रहा था, तब उस मूलक कि रक्षा वस्त्रविहीन स्त्रियों ने घेरकर कि थीं, इस कारण उसे नारीकवच भी कहते है,                
                   
                                         दोस्तों आपको कथा कैसी लगीं जरूर बताएं
                                 साथ ही कमेंट मे जय परशुराम अवश्य लिखें - धन्यवाद

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