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गुरु द्रोणाचार्य बिना माता के जन्मे थे,


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नमस्कार दोस्तों

               पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ था, और कैसे जन्मे थे बिना माता के, इसका सम्पूर्ण वर्णन महाभारत के आदिपर्व मे किया गया है,


कथानुसार :-
           महार्षि भारद्वाज नामक एक तेजस्वी ऋषि हुए, जोकि गंगाद्वार नामक स्थान पर निवास करते थे, वें बड़े ही शांतिप्रिय, व्रतशील, तेजस्वी और तपस्वी थे, ऋषि भारद्वाज अपने आश्रम मे बहुत सारे शिष्यों और मित्रों के साथ रहा करते थे, एक बार वें यज्ञ कर रहे थे, और यज्ञ के समाप्त होने पर वें उस दिन सबसे पहले स्नान करने चले गए,

           ज़ब वें गंगा के तट पर पहुचे तो वहाँ पहुंचकर उन्होंने देखा कि घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही थी, अप्सरा घृताची को उस अवस्था मे देखकर महर्षि भारद्वाज के मन मे कामवासना जग उठी, जिससे उसी समय वे स्खलित हो गए, अर्थात उनका वीर्य निकल गया, लेकिन ज़ब वें स्खलित होने वाले थे, तभी उन्होंने उस वीर्य को द्रोण (दोना) नामक यज्ञपात्र मे रख लिया, जिससे उसी समय द्रोण का जन्म हुआ, जोकि बिना माता के जन्मे थे, समय के साथ द्रोण बड़े हुए, और वेद वेदांगो का स्वाध्याय किया,

       महार्षि भारद्वाज ने पहले ही अग्नेययास्त्र कि शिक्षा अंगिवेश को दे दी थी, अपने गुरु भारद्वाज के कहने पर अग्निवेश ने द्रोण को आग्नेयअस्त्र कि शिक्षा दी, द्रोण का विवाह शारद्वान कि पुत्री कृपी के साथ हुआ था, और कृपी के गर्भ से ही अश्वत्थामा का जन्म हुआ था, अश्वत्थामा ने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा घोड़े के सामान शब्द किया था, इसलिए उसका नाम अश्वत्थामा पड़ा, द्रोण ने परशुराम से प्रयोग, रहस्य और उपसंहार के साथ सभी अस्त्र शस्त्र मांग लिए थे और परशुराम ने ही द्रोण को इन अस्त्र शस्त्र कि शिक्षा प्रदान कि थी, इन सब मे निपुड़ होने के बाद ही वे पांडवों के गुरु बने थे, और द्रोणाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए,
   
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