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कर्ण का जन्म कैसे हुआ, महाभारत कथा


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नमस्कार दोस्तों

            महाभारत के महान धनुर्धर कर्ण का जन्म कैसे हुआ, इससे सम्बंधित कथा का वर्णन महाभारत के आदि पर्व मे किया गया है, कर्ण क्षत्रिय होते हुए भी शूद्र क्यों कहलाया आइये जानते है इस कथा को विस्तार से......


कथानुसार :-
           सूरसेन नामक एक राजा हुए जिनकी एक रूपवती पुत्री थी जिसका नाम था पृथा, सूरसेन ने अग्निदेव को साक्षी मानकर प्रतिज्ञा की थी कि उसकी जो भी प्रथम सन्तान होंगी, वह उसे अपनी बुआ के संतानहीन पुत्र कुन्तिभोज को दे देंगे, इसके बाद ही सूरसेन को एक कन्या उत्पन्न हुयी जिसका नाम पृथा रखा, और प्रतिज्ञानुसार राजा सूरसेन ने उस कन्या को अपनी बुआ के पुत्र कुन्तिभोज को दे दी, तो उसी कन्या का नाम पृथा से कुंती हो गया, अब कुंती अपने पिता कुन्तिभोज के पास रहने लगी, और समय के साथ बढ़ने लगी, वह कन्या अतिथियों का बड़ा सम्मान करती करती थी,

       एक बार ऋषि दुर्वासा कुन्तिभोज के यहाँ आये, तब कुंती ने ऋषि दुर्वासा की निस्वार्थ भाव से सेवा खूब की, जिससे ऋषि दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए, और प्रसन्न होकर उन्होंने कुंती को एक मंत्र दिया, और बोले कि " है कल्याणी मै तुम पर बहुत हूँ अतः इस मंत्र से तुम जिस देवता का आह्वाहन करोगी, उसकी कृपा प्रसाद से तुम एक पुत्र प्राप्त करोगी, मुनि दुर्वासा कि बात सुनकर कुंती को बड़ा आश्चर्य हुआ, तो कुंती ने सोचा कि क्या ऐसा संभव है क्यों न इसका प्रयोग किया जाय कि यह सत्य है या नहीं,

       इसलिए उसने एकांत मे जाकर सूर्यदेव का आह्वाहन किया, फलस्वरूप सूर्यदेव ने आकर कुंती को गर्भ धारण करा दिया, जिससे उन्ही के सामान तेजस्वी कवच और कुण्डल धारण किये, एक बालक उत्पन्न हुआ, लेकिन लोकलज्जा के भय से कुंती ने उसे नदी मे प्रवाहित कर दिया, उस नदी मे बहते हुए बालक को अधीरथ नामक शूद्र ने निकाला, और अपनी पत्नी राधा के पास ले आया, तब दोनों दम्पतियों ने उसे अपना बालक मानकर उसका लालन पोषण करने लगे, तथा उसका नाम वसुषेण रखा, जोकि आगे चलकर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ,

         कर्ण अस्त्र शस्त्र का ज्ञाता और महान धनुर्धर था, उसने अस्त्र सस्त्र की विद्या परशुराम जी से सीखी थी, यह झूठ बोलकर की वह शूद्र नहीं सवर्ण है, क्योंकी उस समय शुद्रो को किसी भी प्रकार की शिक्षा नहीं दी जाती थी, कर्ण की वीरता, दानवीरता, उदारता को जानकर दुर्योधन ने उसे अपना परम मित्र बनाया, और अपने राज्य का एक हिस्सा देकर राजा भी बनाया, द्रोपती कर्ण की वीरता और प्रसिद्धि के कारण मन ही मन उसे प्रेम करती थी, लेकिन विवाह के दौरान स्वयंबर मे शूद्रपुत्र जानकर उसने भारी सभा मे कर्ण को अपमानित किया, कर्ण को शूद्रपुत्र होने के कारण कई बार अपमान सहना पड़ा, हालांकि वह कुंती और सूर्यदेव का पुत्र था

      लेकिन यह बात कुंती ने कभी नहीं स्वीकारी, आज भी कहा जाता है की दोस्ती हो तो कर्ण और दुर्योधन जैसी,

    तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी कमेंट मे जरूर बताएं,  धन्यवाद

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