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तीन आंख और चार हाथ वाला महाभारत योद्धा

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नमस्कार दोस्तों
              तीन आंख और चार हाथ के साथ पैदा हुआ था यह मानव जोकि श्री कृष्ण, दुर्योधन, युधिष्ठिर और कर्ण का समकालीन था, जिसके जन्म और मृत्यु की कथा बहुत रोचक है जिसका वर्णन महाभारत मे किया गया है, जोकि कुछ इस प्रकार है,

कथानुसार :-
           महाभारत मे एक अनोखे मानव का जन्म होता है, जो तीन आंख और चार हाथ के साथ पैदा हुआ था, जोकि राक्षसराज हिरण्यकशिपु का अवतार था, और उसका नाम हुआ शिशुपाल वह श्री कृष्ण की बुआ का लड़का और चेदिराज का पुत्र था, चेदिराज का पुत्र था, ज़ब शिशुपाल चेदिवंश मे पैदा हुआ तो उसके चार भुजाएँ और तीन नेत्र थे, और पैदा होते ही वह गधों के जैसे रेंकने लगा अर्थात चिल्लाने लगा, उस बालक की ऐसी दशा देखकर सारे सगे सम्बन्धी डर गए, और उसका त्याग करने के लिए विचार करने लगे,

        लेकिन तभी एक आकाशवाणी हुयी की " राजन तुम्हारा यह पुत्र बड़ा विद्वान् और बलि होगा, निश्चिन्त होकर इसका पालन करो, यह आकाशवाणी सुनकर शिशुपाल की माता बोली की " जिसने भी यह भविष्यवाणी की है वह चाहे जो कोई भी हो मैं उसे हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ, सिर्फ इतना और जानना चाहती हूँ कि मेरे पुत्र कि मृत्यु किसके हाथों होंगी, तब उस आकाशवाणी ने दोबरा कहा कि " जिसकी गोद मे जाने से तुम्हारे पुत्र कि अतरिक्त दोनों भुजाएं और तीसरा नेत्र लुप्त (गायब) हो जायेगा, निश्चित ही तुम्हारा पुत्र उसी के हाथो से मृत्यु को प्राप्त करेगा,

           उस समय उस नवजात शिशु को देखने पृथ्वी के तमाम राजा आये और चेदिराज ने उस बालक को सभी कि गोद रखा लेकिन उसका हाथ और नेत्र लुप्त नहीं हुआ, एक दिन बलराम सहित श्री कृष्ण भी उस अनोखे बालक को देखने के लिए अपनी बुआ के पास आये, और जैसे ही उस बालक को श्री कृष्ण ने अपनी गोद मे लिया, उसका तीसरा नेत्र और अतिरिक्त दोनों भुजाएं गायब हो गयी, यह देखकर शिशुपाल कि माता भयभीत हो गयी और उस भविष्यवाणी के बारे मे श्री कृष्ण को बताया, तब श्री कृष्ण ने कहा कि " बुआ जी आप शोक मत करिये, मैं तुम्हारे पुत्र के ऐसे सौ अपराध क्षमा कर दूंगा जिसके बदले मुझे इसको मार देना चाहिए, यह कहकर श्री कृष्ण वहाँ से चले आये,

       कुछ समय बीता वह नवजात शिशु वयस्क हुआ, उसके थोड़े समय बाद ही पाण्डव ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, और ज़ब यज्ञ का समापन हुआ, तो पृथ्वी पर उपस्थित सर्वश्रेष्ठ मनुष्य कि अग्रपूजा पर विचार विमर्श होने लगा, कि सर्वप्रथम किसका पूजन किया जाय, कौन है इस पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ, तब पितामह भीष्म ने श्री कृष्ण का नाम सुझाया, तब सर्वसम्मति से श्री कृष्ण कि अग्रपूजा विधिपूर्वक सहदेव द्वारा कि जाने लगी, लेकिन तभी शिशुपाल ने अग्रपूजा रुकावाते हुए बोला कि पितामह बड़े बड़े महात्माओं और राजर्षियों के होते हुए श्री कृष्ण का पूजन कैसे कर सकते है, क्योंकि श्री कृष्ण न तो आयु मे बड़े है न ही राजा है,

        यदि आप लोग कृष्ण को आचार्य मानते है तो द्रोणाचार्य का क्या काम, ऋत्विज और वयोवृद्ध भगवन श्री कृष्णद्वैपायन कि ही पूजा होनी चाहिए थी, वही इच्छा मृत्यु पुरुषश्रेष्ठ भीष्म पितामह के रहते तुमने कृष्ण का पूजन कैसे किया, शास्त्र पारदर्शी वीर अश्वत्थामा के सामने श्री कृष्ण की पूजा भला किस दृष्टि से उचित है, राजाधिराज दुर्योधन, भरतवंश के आचार्य महात्मा कृप, किम्पुरुष के आचार्य द्रुम, तथा पाण्डु के सामान सर्वगुण संपन्न भीष्म को छोड़कर उनकी उपस्थिति मे तुमने कृष्ण पूजन का अनर्थ कैसे किया, यह तो सभी श्रेष्ठ पुरुषों और राजाओं का अपमान है, तुमने इस गुणहीन कृष्ण की पूजा करके हमारा अपमान किया है,

        श्री कृष्ण की तरफ इशारा करके शिशुपाल ने कहा की " तुम किस पूजा के अधिकारी हो, अयोग्य होते हुए तुमने पूजा कैसे स्वीकार की, जैसे कुत्ता छिपकर घी चाटकर अपने आपको धन्य मानने लगता, वैसे ही तुम अयोग्य होकर पूजा स्वीकार करके अपने आप को बड़ा मान रहे हो, तब युधिष्ठिर ने शिशुपाल को समझाने की कोशिश की लेकिन निरर्थक रहे, तब भीष्म ने शिशुपाल से कहा की वत्स यहाँ उपस्थित किस राजा को श्री कृष्ण ने परास्त नहीं किया है, किसी एक का नाम बताओं,  यह केवल हमारे पूज्य नहीं है सारा जगत ही इनकी पूजा करता है,

      भगवन श्री कृष्ण ही समस्त जगत के पालन कर्ता, उपत्तिकर्ता, और संघारक है, यही समस्त देवताओं, गन्धर्वो तथा मनुष्यों मे सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन शिशुपाल ने किसी की एक न सुनी और लगातार वह श्री कृष्ण का मान मर्दन करता रहा, और जैसे ही और जैसे ही शिशुपाल की सौ गलतियां पूरी हुई, श्री कृष्ण ऊंचे स्वर मे बोले कि " है नरपतियों अब तक मैंने इसे क्षमा किया क्योंकि मैंने इसकी माता को वचन दिया था कि मैं इसकी ऐसी सौ गलतियां माफ करूँगा जो मारने योग्य है, अतः मेरे वचन के अनुसार इसकि गलतियों कि संख्या पूरी हुयी, इसलिए अब मैं निश्चित ही इसका वध करूँगा, ऐसा कहकर श्री कृष्ण ने अपने चक्र से शिशुपाल का सिर धड़ से अलग कर दिया, तभी शिशुपाल के मृत शरीर से एक ज्योति निकली और देखते देखते वह श्री कृष्ण मे समा गयी, क्योंकि शिशुपाल के रूप मे राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने ही पृथ्वी पर अवतार लिया था, और श्री कृष्ण के हाथों मरकर वह वैकुण्ठधाम को प्राप्त हुआ,

             आपको यह कथा कैसी लगी कमेंट मे जरूर बताएं,
                  और साथ ही जय श्री कृष्ण लिखना न भूलें,
                                             धन्यवाद
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