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पति को वश में कैसे करें,

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नमस्कार दोस्तों
                पति को वश में कैसे करें, इससे संबंधित एक संवाद महाभारत के वनपर्व में उल्लेखित है जो कुछ इस प्रकार है,

         एक बार द्रोपती और सत्यभामा आपस में बैठकर कुछ बात चीत कर रहीं होतीं हैं, कि तभी सत्यभामा ने द्रोपती से पूंछा की " बहन तुम्हारे पांचों पांडव शूरवीर है अतः तुम उन्हें किस मंत्र, तप या विद्या द्वारा अपने वश में रखती हो, कि वें सदा तुम्हारा ही मुंह ताकते रहते हैं, मुझे भी वह उपाय बताओ ताकि मै भी अपने मधुसूदन को अपने वश में रख सकूं,

        यह सुनकर पहले तो द्रोपती मंद मंद मुस्कुराईं फिर बोली कि " है सत्ये यह तुम कैसी दुराचारिणी की बात मुझसे पूंछ रही हो, भला बुरे आचरण वाली स्त्रियों की बातें मैं कैसे कह सकती हूँ, इस विषय मे तुम्हारा शंका करना भी उचित नही है, क्योकि तुम खुद मधुसूदन की पत्नी हो, अतः तंत्र मंत्र द्वारा कोई भी पति अपनी पत्नी के वश में नही हो सकता, अतः हे सत्यभामा मैं पांडवों के प्रति जिस प्रकार का व्यवहार करती हूँ वह सुनो, मैं अहंकार, काम - क्रोध त्यागकर पांडवों सहित उनकी तमाम स्त्रियों की सेवा करती हूँ, यह करते हुए मैं अभिमान को अपने आस पास भी नही आने देती,

       मैं कटु भाषण से दूर रहती हूँ, कभी घर के दरवाजे पर खड़ी नही होती, बुरी बातों पर ध्यान नहीं देती, बुरी जगह पर बैठती नही हूँ, न ही बुरी आचरण वालों की संगत करती हूँ, देवता, गन्धर्व, मनुष्य, धनी, रूपवान कैसा भी व्यक्ति हो, मेरा मन केवल पांडवों में ही लगा रहता है, बिना पति को खिलाएं मैं भोजन नही ग्रहण करती हूँ, बिना पांडवों के बैठे मैं नही बैठती, जब जब मेरे पति घर मे आते है, आसान और जल देकर उनका सत्कार करती हूँ, घर तथा बर्तनों की सफाई का खास ध्यान रखती हूं, समय पर भोजन कराती हूँ, और गुप्त रूप से घर मे अनाज का संग्रह रखती हूं,

    मैं बात चीत से किसी का तिरस्कार नही करती, सदा ही पतियों के अनुकूल रहकर आलस से दूर रहती हूँ, जब किसी कार्यवश पति घर से बाहर जाते है, तो मैं नियम और व्रतों का पालन करती हूँ, मेरे पति जिस चीज को नही खाते पीते मैं भी उससे दूर रहती हूँ, शास्त्र में जो बातें स्त्रियों के लिए बताई गई हैं, मैं उन सबका पालन करती हूँ, शरीर को यथाप्राप्त वस्त्र और आभूषणों से सुस्सजित रखती हूं, तथा सावधान रहकर पतियों की सेवा करती हूँ,

      और मेरी सास ने जो भी बातें और धर्म मुझे बताएं है, उन सबका मैं पालन करती हूँ, भिक्षा देना, पूजन श्राद्ध और त्योहारों पर पकवान बनाना, अपने से बड़े और छोटों का आदर करना, और भी जो मेरे निहित हैं, मैं उन सभी का सावधानी पूर्वक पालन करती हूँ, वस्तु, भोजन, वस्त्र, आभूषणों की मैं कभी अपेक्षा नही करती, मेरे पतियों का वरुण के समान जो खजाना है उसका पता भी केवल एक मुझी को है, मैं भूख प्यास सहकर भी अपने अपने पतियों की सेवा करती हूँ, उस समय रात और दिन मेरे लिए एक समान होते है, मेरे विचार से स्त्रियों को सनातन धर्म के अनुसार पति के अधीन रहना चाहिए, मैं सदा ही सबसे पहले उठती हूँ, और सबसे बाद में लेटती हूँ, अतः है सत्ये पतियों को वश में करने का एक मात्र उपाय मुझे यही जान पड़ता है, न मैं दुष्ट स्त्रियों जैसा व्यवहार करती हूँ, और न ही मुझे अच्छा लगता है,

        द्रोपती की ऐसी धर्मयुक्त बात सुनकर सत्यभामा बोली कि " हे पाञ्चाली मेरी एक प्रार्थना है तुम मेरे कहे सुने को क्षमा करना, सखियाँ तो जानबूझकर भी ऐसी बात हंसी में कह देतीं है।

  तो दोस्तों आपको कहानी कैसी लगी हमे कमेंट में जरूर बताएं ,  धन्यवाद

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