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खुद को काट डाला धर्म की रक्षा के लिए

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नमस्कार दोस्तों,
          आज की कथा का वर्णन महाभारत के वनपर्व में किया गया है, जिसमे बताया गया है की कैसे एक राजा अपने कर्तव्य पालन के लिए खुद को काटकर चढ़ा देता, आइये जानते है इस कथा के बारे में विस्तार से.....

        दोस्तों एक धर्मात्मा राजा हुए जिनका नाम था उशीनर, कहीं कही उन्हें राजा शिवि भी कहा जाता है, राजा उशीनर ने इतने यज्ञ अनुष्ठान कर दिए थे की इंद्र भी इनसे छोटे मने जाने लगे, राजा उशीनर की धर्मनिष्ठा और ख्याति से प्रभावित होकर इंद्र ने उनकी परीक्षा लेनी की ठानी, अतः इंद्र ने कबूतर का रूप धारण किया और इंद्र ने बाज़ का, इस प्रकार कबूतर उड़ते हुए राजा उशीनर की यज्ञ शाला में पहुंचा, और बाज़ भी उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुंच गया, और बाज़ के डर कबूतर राजा उशीनर की गोद में जाकर छिप गया,

       अब बाज़ भी राजा उशीनर के पास गया और बोला कि " राजन समस्त संसार आपको धर्मात्मा जनता है तो आप धर्म के विरूद्ध कार्य क्यों कर रहे है,  मैं भूख से मरा जा रहा हूँ, यह कबूतर मेरा आहार है, आप धर्म के लोभ में इसकी रक्षा न करें, राजा ने कहा कि " है पक्षीराज यह कबूतर डरकर अपनी प्राण रक्षा हेतु मेरी शरण में आया है, सिर्फ इस आशय से कि मैं इसके प्राणों की रक्षा करूँगा, देखो यह तुम्हारे भय से कितना कांप रहा है, इस समय इसका त्याग करना वैसा ही है, जैसे जगतमाता गाय का वध करना और मैं क्षत्रिय हूँ अतः शरणागत का त्याग क्षत्रियधर्म के विरूद्ध है,

      बाज बोला की " राजन सभी प्राणी आहार से ही उत्पन्न हुए है, आहार से ही उनकी वृद्धि होती है, और आहार से ही जीवित रहते है, आज अपने मुझे भोजन से वंचित कर दिया है, शायद मैं मर जाऊं, और मेरे मारने के बाद मेरी स्त्री और बच्चे भी मृत्यु को प्राप्त होंगे, इस प्रकार आप एक कबूतर को बचाने के लिए तीन प्राण को कैसे दांव पर लगा सकते है, जो धर्म दूसरे धर्म का बाधक बने वह धर्म नहीं कुधर्म है, धर्म तो वही है जिसमे किसी दूसरे धर्म का विरोध नहीं, जहाँ दो धर्मो में विरोध हो, वहाँ छोटे बड़े का विचार करके, जिसका किसी से विरोध न हो उसी धर्म का पालन मारना चाहिए, अतः राजन आप भी धर्म और अधर्म के नियम के गौरव और लंघावपर दृष्टि रखकर जिससे विशेष पुण्य हो निश्चय ही उसी धर्म का आचरण करना चाहिए,

        राजा ने कहा की पक्षीराज आपने बहुत अच्छी बात कही है, कहीं आप पक्षीराज गरुणदेव तो नहीं है, क्योंकि आप धर्म के मर्म को अच्छी तरह जानते है, आपने जो भी कहा वह अक्षरशः सत्य है, लेकिन किसी शरणार्थी के त्याग को आप अच्छा कर्म कैसे कहा सकते है, पक्षिवर आपका सारा प्रयत्न भोजन के लिए है अतः मैं आपको शिवि प्रदेश का सारा राज्य देता हूँ, यदि और भी कुछ आपको चाहिए तो निःशंकोच होकर कहिये, लेकिन शरण में आये इस पक्षी का त्याग मैं नहीं कर सकता, है पक्षीराज जिस कार्य को करने से आप इसे छोड़ सके, वह कार्य आप मुझे बताइये मैं वही करूँगा, लेकिन इस कबूतर का त्याग मैं नहीं कर सकता,

      तब बाज़ बोला की " राजन यदि आपको इस कबूतर से इतना ही लगाव है, तो इसी के बराबर आप अपना मांस काटकर तराजू में रखिये, ज़ब वह तौल में कबूतर के बराबर हो जायेगा, तो वही मांस आप मुझे दे दीजियेगा, उसी से अपनी तृप्ति कर लूंगा, फिर क्या था धर्मज्ञ उशीनर ने उसी क्षण अपना मांस कांटकर तौलना प्रारम्भ कर दिया पहले अपने जंघा का मांस काटकर पलड़े में रखा लेकिन दूसरे पलड़े का कबूतर भारी निकला, तब दूसरी जंघा का मांस काटकर पलड़े में रखा, लेकिन कबूतर फिर भी भारी रहा, ऐसा उन्होंने कई बार किया लेकिन कबूतर भारी ही रहता,

       अंत में वें खुद ही पलड़े में जाकर बैठ गए, राजा का ऐसा कर्तव्यनिष्ट कार्य देखकर दोनों देव बड़े प्रसन्न हुए, और बाजरूपी इंद्र तथा कबूतररूपी अग्निदेव अपने असली स्वरूप में आकर बोले की " राजन हम आपकी धर्मनिष्ठा की परीक्षा लेने के लिए यहाँ आये थे, अतः राजन ज़ब तक संसार में लोगों को आपका स्मरण रहेगा, तब तक आपकी गाथा अमर रहेगी, हुए आपका शुयश निश्छल रहेगा, तथा आप पुण्यलोकों का भोग करेंगे, ऐसा कहकर दोनों देव स्वर्गलोक चले गए, और राजा उशीनर शिवि के नाम से अमर हो गए,

           आपको कहानी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताएं, धन्यवाद

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