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पूरा समुद्र क्यो पी गए महार्षि अगस्त्य

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नमस्कार दोस्तों
         महर्षि अगस्त्य ने पूरा समुद्र क्यो पी लिया, इसके पीछे कारण क्या था, यह जानने के लिए मैं आपको महाभारत के सभापर्व में उल्लेखित एक कथा बताता हूँ जो कुछ इस प्रकार है,

 कथानुसार :-
         सतयुग में कालकेय नाम के महाबलवान दैत्यगण हुए, जो वृत्तासुर के अधीन रहकर देवताओँ पर आक्रमण करते रहते थे और हर कार्य मे विघ्न डालते थे, उनसे परेशान होकर वृत्तासुर के वध के लिए, सभी देवतागण ब्रम्हा जी के पास गए, और वृत्तासुर को किस प्रकार मारा जाय इसका उपाय पूंछा, तब ब्रम्हाजी ने बताया कि " तुम सब लोग पृथ्वी पर जन्मे महर्षि दधीचि के पास जाओ, और उन्हें प्रसन्न करके वर देने के लिए राजी करो, और जब मुनि वरदान देने के लिए राजी हो जाय, तो उनसे उनकी हड्डियां मांग लेना, और जब वें शरीर त्यागकर अपनी हड्डियां तुम्हे दे दें, तो उसी हड्डी से तुम छः दांत वाला बज्र बनवाना, उसी बज्र से दैत्य वृत्तासुर का वध संभव है,

        तब ब्रम्हाजी की आज्ञा से सभी देवता महर्षि दधीचि के पास गए, और ब्रम्हाजी के कहे अनुसार महर्षि दधीचि से वार मांगा, स्थित की गंभीरता को समझते हुए, महर्षि दधीचि बोले कि ' हे देवगण जिसमे तीनो लोकों का हित हो मैं वह कार्य अवश्य करूँगा, फिर देवताओँ द्वारा अस्तियाँ मांगे जाने पर, मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले मुनि दधीचि ने अपने प्राण त्याग दिए, और देवता मुनि के निष्प्राण शरीर की हड्डियां लेकर विश्वकर्मा जी के पास आये, और अपने आने का उद्देश्य बताया, तब विश्वकर्मा जी उन हड्डियों से एक भयानक बज्र तैयार किया, और अत्यंत प्रसन्न होकर इंद्र से बोले कि " हे देवराज इस बज्र से तुम अवश्य ही वृत्तासुर का वध करोगे,

       तब इंद्र ने बिना बिलम्ब किये अपने शक्तिशाली देवताओं सहित पृथ्वी और आकाश घेर कर खड़े हुए वृत्तासुर पर धावा बोल दिया, और देवता तथा दानवों का भयंकर युद्ध छिड़ गया, उस समय समस्त कालकेय गण वृत्तासुर की ओर से लड़े, देवता और ऋषियों के तेज से सम्पन्न इंद्र का बल बढ़ा हुवा देख वृत्तासुर ने बहुत भयानक हुँकार भरी, उसकी हुँकार से समस्त दिशाएं पृथ्वी और तीनों लोक कांप उठें, यहां तक कि इंद्र भी भयभीत हो गया, और उसने अपना बज्र छोड़ दिया, उस बज्र की चोट से वृत्तासुर प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, और वृत्तासुर की मृत्यु से दुखी कालकेय गण बचे हुए समस्त दैत्यों के साथ समुद्र में जा छुपा,

     और वहां इकठ्ठा होकर तीनों लोकों के विनाश की योजना बनाने लगे, और सोचते -2 उन्होंने एक भयंकर उपाय सोंचा, उन्होंने सोचा कि समस्त लोकों की रक्षा तप से ही होती है अतः सबसे पहले तप का ही नाश करना चाहिए, इसलिए पृथ्वी पर जितने भी धर्मात्मा तपस्वी और पुण्य आत्मा है यदि उनका नाश कर दिया जाय तो समस्त लोक अपने आप ही नष्ट हो जाएंगे, ऐसा सोचकर वें रोज रात्रि के समय समुद्र से बाहर आते, और आस पास के आश्रम और तीर्थस्थानों में रहने वाले ऋषि मुनियों आदि को खा जाते और सुबह होते ही समुद्र में छिप जाते, उनका अत्याचार इतना बढ़ गया, कि पृथ्वी पर ऋषि मुनियों की हड्डियां नजर आने लगी,

          इस प्रकार का नर संहार देखकर देवता अत्यंत दुखी हुये, और श्री हरि विष्णु के पास जाकर बोले कि " भगवन इस संसार पर बड़ी भारी विपत्ति आन पड़ी है, पता नही कौन रात्रि के समय धर्मात्मा पुरुषों और ऋषि मुनियों का वध करता है, यदि ऐसे ही धर्मात्माओंऔर ऋषि मुनियों के वध होता रहा तो पृथ्वी समेत सभी लोको का नाश निश्चित है, प्रभु हमारा मार्ग दर्शन करें, और इस विपत्ति से बाहर निकाले,

       प्रार्थना सुनकर श्री हरि विष्णु जी बोले, " है देवगण मैं इस भयंकर उत्पात से भलीभाँति परिचित हूँ, कालकेय नामक दैत्यों के एक भयंकर दल है, जो दिन भर तो नाको और ग्राह्यो से भरे समुद्र में छिपे रहते हैं, किन्तु रात्रि के समय संसार के विनाश हेतु वें बाहर आकर धर्मात्माओं और ऋषि मुनियों का वध करते हैं, है देवगण समुद्र में रहने के कारण तुम उनका वध नही कर सकते हो, इसलिए पहले समुद्र को सुखाने के उपाय सोचना चाहिए और समुद्र को सुखाने का सामर्थ्य महर्षि अगस्त्य के अलावा किसी मे नही है, इसलिए आप सब पहले मुनि अगस्त्य को इस कार्य के लिए तैयार करो,

       भगवान विष्णु की बात मान कर सभी देवता मुनि अगस्त्य के आश्रम में आये, वहां उन्होंने देखा कि मुनि अगस्त्य ऋषियों और महात्माओं से घिरे हुए विराजमान हैं, तब सभी देवता अगस्त्य मुनि के पास गए और प्रणाम किया, देवताओं को इस प्रकार आया देख अगस्त्य मुनि ने उनसे वहां आने का कारण पूछा, तब देवताओ ने सारा वृतांत सुनाया और अनुरोध किया कि आप इस समुद्र को पीकर सुखा दें, ताकि हम उन दुष्ट दैत्यों का विनाश कर सके जो समस्त ऋषि मुनियों के काल बने बैठे हैं,

       यह सुनकर अगस्त्य मुनि ने कहा कि " मैं इस संसार के कष्ट दूर करने के लिए तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा, तत्पश्चात वे सभी तपसिद्ध ऋषियों और देवताओं को साथ लेकर नदीनाथ समुद्र के तट पर गए, और वहाँ उपस्थित ऋषियों और देवताओ से कहने लगे की " मैं समस्त संसार के हित के लिए इस समुद्र का पान करता हूँ, और ऐसा कहकर मुनि अगस्त्य से समुद्र का सारा जल पी लिया,तब सभी देवता अपने दिव्य अस्त्रों के साथ कालकेय दैत्यों पर टूट पड़े, और भयंकर युद्ध छिड़ गया, लेकिन पवित्र आत्मा मुनियों के तप के कारण सभी दैत्य पहले ही शक्तिहीन हो गए थे, इसलिए सभी दैत्य देवता के हाथों मारे गए, इस प्रकार दैत्यों के अंत के साथ युद्ध समाप्त हुआ,

       तब देवताओं ने अगस्त्य मुनि की अनेको प्रकार से स्तुति की और प्रार्थना कि की अब आप समुद्र के पिये हुए जल को पुनः छोड़ दीजियें, लेकिन मुनि अगस्त्य ने कहा कि " मैंने वह सारा जल तो पचा लिया, यह सुनकर देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ, और उदास मन से ब्रम्हा जी के पास आये, और हाथ जोड़कर समुद्र भरने की प्रार्थना की, तब ब्रम्हाजी बोले कि " देवतागण अब तुम सब अपनी इच्छानुसार अपने अपने स्थान पर जाओ, आज से कुछ समय बाद राजा भगीरथ अपने पुरखों के उद्धार का प्रयत्न करेंगे, तब यह समुद्र फिर जल से भर जाएगा, ब्रम्हाजी के कहे अनुसार सभी देवता अपने स्थान पर चले गए और प्रतीक्षा करने लगे उस समय का,
 
      तो दोस्तो आपको यह कथा कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताएं,                                         👌 धन्यवाद 👍
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