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अनोखे ऋषि जरत्कारु की कथा, महाभारत कथा

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नमस्कार दोस्तों

            महर्षि जरत्कारु की कथा का वर्णन महाभारत के आदिपर्व मे किया गया है जोकि बहुत ही रोचक है जिसमे बताया गया है कैसे जरत्कारु अपने उलटे लटके पितृगण से मिले कैसे उनका उद्धार किया तथा जन्मेजय के सर्पयज्ञ से सभी सर्पों का विनाश होने से बचाया, 


 कथानुसार:-
              जरत्कारु शब्द बना है जरा और कारू शब्द से, जरा का मतलब होता है " क्षय " और कारू का मतलब होता है " दारुण अर्थात विशाल, मतलब महर्षि का शरीर बड़ा ही भयानक और हष्ट पुष्ट था लेकिन कठोर तप के कारण जीर्ण शीर्ण बना लिया तभी से इनका नाम जरत्कारु पड़ा, जरत्कारु मुनि ने बहुत दिनों तक ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए तपस्या की मुनि का नियम था की जहाँ शाम हो जाती थीं वहीं ठहर जाते थे, वे पवित्र तीर्थों मे स्नान करते और ऐसे कठोर नियमो का पालन करते थे जिनका पालन करना जन सामान्य के असंभव था, वें केवल वायु पीकर जीवित रहते थे जिसके कारण उनका शरीर सूख सा गया था,
 
     एक दिन यात्रा के दौरान मुनि ने देखा की कुछ पितृगण नीचे की ओर मुँह किये लटक रहें है, वें केवल एक घास के सहारे लटक रहें थे और उस घास को भी एक चूहा धीरे धीरे कुतर रहा था, वे पितृगण निराहार दुर्बल और दुखी थे, यह देखकर मुनि जरत्कारु उनके पास गये और पूछा की आप लोग कौन है. आप लोग जिस घास का सहारा लेकर लटक रहें हैं उस घास को एक चूहा कट रहा है ज़ब जद कट जाएगी तो आप लोग नीचे मुँह किये गड्ढे मे गिर जायेंगे, अतः आप लोगो को देखकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है, बतलाइये मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ, मैं अपनी सारी तपस्या का फल देकर भी आपको बचाना चाहता हूँ, आप बस आज्ञा कीजिये,

       तब पितरों ने कहा की आप बूढ़े ब्रम्हचारी है परन्तु हमारी समस्या तपस्या के बल पर से नहीं तालाब सकती, तपस्या का फल तो हमारे पास भी है, लेकिन वंश परंपरा के नाश के कारण हम इस घोर नरक मे गिरे जा रहें है, हम लोग यायावर नामक ऋषि हैं, हमारे वंश मे एक ही व्यक्ति रह गया है वह भी नहीं के बराबर है, वह वेद वेदान्तों का ज्ञाता तो है ही साथ मे संयमी, उदर और व्रतशील भी है, उसने तपस्या के लोभ मे हमें संकट मे डाल दिया है, उसके सन्तान न होने के कारण हम लोग इस गड्ढे मे लटक रहें है, यदि वह कहीं मिले तो उसे यह सारा वृतांत सुनना और कहना की वह जल्द विवाह करके सन्तान उत्पन्न करें, अब वहीँ हमारे वंश का आश्रय होगा, यह जो आप घास की जड़ देख रहें है, वहीँ हमारे वंश का सहारा है, हमारी वंश परंपरा के जो लोग नष्ट हो चुके है वहीँ लोग इसकी कटी हुई जड़ें है, और यह अधकटी जड़ ही जरत्कारु है, और यह जड़ कुतरने वाला चूहा महाबली काल है, यह एक दिन जरत्कारु को भी नष्ट कर देगा, जरत्कारु के नाश होते ही हम लोग भी इस नरक रूपी गढ्ढे मे गिर जायेंगे, मेरे पुत्र का नाम जरत्कारु है आपने जो कुछ भी देखा उसे जरूर बताइयेगा,

    आपने पितरों की बात सुनकर जरत्कारु को बहुत दुःख हुआ और रोते हुए पितरों से बोला की " आप लोग मेरे ही पितामह है मैं ही आप लोंगो का अपराधी पुत्र जरत्कारु हूँ, मुझे दण्ड दीजिये और मेरे करने योग्य कार्य बताइये, तब पितरों ने कहा की बड़े सौभाग्य की बात है की तुम यहाँ तक आ गये, आखिर अब तक तुमने अपना विवाह क्यों नहीं किया,  यह सुनकर जरत्कारु बोला की पितामह मैं सोचता था की अखंड ब्रम्हचर्य का पालन करके मैं स्वर्ग को प्राप्ति करूँ, लेकिन आप लोंगो को उल्टा लटकते देख अब मैं निसंदेह विवाह करूँगा, आप लोग चिंता मत कीजिये आपके कल्याण के लिए मैं पुत्र अवश्य उत्पन्न करूँगा, आप लोग परलोक मे सुख से रहोगे,

       पितरों से इस प्रकार कहकर जरत्कारु आपने लिए कन्या ढूंढने लगे, लेकिन उनकी शर्त और अवस्था देखकर कोई कन्या देने को राजी ही नहीं हुआ, तब वें निराश होकर वन मे चले गये, और पितरो के हित के लिए तीन बार धीरे धीरे बोले की " मैं कन्या की याचना करता हूँ, यहाँ जो भी चर अचर गुप्त या अदृश्य प्राणी हैं, मैं पितरों के हित के लिए उनसे कन्या की भींख मांगता हूँ, जिस कन्या का नाम जरत्कारु हो, जो भिक्षा के रूप मे दी जाएं, जिसके भरण पोषण का भर मुझपे न रहें, ऐसी कन्या मुझे प्रदान करें, तभी यह बात वासुकि सर्प ने सुनी, वह तत्काल अपनी बहन के पास गया जिसका नाम भी जरत्कारु था, और अपनी बहन के साथ वासुकि मुनि जरत्कारु के पास आया और सारी शर्त मानकर, अपनी बहन का विवाह मुनि के साथ करवा दिया,

      अब ऋषि अपनी पत्नी के साथ वासुकि के सुन्दर भवन मे रहने लगे, और अपनी पत्नी को भी अपनी शर्त की बात भी बता दी कि " यदि तूने मेरी रूचि के विरूद्ध कोई कार्य किया या बोला तो मैं तुम्हारा त्याग कर दूंगा, शर्त मानकर अब मुनि कि पत्नी भी मुनि की सावधानी पूर्वक सेवा करने लगीं, उसी दौरान उसे गर्भ ठहर गया और समय के साथ धीरे -2 बढ़ने लगा, समय भी धीरे -2 बीत रहा था, एक दिन की बात है ऋषि अपनी पत्नी के गोद मे सिर रखकर सोये हुए थे की तभी सूर्यास्त का समय हो गया, अब मुनि की पत्नी ने सोचा की पति को जगाना धर्म के अनुकूल होगा या नहीं, क्योंकि ये बड़े कष्ट उठाकर धर्म का पालन करते है,

       कहीं जगाने या न जगाने से मैं अपराधिनी न हो जाऊ, जगाने पर इनके क्रोध का भय,और न जगाने पर धर्मलोप का भय, अंत मे निश्चय किया की वे भले ही क्रोध करें, लेकिन धर्मलोप से बचाना ही मेरा कर्तव्य है, अतः बोली की हे महाभाग उठिये सूर्यास्त हो रहा है ,अग्निहोत्र का समय है  अब आधी नींद से उठने के कारण क्रोधित ऋषि बोले की " अरे पापिन तूने मेरा अपमान किया है क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वाश है कि ज़ब तक मैं नहीं उठता तब तक सूर्यास्त नहीं होगा, अतः अब मैं तेरा त्याग करता हूँ, पत्नी के लाख समझाने पर भी मुनि नहीं माने और अपनी पत्नी का त्याग कर दिया,

       दोस्तों इस कथा मे जो स्थिति उत्पन्न हुयी उसका कारण यह कथा है, जैसा कि आप जानते है कि कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को श्राप दिया था कि तुम सब का सर्वनाश हो जायेगा, जनमेजय के सर्पयज्ञ मे, जिससे सभी सर्प घबरा गए, और श्राप के उपाय के लिए सभी सर्प ब्रम्हा जी के पास गए, तब ब्रम्हा जी ने बताया था कि जरत्कारु नामक ऋषि से जो संतान उत्पन्न होंगी, वही सन्तान सर्पों के विनाशक यज्ञ को रोक सकता है, यही कारण था कि ऋषि जरत्कारु कि कथा का जन्म हुआ,

तो दोस्तों आपको यह कथा कैसी लगी कमेंट मे जरूर बताएं,  धन्यवाद

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