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दो माँ ने जन्म दिया था इस वीर को

                      जरासंध का जन्म कैसे हुआ 

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नमस्कार दोस्तों
                 क्या आप सोंच सकते है की कोई भी शख्स दो माताओं से जन्म ले सकता है, लेकिन ऐसा हुआ है महाभारत के काल मे, और उस शख्स का नाम है जरासंध जो दो माताओं से अलग अलग जन्मा था मतलब आधा आधा, इस कथा का वर्णन महाभारत मे किया गया है,

कथानुसार :-
         एक बार युद्धिष्ठिर ने श्री कृष्ण से पूछा कि " है मधुसूदन इस जरासंध का जन्म कैसे हुआ और इसने इतनी शक्तियां कहाँ से प्राप्त की, कृपया आप मुझे बताने का कष्ट करें, यह सुनकर श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराये और बोले कि " धर्मराज कुछ समय पहले मगध राज्य मे बृहद्रध नामक राजा राज्य करता था, उसके पास तीन अक्षौहिणी सेना थी और वह खुद याज्ञिक तथा शक्तिसम्पन्न था, उसका विवाह विवाह कशी नरेश कि दो पुत्रियों के साथ हुआ था, और उसने प्रतिज्ञा भी कि थी कि वह उन दोनों से बराबर प्रेम करेगा, इस प्रकार उसे अपनी रानीयों के साथ भोग विलास करते हुए कई वर्ष बीत गए, लेकिन उसे कोई सन्तान न उत्पन्न हुयी,

      एक बार उसने सुना कि महान तेजस्वी चण्डकौशिक उसके राज्य मे आये हुए, तो वह अपनी दोनों रानीयों के साथ पहुंच गया उनके पास, और तमाम प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न कर लिया, तब प्रसन्न महार्षि चण्डकौशिक बोले कि " राजन मै तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ मांगो मुझसे क्या चाहते हो, राजा बोले कि " भगवन मै अभागा धन संपत्ति, बल वैभव, हर चीज से संपन्न हूँ अगर कोई दुख है तो बस इतना कि मुझे कोई सन्तान नहीं है, राजा कि नीरस वाणी सुनकर महार्षि चण्डकौशिक ने ध्यान लगाया, और जिस आम के पेड़ के निचे बैठे थे, उसी पेड़ से एक आम का फल महार्षि कि गोद मे आ गिरा, उस आम के फल को अभिमंत्रित करके महार्षि चण्डकौशिक ने राजा बृहद्रथ को दे दिया और बोले कि " राजन तुम्हे जल्द ही पुत्ररत्न कि प्राप्ति होंगी,

     राजा महार्षि को प्रणाम करके अपने राजभवन लौट आये, और शुभ मुहूर्त मे वह फल दोनों रानीयों को दे दिया, और दोनों रानीयों ने उस फल के दो टुकड़े किये और खा लिया, महार्षि चण्डकौशिक के प्रभाव से दोनों रानीयों ने गर्भ धारण किया, और समय आने पर दोनी रानीयों ने एक बालक के शरीर के आधे आधे हिस्से को जन्म दिया, मतलब एक आंख, एक कान, एक हाथ, एक पैर, आधा पेट, उस शरीर का आधा हिंस्सा एक रानी के पेट से और दूसरा आधा हिस्सा दूसरी रानी के पेट से पैदा हुआ, यह देख कर दोनों रानियाँ घबराहट गयी, और सलाह किया कि इन दोनों टुकड़ों को फेंक दिया जाय, अतः दोनों रानीयों कि दसियो ने आज्ञा पाते ही, उस बच्चे के दोनों टुकड़ो को महल के बाहर फेंक दिया, जहाँ उस बच्चे के दोनों टुकड़ों को फेंका,

     वहाँ एक राक्षसी रहती थी, जिसका नाम जरा था, वह खून पीती और मांस खाती थी, उसने उस बच्चे के दोनों टुकड़ो को उठाया और ले जाने के उद्देश्य से एक साथ जोड़ दिया, बस फिर क्या था वो दोनों टुकड़े आपस मे जुड़कर एक हो गए, जिससे वह एक बालक बन गया, यह देख राक्षसी अचम्भित रहा गयी, और बालक जोर जोर से रोने लगा, बालक के रोने कि आवाज सुनकर राजा सहित दोनों रानियाँ महल के बाहर आ गयी, तब राक्षसी स्त्री का रूप बना कर बालक को गोद मे लिए हुए, राजा के पास आयी, और उस बालक को रानीयों के गोद मे दे दिया, यह देख राजा उस मनुष्य रूपी राक्षसी से बोले कि " देवी तुम तो साक्षात् देवी का अवतार लग रही हो अतः बताओ तुम कौन हो, राक्षसी बोली कि महाराज मै जरा नाम कि राक्षसी हूँ मै आपके ही नगर मे वास करती हूँ और सदा ही सत्कार पाती हूँ मै आप सब पर प्रसन्न हूँ इसलिए आपका बालक आपको सौंप रही हूँ, यह कहकर राक्षसी अदृश्य हो गयी,

      अपने पुत्र को वापस पाकर राजा बहुत प्रसन्न हुए, और वापस आकर उस रात राक्षसी जरा के नाम से उत्सव मनाया गया, नामकरण के समय राजा ने कहा कि इस बालक को राक्षसी जरा ने संधित किया है अर्थात जोड़ा है इसलिए इसका नाम जरासंध होगा, कुछ समय पश्चात् महार्षि चण्डकौशिक पुनः राज्य मे आये तब राजा ने मुनि कि बड़ी सेवा की, और सेवा से प्रसन्न होकर मुनि ने कहा " की राजन जरासंध के जन्म की सारी बात मुझे दिव्यदृष्टि से पता चल गयी थी, तुम्हारा पुत्र बड़ा ही तेजस्वी, रूपवान, और बलवान होगा, कोई भी इसके आगे ठीक नहीं पायेगा, देवता के अस्त्र शस्त्र भी इसे चोट नहीं पंहुचा सकेंगे, और क्या कहूं स्वंय भोले नाथ इसकी आराधना से प्रसन्न होकर इसे दर्शन देंगे, यह कहकर ऋषि चण्डकौशिक चले गए, और राजा बृहद्रथ ने भी जरासंध को सारा राजपाट सौंपकर वन मे तपस्या करने चले गए,

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