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जब विंध्याचल पर्वत ने सूर्य को ढँक लिया,

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  नमस्कार दोस्तों
              विंध्याचल पर्वत सूर्य को क्यों ढंकना चाहता था, क्यों क्रोधित हुआ सूर्य से और अचानक अपना कद बढ़ाने लगा, सूर्य को ढकने के लिए , इसका सम्पूर्ण वर्णन महाभारत के सभापर्व में किया गया है,

कथानुसार :-
             एक बार युधिष्ठिर और महर्षि लोमश जी आपस मे विचार विमर्श कर रहे थे । तभी युधिष्ठिर ने पूंछ लिया कि " महर्षि विंध्याचल पर्वत अचानक ही अपना कद क्यों बढ़ाने लगे थे, क्या कारण था जो वे सूर्य चंद्रमा तथा नक्षत्रो की गति धीमी करने पर उतारू हो गए थे । तब लोमशजी बोले कि " वत्स जब सूर्यदेव उदय होते थे और जब अस्त होते थे तो वे पर्वतराज स्वर्णगिरि सुमेरु की प्रदक्षिणा किया करते हैं,

        यही देखकर पर्वतराज विंध्याचल ने सूर्यदेव से कहा कि " सूर्यदेव तुम जिस प्रकार सुमेरु पर्वत के पास जाकर रोज रोज उनकी परिक्रमा करते हो, आज और अभी से उसी प्रकार उदय और अस्त होने से पहले मेरी भी परिक्रमा किया करो, इसपर सूर्यदेव ने कहा कि " हे पर्वतराज मैं अपनी इच्छा से सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा नही करता , बल्कि जिन्होंने इस जगत की रचना की उन्होंने मेरे लिए यही मार्ग निश्चित किया हुआ है। इसलिए मैं न ही सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा अपनी इच्छा से करता हूँ और न ही आपकी प्रदक्षिणा मैं करूँगा,

        सूर्य के ऐसा कहने पर विंध्याचल पर्वत क्रोध से भर गया, और तभी सूर्य तथा चंद्रमा का मार्ग रोकने के विचार से अपना कद बढ़ाने लगा, तब सभी देवता मिलकर विंध्याचल पर्वत के पास आये और अनेको प्रकार से समझने की कोशिश की, लेकिन पर्वतराज विंध्याचल ने किसी की एक न सुनी, तब सभी देवता परम तपस्वी धर्मात्माओं में श्रेष्ठ मुनि अगस्त के पास गए,

      और महर्षि अगस्त्य को प्रणाम करके बोले कि " भगवन क्रोध और अपने घमंड में चूर पर्वतराज विंध्याचल सूर्य चंद्रमा तथा नक्षत्रों की गति रोकने के लिए अपना कद बढ़ रहा है अगर ऐसा हो गया तो समस्त संसार अंधकारमय और पापमयी हो जाएगा, अब आपके अलावा उसे रोकने का साहस किसी मे नही है, इसलिए आप उसे रोकने की कृपा करें, और यह अनर्थ होने से बचाये,

      देवताओं की इस समस्या को सुनकर महर्षि अगत्स्य ने तुरंत अपनी पत्नी को बुलाया और विंध्याचल पर्वत के पास गए, और बोले कि " हे पर्वतप्रवर मैं किसी कार्यसिद्धि हेतु दक्षिण की तरफ जा रहा हूँ , अतः मेरी इच्छा और विनती है कि आप मुझे उस तरफ जाने का मार्ग प्रदान करें, और जब तक मैं उधर से न लौटूं, तब तक आप मेरी प्रतीक्षा करना, मेरे वापस आने के पश्चात आप इच्छानुसार अपना कद बढ़ा लेना, अगस्त्य मुनि की यह बात विंध्याचल पर्वत ने मान ली, और अपना कद छोटा कर लिया, और मुनि अगस्त्य पर्वत के पार दक्षिण के तरफ गए, और लौटकर वापस नही आये, वचनबद्ध विंध्याचल पर्वत अब भी उनकी प्रतीक्षा में वहीं ठहरा हुआ है, और मुनि अगस्त्य की प्रतीक्षा कर रहा है,

         दोस्तों आपको कथा अच्छी लगी है तो कमेंट में जरूर बताएं, धन्यवाद

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