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युद्ध से भागे श्री कृष्ण और कहलाये रणछोड़

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नमस्कार दोस्तों
             भगवान श्री कृष्ण युद्ध क्षेत्र से क्यो भागे, क्यो उनका नाम रणछोड़ पड़ा, इससे संबंधित कथा का वर्णन विष्णुपुराण 5वें अंश के 23 अध्याय में किया गया है,

 कथानुसार :-
             एक बार यादवों की सभा लगी हुई थी, उसमे महर्षि गार्ग्य भी अपने साले के साथ मौजूद थे, बातों ही बातों में महार्षि गार्ग्य के साले ने महार्षि को नपुंसक कह दिया, और यह सुनकर सभी यादव हंस पड़े, जिससे क्रोधित मुनि गार्ग्य यादवों की सेना को भयभीत करने वाले पुत्र की प्राप्ति के लिए, महादेव का कठोर तप प्रारम्भ कर दिया, तपस्या के दौरान वह केवल लोहे का चूर्ण ही भक्षण (खाना) करते थे,

बारह वर्ष बाद भगवान शिव ने उनसे प्रसन्न होकर उनका मनचाहा वरदान दिया, और वर पाकर महार्षि अपने आश्रम लौट आये, उसी समय एक पुत्रहीन यवनराज ने महर्षि गार्ग्य की बहुत तन मन से सेवा की जिससे खुश होकर, महार्षि ने यवनराज की पत्नी के सत्सर्ग से पुत्र उत्पन्न किया, जो कृष्णवर्ण का था जिसका वक्षस्थल (छाती) बज्र के समान कठोर थी, उसी का नाम कालयवन हुआ, जब वह जवान होकर राजा बना तो एक दिन उसने नारद मुनि से पूंछा" की इस पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली राजा कौन है, तब नारद मुनि ने उसे यादवों को सर्वाधिक शक्तिशाली राजा बताया, यह सुनकर वह अपनी सेना सहित जरासंध की तरफ से मथुरा पर आक्रमण करने के लिए पहुच गया,

 इससे पहले जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया था, लेकिन हर बार उसे हार का मुंह देखना पड़ा, और श्री कृष्ण यह सोचकर उसे जीवित छोड़ देते थे कि यह ऐसे ही राक्षसों को लाता रहेगा, और मैं ऐसे ही उनका विनाश करता रहूंगा, लेकिन जब वह कालयवन के साथ 18वीं बार युद्ध के लिए पहुँचा, तो भगवान श्री कृष्णा ने समुद्र देव से बारह योजन समुद्र के बीचों बीच जमीन मांगी, तथा श्री कृष्ण की आज्ञा से देवताओ के शिल्पी विश्वकर्मा ने रातों रात एक भव्य नगरी का निर्माण कर दिया, और उधर भगवान श्री कृष्ण ने सभी मथुरावासियों को सोते हुए ही द्वारिका पूरी पहुचा दिया, जब सुबह हुई तो सभी मथुरावासी उस नगर का द्वार ढूंढने लगे, इसीलिए उस नगरी का नाम द्वारिका पड़ा,


अब सभी मथुरावासियों को द्वारिका भेजकर स्यंम श्री कृष्ण मथुरा गए, और बिना अस्त्र शस्त्र लिए, जरासंध और कालयवन के सामने आए, यह देख कालयवन श्री कृष्ण के पीछे दौड़ा, और श्री कृष्ण भी युद्ध क्षेत्र छोड़कर भागने लगे, तभी जरासंध ने श्री कृष्ण को रणछोड़ कहकर संबोधित किया था, और उनका नाम रणछोड़ पड़ा, तब श्री कृष्ण भागते हुए, एक गुफा में घुस गए, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे रहे थे और अपना पीताम्बर महाराज मुचुकुन्द पर डालकर स्यंम छिप गए, अब पीछे पीछे कालयवन भी उसी गुफा में पंहुचा, और सोये हुए राजा मुचुकुन्द को श्री कृष्ण समझकर जोर से एक लात मारी, उसके लात मारने से जागे हुए, मुचुकुन्द ने जैसे ही कालयवन को देखा, वह स्यंम जलकर भस्म हो गया,


असल मे राजा मुचुकुन्द ने त्रेतायुग में देवताओ की तरफ से असुरों से युद्ध किया था जो हजारों वर्षों तक चला था, जब उस युद्ध मे देवताओ की विजय हुई तब इंद्र ने खुश होकर राजा मुचुकुन्द को वरदान मांगने के लिए कहा, तब कई वर्षों से न सोये राजा मुचुकुन्द ने सोने का वरदान मांगा, तब देवराज इंद्र ने कहा था कि तुम्हारे शयन करने पर जो भी तुम्हे जगायेगा, वह खुद ही जलकर भस्म हो जाएगा, तभी त्रेतायुग से सोये हुए मुचकुंद को कालयवन ने जगाया, और मृत्यु को प्राप्त हुआ, तब महाराज मुचुकुन्द को भगवान श्री कृष्ण ने अपना परिचय दिया, और बताया कि महाराज यह द्वापरयुग चल रहा है, जोकि बीतने वाला, अतः आपके उठने का अतिउत्तम समय था, क्योकि थोड़े ही दिनों बाद कलयुग प्रारंभ होने वाला था, तब राजा मुचुकुन्द तपस्या करने वन में चले गए,

             तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी कमेंट में जरूर बताएं,
                  और कमेंट में जी श्री कृष्ण अवश्य लिखे, धन्यवाद

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