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श्री राम के जीजा जन्मे थे हिरनी के गर्भ से,

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नमस्कार दोस्तों,
             श्श्रृंगऋषि जन्मे थे हिरनी के गर्भ से, और कैसे हुआ था इनका विवाह प्रभु श्री राम की बहन शांता से, पहली बात की श्रृंगऋषि के जन्म की कथा तो महाभारत के वनपर्व में वर्णित है लेकिन शांता प्रभु श्री राम की बहन हैं, इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण में किया गया है, तो आइए जानते कथा को विस्तार से...

 कथानुसार :-
               विभाण्डक नामक एक तपस्वी हुए जो बड़े ही सज्जन और सरल स्वभाव के थे, उनका वीर्य अमोघ था, और तपस्या के कारण उनका अतःकरण भी एकदम शुध्द हो गया था, एक बार वें सरोवर में स्नान करने के लिए गए, और वहाँ विभाण्डक मुनि को अप्सरा उर्वशी दिखाई पड़ी, जिसके यौवन को देखकर मुनि कामासक्त हो गए, जिस कारण वह सरोवर में ही स्खलित हो गए, और उनका वीर्य सरोवर के जल में ही गिर गया, तभी वहां आयी प्यासी हिरनी ने जल के साथ उस मुनि के वीर्य को भी पी लिया, जिससे उसे गर्भ ठहर गया,

वास्तव में वह हिरनी एक देवकन्या थी, जो ब्रम्हा के श्राप के कारण हिरनी के रूप में जन्मी थी, साथ ही ब्रम्हा जी ने यह भी कहा था कि " जब तुम मृगजाति में जन्म लेकर किसी मुनिपुत्र को जन्म दोगी, तब तुम श्राप से मुक्त हो जाओगी, इसी मृगकन्या से श्रृंगऋषि का जन्म हुआ, श्रृंगऋषि के जन्म से ही सिर पर एक सींग थी, जिसके कारण उनका नाम श्रृंगऋषि पड़ा, श्रृंगऋषि ने अपने पिता के अलावा किसी अन्य मनुष्य को देख तक नही था, इसलिए वें हमेशा ब्रम्हचर्य का पालन किया करते थे,

 उसी समय अंगदेश के राजा लोमपाद हुए, जो राजा दशरथ के मित्र भी थे, उनके राज्य में किसी ब्राह्मण ने ब्राम्हण को कोई चीज देने को कहकर मुकर गया, इसलिए सभी ब्राम्हणों ने उसका त्याग कर दिया, जिन ब्राम्हणो ने उनका त्याग किया वें इंद्रा को पूजने वाले थे, जिस कारण उनके राज्य में वर्षा होनी बंद हो गई, और वर्षा न होने से पूरे राज्य में हाहाकार मच गया, तब राजा ने तपस्वियों को बुलाकर इसका कारण पूंछा तो तपस्वी बोले कि " राजन इंद्रदेव आप पर नाराज हैं, अतः आपको इसका प्राश्चित करना पड़ेगा, श्रृंगऋषि नामक ऋषिकुमार है जो बड़े शुद्ध और सरल अतःकरण वाले है, स्त्री जाति का उन्हें पता तक नही है, यदि वे यहां आ गए तो वर्षा अवश्य होगी,

तब राजा लोमपाद ने मंत्रियों से सलाह करके राज्य की प्रधान वेश्यायों को बुलाया और बोले कि " हे सुंदरियों तुम किसी भी प्रकार से श्रृंगऋषि को अपने राज्य में ले आओ, जिससे राज्य का भला हो सके, तब एक वृद्ध बेश्या बोली कि " मुझे जिस जिस सामग्रियों की जरूरत पड़ेगी आप इसे देने की कृपा करें, मैं श्रृंगऋषि को अवश्य इस नगर में ले आऊंगी, तब बुढ़िया के कहने पर राजा ने उसकी नौका(नाव) पर एक आश्रम ही तैयार करवा दिया, और वह वृद्ध वेश्या नौका लेकर गईं और मुनि विभाण्डक के आश्रम से थोड़ी दूर पर बँधवा दी, तथा मुनि विभाण्डक की अनुपस्थिति अपनी पुत्री वेश्या को समझा बुझाकर श्रृंगऋषि के पास भेजा,

 तब उस वेश्या ने श्रृंगऋषि के पास जाकर कहा कि " हे मुनि आप कुशल से तो है न, आपका वेद अध्ययन कैसा चल रहा है, आपको कोई कष्ट तो नही है, श्रृंगऋषि ने पहली बार किसी औरत को देख था, इसलिए आश्चर्यचकित होकर बोले कि " आप कौन हैं, आप तो साक्षात प्रकाश का पुंज जान पड़ती है, इसलिए आप पूज्यनीय है, मैं आपको जल अर्पित करूँगा, इसलिए आप इस मृगचर्म से ढके कुश आसन पे विराजिए, और आपका नाम तथा आश्रम कहाँ है बताने का कष्ट करें,

तब उस चतुर वेश्या ने कहा कि" हे मुनि मेरा आश्रम पर्वत के उस पार तीन योजन दूर स्थित है, और मेरा नियम है कि मैं किसी को प्रणाम नही करने देती, और न ही किसी का दिया खाद्यपदार्थ ग्रहण करती हूँ, पूज्य मैं नही बल्कि आप है, यह कहकर वेश्या ने श्रृंगऋषी को कई बार गले लगाया, और स्वादिष्ट पकवान तथा सोमरस आदि भी पिलाया, तथा रेशमी वस्त्र भेंट करके, नैनों से कटाक्ष करती हुई वापस चली आयी, उसी के एक मुहूर्त बाद आश्रम में विभाण्डक मुनि का आगमन होता है, और श्रृंगऋषि को विचित्र अवस्था मे देख पूछते है की " पुत्र आज तुम इतने विचलित क्यों हो, क्या आज यहां कोई आया था,

तब श्रृंगऋषि बोले कि " पिताजी आज आश्रम में जटाधारी, कमलनेत्र, उज्ज्वल वर्ण वाला बड़ा ही रूपवान ब्रम्हचारी आया था, उसके गले मे स्वर्ण आभूषण चमक रहे थे, और गले के नीचे दो बड़े मांसपिंड थे जो रोमहीन और मनोहर थे, वाणी कोयल जैसी सुरीली थी, पता नही वह कोई मुनि था या देवपुत्र, उसने मुझे स्वादिष्ट फल खिलाये और स्वादिष्ट जल पीने को दिया, जिसके पीते ही मुझे बड़ा आनंद मालूम हुआ, और पृथ्वी घूमती हुई दिखाई देने लगी, जब से वह गया है मेरा मन बड़ा अशांत है मन करता है कि मैं जल्दी से जल्दी उसके पास चला जाऊं, और उसे यहां लाकर सदा अपने साथ रखूँ,

यह सुनकर विभाण्डक मुनि बोले कि " पुत्र ये तो राक्षस था जो विचित्र और मनोहर रूप बनाकर इस वन में घूमा करते हैं, तपस्वियों की तपस्या में विघ्न डालते है, तुम जिस स्वादिष्ट जल की बात कर रहे हो उसका पान दुष्ट लोग करते है, ये चीजें मुनियों के लिए नही बनाई गई है अतः पुत्र सावधान रहो, यह कहकर श्रृंगऋषि को रोक दिया और खुद उस वेश्या को ढूंढने लगे, लेकिन उसका कोई पता नही चला, एक दिन जब मुनि फल फूल लेने आश्रम से बाहर गये, तो वह वेश्या फिर श्रृंगऋषि के पास आई, उसे देखते ही श्रृंगऋषि प्रसन्न हो गए, और हड़बड़ाहट में दौड़कर उसके पास पहुँचे और बोले कि " देखो पिताजी के आने से पहले क्यों न हम तुम्हारे आश्रम में चलें,

 तब वेश्या मां बेटियोँ ने श्रृंगऋषि को नाव में चढ़ाकर अंगराज लोमपाद के पास ले आयी, और अंगराज जैसे ही श्रृंगऋषि को अपने अन्तःपुर में ले गए, वैसे ही वर्षा होने लगी, और इस प्रकार अपनी मनोकामना पूरी होते देख, राजा लोमपाद ने श्रृंगऋषि का विवाह अपनी कन्या शांता से कर दिया, यह शांता ही प्रभु श्री राम की बहन थी, जिसे राजा दशरथ ने राजा लोमपाद को दान रूप में प्रदान किया था, क्योकि लोमपाद को कोई संतान नही थी, शांता कौशल्या जी से जन्मी थी, इस कारण श्रृंगऋषि प्रभु श्री राम जी के जीजा हुए,

जब श्रृंगऋषि आश्रम से चले गए, और विभाण्डक मुनि आश्रम में वापस आये, तो श्रृंगऋषि को आश्रम में न पाकर वें समझ गए कि यह चाल जरूर अंगराज लोमपाद की है, अतः क्रोधित विभाण्डक मुनि राजा लोमपाद और उनके सम्पूर्ण राज्य को भस्म करने की इच्छा से चल पड़ें, चलते चलते उन्हें बहुत तेज भूख लगी, तो वें ग्वालों की बस्ती में गये, तब ग्वालों ने उनका बड़ा आदर सम्मान किया और भोजन कराया, मुनि विभाण्डक जब सुबह निकलने लगे तो ग्वालों से पूंछा की तुम सब किसके सेवक हो,

तो ग्वालो ने जबाब दिया कि " हम आपके पुत्र की संपत्ति हैं, ऐसे मधुर वचन सुनकर मुनि विभाण्डक का क्रोध शांत हो गया और  प्रसन्न मन से राजा लोमपाद से मिले, और अपने पुत्र श्रृंगऋषि समेत पुत्रवधु शांता को भी देखा, और जब लौटने लगे तो अपने पुत्र श्रृंगऋषि से बोले कि " पुत्र जब तुम्हे पुत्र उत्पन्न हो जाय तो सर्वसम्मति से तुम मेरे पास वापस आ जाना, अतः कुछ समय बाद जब शांता ने एक पुत्र को जन्म दिया, तो मुनि श्रृंगऋषि पत्नी समेत अपने पिता ऋषि विभाण्डक के पास वापस आश्रम में चले आये,

       दोस्तों आपको कथा कैसी लगी मुझे कमेंट में जरूर लिखे, धन्यवाद

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