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भगवान शिव और श्री कृष्ण का युद्ध

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lord shiva vs lord krishna

नमस्कार दोस्तों
                    भगवान शिव और श्री कृष्ण का युद्ध क्यों हुआ, इसका सम्पूर्ण वर्णन विष्णुपुरान पंचम अंश के ३२ वें और ३३ वें अध्याय में किया गया है,

बाणासुर नामक एक महान असुर हुआ, जिसने भगवान शिव को तपस्या से प्रसन्न करके अभय प्राप्त कर लिया, एक बार उसकी पुत्री उषा ने भगवान शिव और माता पार्वती को क्रीडा करते देखा, तो उसके मन में भी विचार आया, कि मै कब अपने प्रियतम के साथ ऐसे क्रीडा करूंगी, तब माता पार्वती उषा के मन की बात जानते हुए बोली कि " पुत्री तू परेशान मत हो, वैशाख शुक्ल द्वादशी कि रात्रि में तेरे सपने में जो पुरुष तेरे साथ जबरजस्ती संभोग करेगा, वहीं तेरा पति होगा,

तब कुछ समय पश्चात वैसा ही स्वप्न उषा ने देखा जैसा माता पार्वती उसे बताया था, अतः जब वह नींद से जागी, तो सारी बात अपनी सहेली चित्रलेखा से बताई, और उस पुरुष को ढूढने की बात कही, तथा एक छायाचित्र बनाकर चित्रलेखा को दिखाया, छायाचित्र देखकर चित्रलेखा बोली कि " यह तो कृष्ण का पौत्र तथा प्रदुम्न का पुत्र अनिरूद्घ है, तुम थोड़े दिन मेरा इंतजार करो मै इसे लेकर तुम्हारे पास आऊंगी, यह कहकर चित्रलेखा द्वारिकापुरी गई, और अपने योगबल से अनिरूद्घ को उषा के पास ले आयी, लेकिन जब यह बात बाणासुर को पता चली, तो वह आग बबूला हो गया, और अनिरूद्घ को मारने के लिए अपने सेवकों को भेजा,

 लेकिन अनिरूद्घ ने सबको परास्त करके मार डाला, तब बाणासुर स्यंम युद्ध करने गया, और मायापूर्वक नागपाश से अनिरुद्ध को बांध दिया, इधर अनिरूद्घ के गायब होने से द्वारिकापुरी में हलचल मच गई, तब नारद मुनि ने बाणासुर द्वारा अनिरूद्घ के बंदी बनाए जाने की बात श्री कृष्ण से बताई, है तब श्री कृष्ण, बलराम तथा प्रदुम्न गरुण पर सवार होकर बाणासुर के नगर पहुंचे, उनके नगर में पहुंचते ही उनका सामना भगवान शंकर के पार्षदों से हुआ, लेकिन उन्हें नष्ट करके श्री हरी विष्णु बाणासुर की राजधानी के पास पहुंचे,

 जहां उनका सामना महान महेश्वर ज्वर से हुआ, जो तीन सींग, तीन पैर वाला था, उस ज्वर का ऐसा प्रभाव था कि उसके फेंके भस्म के स्पर्श से संतप्त हुए श्री कृष्ण के शरीर का आलिंगन करने पर बलराम जी बेहोश हो गए, तब श्री हरी के शरीर में समाहित वैष्णव ज्वर ने उस महेश्वर ज्वर को बाहर निकाल दिया, तथा श्री हरी विष्णु के प्रहार से पीड़ित उस माहेश्वर ज्वर को देख ब्रम्हा जी ने श्री कृष्ण से कहा कि " है मधुसूदन इसे क्षमा प्रदान करें, तब श्री हरी ने उस वैष्णव ज्वर को अपने अंदर समाहित के लिया, यह देख माहेश्वर ज्वर बोला कि " जो मनुष्य आपके साथ मेरे इस युद्ध को याद करेगा, वह तुरंत ज्वरहीन हो जाएगा, यह कहकर वह वहां से चला गया,

तब भगवान नारायण ने पंचाग्नि को भी जीत के नष्ट के दिया, यह सब देख बाणासुर ने भगवान शिव को पुकारा, और भक्त को कष्ट में देख भगवान शिव तुरंत कार्तिकेय के साथ युद्धक्षेत्र में आ डटे, तब भगवान शिव और श्री कृष्ण का भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया, जिसे देख तीनों लोक भयभीत हो गए, सभी को लगने लगा कि जगत का प्रलय काल निकट आ गया है, लेकिन तभी श्री कृष्ण ने भगवान शिव पर जम्भकास्त्र चलाया, जिससे भगवान शिव निद्रित होकर जमुहाई लेते हुए रथ के पिछले हिस्से मे सो गए,

उसी समय गरुण ने भी कार्तिकेय का वाहन नष्ट कर दिया, और श्री कृष्णा के अस्त्रों से पीड़ित हो स्वामी कार्तिकेय भी इधर उधर भागने लगे, इस  प्रकार महादेव के सो जाने पर कार्तिकेय को पराजित करके, श्री कृष्ण बाणासुर के साथ युद्ध करने लगे, उधर बलराम जी अपने हल से दैत्यों की समस्त सेना का विनाश कर रहे थे, और इधर श्री कृष्ण और बाणासुर भी दोनों एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों की बरसात करने लगे,  लेकिन श्री कृष्ण के आगे बाणासुर की कहां चलने वाली, तथा ज़ब श्री कृष्ण ने बाणासुर को मारने के लिए अपना चक्र उठाया, उसी समय दैत्यों की कुलदेवी नग्नावस्था मे श्री कृष्ण के सामने आ गयी, जिसे देखते ही श्री कृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए,

 और बाणासुर की हजारों भुजाओं को लक्ष्य करके अपना सुदर्शन चक्र छोड़ दिया, उस सुदर्शन चक्र ने बाणासुर की हजारों भुजाओं को काट डाला, केवल दो भुजा छोड़कर, तभी भगवान शिव निद्रावस्था से जागे, और श्री कृष्ण के पास जाकर बोले की " है मधुसूदन यह आपका अपराधी नहीं है, यह मेरे अभय प्रदान करने के कारण इतना गर्बीला हुआ है, आप इसे क्षमा प्रदान करें, यह सुनकर श्री कृष्ण ने क्रोध त्याग दिया, और अनिरूद्घ को लेकर द्वारिकापुरी वापस आ गए,
असल में बाणासुर ने भगवान शिव से अभय प्राप्त किया था, और हजारों भुजाओं वाला बन गया, एक बार उसने भगवान शिव से पूंछा की " प्रभु क्या कभी मेरी हजारों भुजाओं को सफल बनाने वाला युद्ध होगा, क्योंकि बिना युद्ध ये भुजाएं किस काम की, तब भगवान शिव बोले कि " है बाणासुर जब तुम्हारा मयूरचिन्ह वाला ध्वज टूट जाएगा, तब समझ लेना कि यही वह समय है जिसका तुम्हे इंतजार था, और जब अनिरूद्घ अपहरण हुआ, तो वह मयूर ध्वज टूट गया था, जिससे बाणासुर को यह बात पर चली थी,

तो दोस्तो आपको यह कथा कैसी लगी हम कमेंट में जरूर बताए, धन्यवाद

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