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धर्मनगरी काशी को क्यों जलाया श्री कृष्ण ने,

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नमस्कार दोस्तों
         काशी नगर को क्यों जलाकर राख किया भगवान श्रीकृष्ण ने, इसका सम्पूर्ण वर्णन विष्णु पुराण पंचम अंश के ३४ वें अध्याय में किया गया है, और काशी का नाम वाराणसी कैसे पड़ा,

कथा के अनुसार :-
          यह कथा द्वापरयुग की है, पौंड्रक वंश मे वासुदेव नाम का एक राजा हुआ, जिसे कुछ धूर्त ब्राम्हणो ने अपने स्वार्थ के लिए, श्री हरि विष्णु का अवतार बताया और उसका पूजन प्रारम्भ कर दिया, धीर धीरे वह भी अपने आपको विष्णु का अवतार मानने लगा, और श्री विष्णु के समान ही चक्र और गदा धारण करने लगा, एक बार उसने श्री कृष्ण के पास दूत भेजा यह कहकर कि " हे मुर्ख कृष्ण तू अपने वासुदेव नाम का त्याग कर, चक्र, गदा आदि धारण करना छोड़ दे, और यदि तू जीना चाहता है तो मेरी शरण मे आ जा,

अब दूत ने यही बात जाकर श्री कृष्ण से कही, तो श्री कृष्ण हसकर बोले कि " हे दूत मेरी ओर से पौंड्रक को जाकर कहना कि "  मै अपने चक्र, गदा, शंख आदि धारण करके तुम्हारी नगरी मे आऊंगा, तुझे जो करना वह कर  ले, और निसंदेह अपने चक्र और गदा को तेरे ऊपर छोडूंगा, मै कल ही तुम्हारी नगरी आऊंगा,  यह कहकर दूत को वापस भेज दिया, और अगले ही दिन श्री कृष्ण गरुण पर सवार होकर उसकी राजधानी मे पहुंचे,  उधर आक्रमण कि बात सुनकर काशीनरेश भी अपनी सेना सहित पौंड्रक कि तरफ से युद्ध करने श्री कृष्णा के सामने पहुँचा,

पौंड्रक को देखकर श्री कृष्ण बोले कि "हे पौंड्रक तूने जो दूत से कहलवाया था, मै उसका सम्मान करता हूँ ये ले तेरे लिए मैंने अपना चक्र छोड़ दिया, गदा भी छोड़ तेरे ऊपर छोड़ दिया, यह गरुण भी छोड़ देता हूँ, यह तेरी ध्वजा पर विराजमान होगा, यह कहकर श्री कृष्ण ने अपना चक्र ,गदा और गरुण पौंड्रक पर छोड़ दिया, और श्री कृष्णा द्वारा छोड़े हुए चक्र ने उसके मस्तक को काट डाला, गदा ने प्रहार करके उसका शरीर तोड़ डाला, और गरुण ने उसकी ध्वजा तोड़ डाली, पौंड्रक का यह हाल देखकर काशीनरेश भी श्री कृष्ण से युद्ध लड़ने के लिए आया,


 लेकिन श्री कृष्ण ने अपने धनुष के एक ही बाण से उसका सिर काशी मे फेंक दिया, जिसे देख काशी मे हलचल मच गयीं, ज़ब यह बात काशीनरेश के पुत्र को पता चली की उसके पिता की हत्या श्री कृष्ण के हाथों हुयी है, तो उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और वरदान के  फलस्वरूप  भगवान शिव से बोला की " हे महादेव मेरे पिता का वध करने वाले कृष्ण का नाश करने के लिए भयंकर अग्निस्वरूप कृत्या उत्पन्न हो, तब भगवान शिव बोले की " वत्स ठीक ही लेकिन यह कृत्या मेरे किसी भक्त का अहित नहीं कर सकती, तुम कोई और वरदान मांगो, लेकिन काशीनरेश का पुत्र अपनी जिद पर अड़ा रहा,

तब भगवान शिव ने दक्षिणाग्नि के अनन्तर से अग्नि का भी विनाश करने वाली कराल मुख, ज्वलमालाओं से पूर्ण, केश अग्निशिखा के समान,  ताम्रवर्ण वाली भयंकर कृत्या को उत्पन्न किया, वह कृत्या उत्पन्न होते ही कृष्ण कृष्ण कहते हुई, द्वारिकापुरी गईं,  जिसे देख सभी भयभीत द्वारिकावासी मदुसूदन कृष्ण के पास गए, ज़ब श्री कृष्ण ने जाना की यह भयंकर कृत्या काशिराज के पुत्र ने शिवजी की आराधना से उत्पन्न की है द्वारिका के विनाश के लिए, तो वें अपने चक्र से बोले की " इस अग्निज्वालामयी जटाओं वाली भयंकर महाकृत्या को मार डालो, और अपना चक्र उस कृत्या पर छोड़ दिया, यह देख कृत्या भयभीत होकर भागने लगी,


वह महाकृत्या जितने वेग मे भागती, चक्र उसका उतने ही वेग से पीछा करता, अंत मे वह कृत्या काशी मे ही प्रवेश कर गयीं, और उसी समय काशीनरेश की सम्पूर्ण सेना सश्त्रों से सुसज्जित होकर विष्णुचक्र के सामने आ खड़ी हुयी, लेकिन चक्र ने काशी नरेश की समस्त सेना और कृत्या समेत समस्त काशी को जलाकर भस्म कर डाला,  हाथी, घोड़े, मनुष्य, समेत समस्त काशी नगरी को जला डाला, और सबकुछ भस्म करने के बाद वह श्री कृष्ण के हाथ मे वापस लौट आया, वही काशी आज वारणसी के नाम प्रसिद्ध है,

                  क्योकि वह वारा और असि दो नदियों के बीच मे बसी है,  इसलिए उसका नाम वाराणसी पड़ा,  यानी कहा सकते हो की काशी का वाराणसी के रूप मे पुनर्जन्म हुआ,

तो दोस्तों आपको कथा कैसी लगी हमें कमेंट मे जरूर बतायें,                                                         🙏धन्यवाद🙏

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