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पाण्डवों की मृत्यु कैसे हुयी,

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नमस्कार दोस्तों
                  पाण्डवों मे सबसे पहले किसने प्राण त्यागे, इसका वर्णन महाभारत के महाप्रस्थानिकपर्व मे किया गया है,

कथानुसार :-
               ज़ब श्री कृष्ण समेत समस्त यादव वंश के विनाश की खबर युधिष्ठिर को लगी, तो उन्होंने भी सोचा की आज नहीं तो कल काल के गाल मे सामाना ही है, इसलिए उन्होंने सभी भाइयो से महाप्रस्थान की बात कही, तब सभी भाइयों के साथ द्रोपती थी महाप्रस्थान के लिए तैयार हो गयीं, अतः परीक्षित की राजा बनाया गया, और बचे हुए यदुवंशियों मे श्री कृष्ण के पौत्र बज्र को राजा बनाया, इसके बाद सभी पाण्डव द्रोपती सहित महाप्रस्थान यात्रा पर निकल पड़े, उनके पीछे पीछे एक कुत्ता भी चल रहा था,

आगे युधिष्ठिर पीछे भीमसेन उनके पीछे अर्जुन तथा नकुल, सहदेव और सबसे पीछे द्रोपती, सभी पाण्डवों ने तो अपने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए थे, लेकिन मोहवश अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष को अपने साथ ही ले रखा था, इसलिए यात्रा के दौरान अग्निदेव प्रकट हुए, और अर्जुन से बोले की " हे अर्जुन मै अग्निदेव हूँ इस गाण्डीव धनुष को मै ही वरुण से मांगकर लाया था, अतः आपको अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है इसलिए अब आप इसे मुझे वापस दे दें, यह वरुण को वापस देना होगा, तब अर्जुन ने वह धनुष अग्निदेव को वापस दे दिया,
और पाण्डव पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर निकल पड़े, और महगिरि हिमालय को पार करते हुए, सुमेरु पर्वत पहुँचे, वहाँ अचानक द्रोपती लड़खड़ाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी, उन्हें गिरा देख भीमसेन ने धर्मराज युधिष्ठिर से पूंछा की " भैय्या द्रोपती ने तो कभी कोई पाप किया था तो क्या कारण है जोकि वह निचे गिर गयीं, युधिष्ठिर बोले की " भ्राता इसके मन मे अर्जुन के प्रति विशेष पक्षपात था, आज उसे इसी का फल मिला है, यह कहकर द्रोपती को बिना देखे युधिष्ठिर आगे बढ़ गए,

थोड़ी दूर जाने पर सहदेव भी गिर पड़े, सहदेव को गिरता देख भीमसेन ने फिर पूंछा की " भैय्या माद्रीनंदन सहदेव जिनके आस पास अहंकार कभी भटकता भी नहीं था, जिसने हमारी निःश्वार्थ तन मन से सेवा की, वह भी धराशायी हो गए क्यों,  तब युधिष्ठिर बोले की " सहदेव अपने जैसा विद्वान् किसी को नहीं समझता था, इसी कारण इसे आज गिरना पड़ा, युधिष्ठिर फिर बिना देखे आगे बढे, इधर द्रोपती और सहदेव को गिरा देख, शोक से व्याकुल नकुल भी गिर पड़े, जिसे देख भीमसेन ने फिर पूँछा की " भाई जिसने कभी अपने धर्म मे गलती नहीं की, जिसके समान रूपवान संसार मे कोई नहीं है, जो सदा हमारी आज्ञा का पालन करते थे, हमारे भाई नकुल क्यों गिरे, यह सुन युधिष्ठिर फिर बोले की " भीमसेन नकुल अपने समान किसी अन्य को रूपवान नहीं मानता था, इसलिए इसका यह हाल हुआ है, युधिष्ठिर बिना पीछे देखे फिर आगे बढे,
लेकिन उन तीनो को गिरा देख शोकाकुल अर्जुन भी जमीन पर धराशायी हो गए, अब अर्जुन को मरणासन्न हुआ देख, भीमसेन ने पुनः प्रश्न किया, की भैय्या महात्मा अर्जुन कभी हसीं मे भी झूठ नहीं बोलते थे फिर किस कर्म के कारण आज इन्हे गिरना पडा है, युधिष्ठिर बोले की " भीमसेन अर्जुन को अपनी वीरता पर बड़ा घमंड था, उसने कहा था की यदि युद्ध हुआ तो मै एक दिन मे ही सभी शत्रुओं को नाश कर डालूंगा, लेकिन ऐसा नहीं किया, यही कारण है जिसके लिए इन्हे भी गिरना पड़ा, इतना ही नहीं इसने सम्पूर्ण धनुर्धरों का अपमान किया था, अतः अपना कल्याण चाहने वालों को ऐसा नहीं करना चाहिए,

यह कहकर युधिष्ठिर बिना पीछे देखे फिर आगे बढ़ें, लेकिन तभी खुद भीमसेन भी गिर पड़े, गिरने के साथ ही उन्होंने युधिष्ठिर को पुकार कर कहा की " भैय्या मेरी ओर तो देखिये मै आपका प्रिय भीमसेन हूँ,  यदि आप जानते है तो बताइये मेरे गिरने का क्या कारण है, युधिष्ठिर बोले की " भीम तुम बहुत खाते थे, और अपने बल की बहुत डींग हांका करते थे, इसी से तुम्हे भी जमीन पर गिरना पड़ा है, यह कहकर युधिष्ठिर बिना देखे फिर आगे चल दिए, अब केवल एक कुत्ता ही बचा हुआ था जो उनके साथ साथ चल रहा था,
थोड़ी दूर जाने के बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को ले जाने के लिए आये, और साथ चलने का आग्रह किया, तब युधिष्ठिर बोले की " हे देवराज मेरी पत्नी और मेरे भाई रास्ते मे गिरे पड़े हैँ उन्हें भी अपने साथ ले चलें, तब इंद्र ने कहा की " राजन वे सब मनुष्य शरीर का त्यागकर स्वर्गलोक पहुंच चुके है, हम आपको शशरीर स्वर्ग ले जाने के लिए आये हैँ, तब युधिष्ठिर बोले की " हे भगवन यह कुत्ता मेरा परम भक्त है इस सफऱ मे इसने मेरा साथ नहीं छोड़ा, अतः इसे भी अपने साथ ले चलें, लेकिन इंद्र ने कुत्ते को साथ ले जाने से मना कर दिया,

और युधिष्ठिर को अनेक प्रक्रिया के प्रलोभन दिए, लेकिन युधिष्ठिर बिना उस कुत्ते को साथ लिए स्वर्ग जाने को राजी ही न हुए, तब वह कुत्ता अपने असली रूप मे आ गया, असल मे वह कुत्ता स्यंम धर्मराज यमराज थे, और युधिष्ठिर से बोले की " हे राजन तुमने एक कुत्ते के लिए इंद्ररथ का त्याग कर दिया, तुम महान हो अतः तुम्हे इस शरीर मे अक्षय लोको की प्राप्ति होंगी, यह कहकर धर्मराज अपने लोक चले आये, युधिष्ठिर भी इंद्र के साथ शशरीर स्वर्ग चले गए,

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