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पाण्डु, धृतराष्ट्र और विदुर थे सगे भाई..?

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नमस्कार दोस्तों
         पाण्डु धृतराष्ट्र और विदुर को कौन नहीं जानता, पाण्डु पाण्डवों के पिता, तथा धृतराष्ट्र कौरवों के पिता थे, लेकिन विदुर जोकि महान विद्वान् थे, फिर भी उन्हें सूतपुत्र कहा गया, सिर्फ इसलिए की वे एक दासी से उत्पन्न हुए थे, लेकिन अगर सत्यता देखी जाय, तो वह भी पाण्डु धृतराष्ट्र की तरह क्षत्रिय थे, और पाण्डु तथा धृतराष्ट्र के सगे भाई थे, इस सवाल का जबाब छिपा है इनके जन्म की कथा मे जोकि कुछ इस प्रकार है,

कथानुसार :-
                 राजा शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए, चित्रांगद और विचित्रवीर्य,  इनके युवा होते ही राजा शांतनु की मृत्यु हो गईं, और थोड़े ही समय बाद चित्रांगद और गंधर्वों का युद्ध हुआ, जोकि 3 वर्ष तक सरस्वती नदी के तट पर चला, जिसमे चित्रांगद गंधर्वों के हाथो मारा गया, अतः भीष्म ने विचियरवीर्य को राज्यभार सौंपा, और विचित्रवीर्य के विवाह की योजना बनाने लगे, उसी समय काशी नरेश ने अपनी तीन कन्याओं का स्वयंबर रखा, इधर भीष्म ने माता की आज्ञा से स्वयंबर मे आये हुए समस्त राजाओं को युद्ध मे परास्त करके तीनो कन्याओं का हरण कर लिया, और हस्तिनापुर लाकर विचित्रवीर्य के विवाह का आयोजन करना प्रारम्भ कर दिया,
लेकिन काशीनरेश की बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म से कहा की " हे भीष्म मै पहले ही मन ही मन राजा शाल्व को अपना पति मान बैठी हूँ, और आप तो खुद ज्ञानी है, अतः आप मेरे साथ धर्मानुसार ही आचरण करें, तब भीष्म ने अम्बा को राजा शाल्व के पास भिजवा दिया, और शेष दो कन्यायों अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया, लेकिन जवानी के जोश मे विचित्रवीर्य बुरी तरह भोग विलास मे डूब गया, जिससे जल्दी ही उसकी मृत्यु हो गयी, उसके कुछ दिन बाद सत्यवती ने भीष्म से कहा की " पुत्र तुम्हारा भाई विचित्रवीर्य बिना संतान उत्पन्न किये ही मृत्यु को प्राप्त हो गया, अतः वंश को आगे बढ़ाने का सारा उत्तरदायित्व अब तुम्हारे ऊपर है, अतः धर्मानुसार तुम काशी नरेश की पुत्रियों से संतान उत्पन्न करो, ताकि वंश की रक्षा हो सके, क्योंकि यही मेरी और प्रजा की भी इच्छा है,

 तब भीष्म बोले की माता " आपकी बात तो ठीक है, लेकिन आप तो जानती ही है की मैंने आजीवन ब्रम्हचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा ली है, मै अपना शरीर तो त्याग सकता हूँ लेकिन अपनी प्रतिज्ञा का त्याग नहीं कर सकता, अतः यह काम मुझसे न हो पायेगा, यह सुनकर सत्यवती चिंतित हो गयीं, लेकिन तभी उन्होंने अपने पुत्र व्यास का स्मरण किया, तथा व्यास को बुलाकर सत्यवती ने सारी बात बताई, और आग्रह किया की वह अम्बिका और अम्बालिका से वंशरक्षा के लिए संतान उत्पन्न करें,

तब माता सत्यवती की बात मानकर व्यास जी बोले की" माता उनको कह दीजिये, की एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करें उसके पश्चात् ही उन्हें गर्भ धारण होगा, और एक वर्ष बाद व्यास जी सबसे पहले अम्बिका के पास गए, लेकिन अम्बिका ने व्यास के तेज से डरकर अपनी आंख बंद कर ली, बंद नेत्रों से सम्भोग करने के बाद, व्यास जी वापस अपनी माता के पास आये और बोले की " माता अम्बिका को बड़ा ही बलशाली और तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, लेकिन अम्बिका के आंख बंद करने के कारण वह अंधा होगा, यह सुनकर सत्यवती चिंतित हो गयीं,

और व्यास जी को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा, लेकिन अम्बालिका भी व्यासजी को देखकर डर से पीली पड़ गई, अतः व्यास जी ने उससे उसी अवस्था मे सम्भोग किया, और फिर माता सत्यवती के पास जाकर बोले की " माता अम्बालिका का पुत्र रोग से ग्रसित पैदा होगा, क्योंकि वह मुझे देखकर डर से पीली पड़ गयीं थी, यह जानकर दुखी सत्यवती ने फिर व्यास जी को अम्बिका के पास भेजा, लेकिन इस बार अम्बिका ने व्यास जी के पास आपनी एक दासी को भेज दिया,

और उस दासी ने व्यास जी के साथ आनंद से भोग विलास किया, जिससे प्रसन्न व्यास सत्यवती के पास आकर बोले की " माता इस दासी से अत्यंत गुणी और वेद वेदांगो मे पारंगत तथा अतयंत नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा, तथा समय आने पर अम्बिका से जन्मांध धृतराष्ट्र तथा अम्बालिका से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा उस दासी के गर्भ से अत्यंत नीतिवान विदुर का जन्म हुआ, अतः पाण्डु, धृतराष्ट और विदुर के एक ही पिता होने के नाते वह सगे भाई हुए, क्योंकि उनकी माताएं भले ही अलग अलग हो लेकिन पिता व्यास ही थे,

तो आपको कथा कैसी लगी हमें कमेंट मे जरूर बताये,  धन्यवाद

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